उत्तराखंड की पत्रकारिता पर आज एक गंभीर सवाल खड़ा है—क्या राज्य बनने के बाद हमारी पत्रकारिता भी देहरादून-केंद्रित हो गई है? यह सवाल किसी शहर या पत्रकार के खिलाफ नहीं, बल्कि उस मीडिया व्यवस्था के सामने है जो धीरे-धीरे राजधानी को ही पूरे राज्य का पर्याय मानने लगी है।
उत्तराखंड का निर्माण केवल एक नई प्रशासनिक इकाई बनाने के लिए नहीं हुआ था। इसके पीछे पहाड़ की विशिष्ट भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक समस्याओं को केंद्र में लाने की आकांक्षा थी। लेकिन दो दशक से अधिक समय बाद भी यदि राज्य की अधिकांश महत्वपूर्ण राजनीतिक और प्रशासनिक खबरें देहरादून से तय होती हैं, तो यह विचार करना जरूरी है कि क्या हमारी पत्रकारिता ने पहाड़ की आवाज को पर्याप्त स्थान दिया है?
राजधानी की खबर और उत्तराखंड की खबर में अंतर
देहरादून में मुख्यमंत्री की बैठक हुई, सचिवालय में शासनादेश जारी हुआ, किसी विभाग ने योजना की घोषणा की या किसी राजनीतिक दल ने प्रेस कांफ्रेंस की—ये निश्चित रूप से महत्वपूर्ण खबरें हैं।
लेकिन उत्तराखंड की वास्तविक कहानी केवल सचिवालय में नहीं लिखी जाती।
वह पौड़ी के खाली होते गांवों में लिखी जाती है।
वह कोटद्वार के बदलते शहरी भूगोल में लिखी जाती है।
वह चमोली के निर्माणाधीन परियोजनाओं और प्रभावित परिवारों में लिखी जाती है।
वह उत्तरकाशी के सीमांत गांवों में लिखी जाती है।
वह पिथौरागढ़ की सीमा पर रहने वाले लोगों के जीवन में लिखी जाती है।
वह टिहरी के विस्थापन और पलायन की कहानियों में लिखी जाती है।
राजधानी की प्रेस कॉन्फ्रेंस को खबर बनाना आसान है; लेकिन किसी दूरस्थ गांव में जाकर यह पता लगाना कि सरकारी योजना वास्तव में जमीन पर पहुंची या नहीं—यह पत्रकारिता का कठिन और अधिक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
पहाड़ की पत्रकारिता क्यों कमजोर हुई?
इसके कई कारण हैं।
पहला कारण है आर्थिक केंद्रीकरण। बड़े विज्ञापनदाता, सरकारी विभाग, राजनीतिक दल और मीडिया संस्थानों के निर्णय लेने वाले केंद्र मुख्यतः राजधानी और बड़े शहरों में हैं। परिणामस्वरूप जिला और तहसील स्तर की पत्रकारिता के सामने आर्थिक संकट लगातार बढ़ता गया।
दूसरा कारण है मीडिया संस्थानों का केंद्रीकरण। स्थानीय संवाददाता खबरें भेजते हैं, लेकिन अंतिम संपादकीय निर्णय अक्सर कहीं और होता है। इससे स्थानीय मुद्दों की प्राथमिकता कम हो सकती है।
तीसरा कारण है पत्रकारिता का ‘इवेंट कवरेज’ तक सीमित होना। सरकारी कार्यक्रम, उद्घाटन, बयान और राजनीतिक गतिविधियां आसानी से उपलब्ध खबरें हैं। लेकिन भ्रष्टाचार, प्रशासनिक विफलता, पर्यावरणीय संकट, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर लंबी खोजी रिपोर्टिंग के लिए समय और संसाधन चाहिए।
चौथा कारण है स्थानीय पत्रकारों की सामाजिक और आर्थिक असुरक्षा। जो पत्रकार छोटे शहरों और कस्बों में काम कर रहे हैं, उनमें से अनेक सीमित संसाधनों में काम करते हैं। ऐसे माहौल में स्वतंत्र और खोजी पत्रकारिता करना आसान नहीं है।
कोटद्वार इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है
कोटद्वार को केवल गढ़वाल के प्रवेश द्वार के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह स्वयं एक महत्वपूर्ण आर्थिक, सामाजिक और ऐतिहासिक केंद्र है।
लकड़ी के व्यापार से लेकर रेलवे तक, पहाड़ और मैदान के बीच व्यापारिक संपर्क से लेकर प्रवासियों के बसने तक, कोटद्वार की अपनी विशिष्ट सामाजिक कहानी है।
लेकिन सवाल है—क्या कोटद्वार की पत्रकारिता राज्य की नीति-निर्माण प्रक्रिया को प्रभावित करने की क्षमता रखती है?
क्या यहां से उठने वाले मुद्दे देहरादून के नीति-निर्माताओं तक नियमित और प्रभावी तरीके से पहुंचते हैं?
क्या कोटद्वार के शहरी विस्तार, यातायात, रोजगार, नदी-नालों, पर्यावरण, भूमि उपयोग, रेलवे, पर्यटन और पहाड़ से पलायन कर आए परिवारों की समस्याओं पर पर्याप्त दीर्घकालिक पत्रकारिता होती है?
