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संपादकीय

नेपाल की त्रासदी से उत्तराखंड को सबक लेना होगा, अगली आपदा का इंतजार नहीं

नेपाल में हाल की त्रासदी ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को हमारे सामने ला खड़ा किया है। ऐसी घटनाओं के बाद कुछ दिनों तक शोक, राहत, बचाव और सरकारी तैयारियों की चर्चा होती है, लेकिन जैसे-जैसे घटना की स्मृति धुंधली पड़ती है, हम फिर उसी पुराने रास्ते पर लौट आते हैं। उत्तराखंड के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या हम आपदाओं से वास्तव में कुछ सीख रहे हैं?

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नेपाल और उत्तराखंड केवल भौगोलिक रूप से पड़ोसी हिमालयी क्षेत्र नहीं हैं। दोनों एक ऐसे पर्वतीय भूभाग का हिस्सा हैं जहां भूकंपीय गतिविधियां, कमजोर और युवा पर्वतीय भूगर्भ, भूस्खलन, अतिवृष्टि, बादल फटना, बाढ़ और ग्लेशियर से जुड़े जोखिम विकास की हर योजना के साथ मौजूद रहते हैं।

उत्तराखंड को नेपाल की त्रासदी को केवल एक पड़ोसी देश की दुर्घटना के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसे अपने भविष्य के लिए एक चेतावनी के रूप में देखना चाहिए।

हमारे सामने केदारनाथ जैसी विनाशकारी आपदा की स्मृति अभी पुरानी नहीं हुई है। चमोली की घटनाएं, जोशीमठ का भू-धंसाव, रैणी की त्रासदी, लगातार बढ़ते भूस्खलन और मानसून में सामने आने वाली सड़क एवं पुल दुर्घटनाएं हमें बार-बार बताते हैं कि हिमालय अपनी सीमाओं के साथ समझौता नहीं करता। फिर भी हमारा विकास मॉडल अक्सर इन प्राकृतिक सीमाओं की अनदेखी करता दिखाई देता है।

हमारी समस्या आपदा नहीं, आपदा के प्रति हमारा रवैया है

भूकंप आएगा या नहीं, इसका निश्चित पूर्वानुमान लगाना आज भी संभव नहीं है। भारी बारिश कब किसी ढलान को अस्थिर कर देगी, यह भी हमेशा पहले से नहीं बताया जा सकता। लेकिन यह जरूर तय किया जा सकता है कि अगर भूकंप आया तो हमारी इमारतें कितनी सुरक्षित होंगी, अगर भूस्खलन हुआ तो वैकल्पिक रास्ता क्या होगा, अगर पुल टूट गया तो राहत कैसे पहुंचेगी और अगर संचार व्यवस्था बंद हो गई तो गांव तक सूचना कैसे पहुंचेगी।

यहीं हमारी सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है।

हम अक्सर आपदा प्रबंधन को राहत और बचाव तक सीमित कर देते हैं। हेलीकॉप्टर तैयार रखना, SDRF की टीम भेजना और राहत सामग्री पहुंचाना जरूरी है, लेकिन यह आपदा प्रबंधन का अंतिम चरण है। असली आपदा प्रबंधन तो उस समय शुरू होना चाहिए जब कोई आपदा आई ही नहीं है।

मजबूत भवन, सुरक्षित सड़कें, वैज्ञानिक भू-उपयोग योजना, नदी-नालों के प्राकृतिक प्रवाह की रक्षा, संवेदनशील ढलानों की निगरानी और स्थानीय समुदाय को प्रशिक्षण—यही वास्तविक आपदा प्रबंधन है।

उत्तराखंड के शहर सबसे बड़ी चिंता

देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार, हल्द्वानी, रामनगर, कोटद्वार और अन्य तेजी से बढ़ते शहरी क्षेत्रों में अनियोजित विस्तार का प्रश्न गंभीर है।

पहाड़ों में आपदा आती है तो अक्सर चर्चा केवल पहाड़ों की होती है, लेकिन मैदानी और घाटी वाले शहर भी जोखिम से बाहर नहीं हैं। तेजी से बढ़ता निर्माण, यातायात का दबाव, पुराने भवन, नालों पर अतिक्रमण और प्राकृतिक जल निकासी में बदलाव किसी बड़ी बारिश या भूकंप के दौरान नुकसान को बढ़ा सकते हैं।

इसलिए अब केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि कहां निर्माण हो रहा है। यह देखना भी जरूरी है कि किस भूभाग पर कितना निर्माण उस क्षेत्र की प्राकृतिक क्षमता के अनुरूप है।

क्या किसी संवेदनशील ढलान पर बहुमंजिला भवन बनना चाहिए?
क्या नदी के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण की अनुमति दी जानी चाहिए?
क्या पुराने और कमजोर सरकारी भवनों का structural audit हुआ है?
क्या स्कूल और अस्पताल बड़े भूकंप की स्थिति में सुरक्षित हैं?

इन सवालों के जवाब सरकारी फाइलों में नहीं, जमीन पर दिखाई देने चाहिए।

सड़क और सुरंग विकास पर भी पुनर्विचार जरूरी

उत्तराखंड के लिए सड़क और संपर्क व्यवस्था विकास की अनिवार्यता है। पहाड़ों में सड़कें रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और बाजार तक पहुंच का आधार हैं। लेकिन सवाल सड़क बनाने का नहीं, सड़क किस तरीके से बनाई जा रही है, इसका है।

ढलानों की वैज्ञानिक स्थिरता का आकलन, जल निकासी की व्यवस्था, मलबे के सुरक्षित निस्तारण और निर्माण के cumulative impact को नजरअंदाज करके बनाई गई सड़क भविष्य में खुद आपदा का कारण बन सकती है।

इसी तरह सुरंगों और बड़ी अवसंरचनात्मक परियोजनाओं को लेकर भी केवल परियोजना की आर्थिक उपयोगिता पर्याप्त कसौटी नहीं हो सकती। हिमालय में हर बड़ी परियोजना के साथ यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि स्थानीय भूगर्भ, जल स्रोत, पारिस्थितिकी और आसपास की बस्तियों पर इसका दीर्घकालिक प्रभाव क्या होगा?

आपदा की पहली प्रतिक्रिया स्थानीय समुदाय देता है

नेपाल की घटना से उत्तराखंड को एक और महत्वपूर्ण सबक लेना चाहिए—बड़ी आपदा के बाद शुरुआती घंटों में स्थानीय लोग ही सबसे पहले एक-दूसरे की मदद करते हैं।

दूर-दराज के गांवों में सरकारी राहत दल पहुंचने में समय लग सकता है। सड़क टूट सकती है, मोबाइल नेटवर्क बंद हो सकता है और बिजली व्यवस्था ठप हो सकती है। ऐसे में गांव का प्रशिक्षित युवा, शिक्षक, स्वास्थ्यकर्मी और स्थानीय स्वयंसेवक ही पहली प्रतिक्रिया प्रणाली बन सकते हैं।

इसलिए प्रत्येक संवेदनशील गांव में Community Disaster Response Team जैसी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।

प्राथमिक उपचार, खोज एवं बचाव, आग से सुरक्षा, सुरक्षित निकासी, वायरलेस/सैटेलाइट संचार और आपदा के बाद राहत वितरण का प्रशिक्षण गांव स्तर तक पहुंचना चाहिए।

स्कूलों को केवल शिक्षा नहीं, सुरक्षा का केंद्र बनाना होगा

उत्तराखंड के प्रत्येक स्कूल में नियमित भूकंप और आपदा अभ्यास होना चाहिए। बच्चों को केवल किताबों में आपदा प्रबंधन पढ़ाने से काम नहीं चलेगा।