यही सवाल पौड़ी, श्रीनगर, टिहरी, अल्मोड़ा, हल्द्वानी, चमोली और दूसरे जिलों पर भी लागू होता है।
पत्रकारिता का केंद्र नहीं, नेटवर्क बदलना होगा
समाधान यह नहीं है कि देहरादून को पत्रकारिता के नक्शे से हटा दिया जाए। देहरादून प्रशासनिक राजधानी है और वहां पत्रकारिता का मजबूत केंद्र होना स्वाभाविक है।
समस्या तब पैदा होती है जब राजधानी की प्राथमिकताएं पूरे राज्य की प्राथमिकताएं बन जाती हैं।
हमें एक ऐसे मीडिया मॉडल की आवश्यकता है जिसमें देहरादून मजबूत हो, लेकिन उसके साथ जिला मुख्यालय, ब्लॉक और गांव भी संपादकीय रूप से मजबूत हों।
राज्य की पत्रकारिता का मॉडल ‘एक राजधानी—बाकी संवाददाता’ नहीं, बल्कि ‘बहु-केंद्रीय पत्रकारिता नेटवर्क’ होना चाहिए।
डिजिटल मीडिया एक बड़ा अवसर
आज डिजिटल पत्रकारिता इस केंद्रीकरण को तोड़ने का सबसे बड़ा माध्यम बन सकती है।
एक छोटा डिजिटल न्यूज़ पोर्टल पौड़ी से काम करते हुए पूरी दुनिया तक अपनी रिपोर्ट पहुंचा सकता है। कोटद्वार का पत्रकार स्थानीय मुद्दे पर वीडियो रिपोर्ट बना सकता है। चमोली का युवा अपने क्षेत्र की पर्यावरणीय समस्या को राष्ट्रीय बहस का विषय बना सकता है।
लेकिन इसके लिए केवल मोबाइल कैमरा पर्याप्त नहीं है।
जरूरत है—
- तथ्य आधारित पत्रकारिता की।
- RTI और डेटा पत्रकारिता के प्रशिक्षण की।
- स्थानीय पत्रकारों के लिए आर्थिक मॉडल की।
- जिला स्तर पर खोजी पत्रकारिता को प्रोत्साहन की।
- स्थानीय भाषाओं और बोलियों में पत्रकारिता की।
- पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्रता की।
- और सबसे महत्वपूर्ण—संपादकीय स्वतंत्रता की।
पत्रकारिता को सत्ता की प्रेस रिलीज से बाहर निकलना होगा
उत्तराखंड की पत्रकारिता के सामने एक और चुनौती है—प्रेस रिलीज आधारित पत्रकारिता।
जब किसी विभाग की प्रेस रिलीज ही खबर का मुख्य स्रोत बन जाए और पत्रकार के पास उसका स्वतंत्र सत्यापन करने का समय या संसाधन न हो, तब पत्रकारिता सूचना प्रसारण में बदल जाती है।
पत्रकारिता का काम केवल यह बताना नहीं है कि सरकार ने क्या कहा।
पत्रकारिता का अगला सवाल होना चाहिए—
क्या वास्तव में ऐसा हुआ?
कितना पैसा खर्च हुआ?
किसे लाभ मिला?
किसे नुकसान हुआ?
योजना जमीन पर कहां पहुंची?
लाभार्थी कौन हैं?
और सरकार के दावे और जमीनी वास्तविकता में कितना अंतर है?
यही प्रश्न लोकतांत्रिक पत्रकारिता की असली पहचान हैं।
उत्तराखंड को ‘स्थानीय पत्रकारिता आंदोलन’ की जरूरत है
आज आवश्यकता केवल अधिक न्यूज़ पोर्टलों की नहीं है। आवश्यकता विश्वसनीय स्थानीय पत्रकारिता संस्थानों की है।
हर जिले में ऐसे पत्रकारिता मंच विकसित होने चाहिए जो स्थानीय मुद्दों पर लगातार काम करें। विश्वविद्यालयों, पत्रकार संगठनों, नागरिक समाज और स्थानीय संस्थाओं को मिलकर जिला स्तर पर पत्रकारिता प्रशिक्षण और शोध केंद्र विकसित करने चाहिए।
स्थानीय पत्रकार को केवल ‘खबर भेजने वाला व्यक्ति’ नहीं, बल्कि स्थानीय सार्वजनिक हित का प्रहरी माना जाना चाहिए।
निष्कर्ष: राजधानी से नहीं, गांव से देखना होगा उत्तराखंड
उत्तराखंड की पत्रकारिता का भविष्य इस बात से तय होगा कि वह सत्ता के कितने करीब है, इससे नहीं; बल्कि इस बात से तय होगा कि वह समाज के कितने करीब है।
देहरादून जरूरी है, लेकिन उत्तराखंड केवल देहरादून नहीं है।
उत्तराखंड उन हजारों गांवों का भी नाम है जहां स्कूल खाली हो रहे हैं। उन युवाओं का भी नाम है जो रोजगार के लिए बाहर जा रहे हैं। उन महिलाओं का भी नाम है जो पहाड़ में अर्थव्यवस्था संभाल रही हैं। उन किसानों का भी नाम है जो बदलती जलवायु और बाजार से जूझ रहे हैं। उन सीमांत परिवारों का भी नाम है जो कठिन परिस्थितियों में राज्य की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं।
इसलिए अब समय है कि पत्रकारिता का कैमरा सचिवालय की इमारत से निकलकर गांव की पगडंडी तक पहुंचे।
उत्तराखंड की पत्रकारिता को देहरादून से बाहर नहीं, देहरादून के साथ-साथ पूरे उत्तराखंड में फैलना होगा।
क्योंकि लोकतंत्र में राजधानी सत्ता का केंद्र हो सकती है,
लेकिन पत्रकारिता का केंद्र जनता होनी चाहिए।