उन्हें पता होना चाहिए कि भूकंप के दौरान क्या करना है, सुरक्षित स्थान कौन सा है, स्कूल से बाहर निकलने का रास्ता क्या है और घायल व्यक्ति को प्राथमिक सहायता कैसे दी जाती है।

एक प्रशिक्षित बच्चा अपने परिवार के चार-पांच लोगों को भी जागरूक कर सकता है। इसलिए आपदा शिक्षा को स्कूली पाठ्यक्रम और नियमित अभ्यास का हिस्सा बनाना समय की आवश्यकता है।

सरकारों को ‘आपदा के बाद’ नहीं, ‘आपदा से पहले’ खर्च करना होगा

हमारी सरकारी व्यवस्था में अक्सर राहत के लिए बजट मिल जाता है, लेकिन जोखिम कम करने के लिए निवेश को उतनी प्राथमिकता नहीं मिलती।

यह सोच बदलनी होगी।

एक कमजोर पुल के टूटने के बाद उसे दोबारा बनाने की तुलना में पहले ही उसकी मजबूती की जांच करना सस्ता और सुरक्षित है। भूस्खलन के बाद सड़क खोलने से बेहतर है कि संवेदनशील क्षेत्र की पहले पहचान की जाए। बाढ़ के बाद राहत बांटने से बेहतर है कि बाढ़ के प्राकृतिक मार्ग को पहले ही सुरक्षित रखा जाए।

Prevention हमेशा relief से बेहतर है।

उत्तराखंड को प्रत्येक जिले के लिए विस्तृत Disaster Risk Atlas तैयार करना चाहिए। इसमें भूकंप, भूस्खलन, बाढ़, बादल फटने, ग्लेशियर झीलों और अन्य जोखिमों वाले क्षेत्रों की पहचान हो। इसी आधार पर निर्माण, सड़क, अस्पताल, स्कूल और अन्य सार्वजनिक परियोजनाओं की योजना तैयार हो।

हमें हिमालय से लड़ना नहीं, उसके साथ जीना सीखना होगा

उत्तराखंड में विकास जरूरी है। पहाड़ों को विकास से वंचित रखना भी समाधान नहीं है। लेकिन विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि हम प्रकृति की हर सीमा को तोड़ दें।

हिमालय की अपनी वहन क्षमता है। उसकी अपनी भौगोलिक और पारिस्थितिक सीमाएं हैं। विकास की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि हमने कितनी सड़कें, कितनी इमारतें और कितनी परियोजनाएं बनाई हैं; बल्कि इससे भी मापी जानी चाहिए कि हमने कितने लोगों को सुरक्षित रखा।

नेपाल की त्रासदी हमें यही चेतावनी देती है कि अगली आपदा की तैयारी आज करनी होगी।

क्योंकि आपदा आने पर व्यवस्था के पास समय नहीं होता।
समय केवल आपदा आने से पहले होता है।

और उत्तराखंड के पास वह समय अभी है।

नेपाल की त्रासदी पर संवेदना व्यक्त करना आवश्यक है, लेकिन संवेदना पर्याप्त नहीं है। उससे सबक लेना जरूरी है।

उत्तराखंड को अब हर बड़ी आपदा के बाद केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि कितना नुकसान हुआ?

हमें यह भी पूछना होगा—

नुकसान इतना बड़ा क्यों हुआ?
कहां तैयारी कमजोर थी?
किस चेतावनी को नजरअंदाज किया गया?
और अगली बार नुकसान कम करने के लिए आज क्या किया जा रहा है?

यदि नेपाल की त्रासदी के बाद भी उत्तराखंड ने अपने निर्माण, शहरीकरण, सड़क परियोजनाओं और आपदा प्रबंधन की गंभीर समीक्षा नहीं की, तो हम इतिहास से सीखने का एक और अवसर गंवा देंगे।

हिमालय बार-बार चेतावनी देता है। जरूरत केवल इतनी है कि हम इस बार उसकी चेतावनी को सुनें—आपदा आने के बाद नहीं, उससे पहले।


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By udaen

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