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भारत में दिव्यांगजनों के अधिकारों को मजबूत कानूनी आधार देने वाला प्रमुख कानून Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 (RPwD Act) है। यह कानून दिव्यांगता को केवल चिकित्सा या व्यक्तिगत समस्या के रूप में नहीं देखता, बल्कि समान अवसर, गरिमा, स्वतंत्रता, भागीदारी और सामाजिक समावेशन से जोड़ता है।

कानून बनने के बाद भी वास्तविक चुनौती यह है कि कितने दिव्यांगजन अपने अधिकारों से परिचित हैं और सरकारी संस्थाएं, शैक्षणिक संस्थान, नियोक्ता तथा सार्वजनिक सेवाएं इन अधिकारों को व्यवहार में कितना लागू कर रही हैं।

समानता और भेदभाव से सुरक्षा

RPwD Act की धारा 3 दिव्यांगजनों के लिए समानता, गरिमा और सम्मान की बात करती है। किसी व्यक्ति के साथ केवल उसकी दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।

इसका अर्थ यह भी है कि जहां आवश्यक हो, दिव्यांग व्यक्ति को उचित सुविधा (Reasonable Accommodation) उपलब्ध कराई जाए, ताकि वह दूसरों के समान अवसरों का लाभ उठा सके।

उदाहरण के लिए किसी कार्यालय में व्हीलचेयर उपयोगकर्ता के लिए रैंप उपलब्ध कराना, दृष्टिबाधित व्यक्ति के लिए सुलभ सूचना उपलब्ध कराना अथवा श्रवण बाधित व्यक्ति के लिए उपयुक्त संचार सुविधा देना केवल सुविधा नहीं, बल्कि समान भागीदारी सुनिश्चित करने का माध्यम है।

शिक्षा का अधिकार

दिव्यांग बच्चों और युवाओं के लिए शिक्षा केवल विद्यालय में प्रवेश तक सीमित नहीं है। कानून समावेशी शिक्षा की अवधारणा को बढ़ावा देता है।

शैक्षणिक संस्थानों को आवश्यकतानुसार ऐसी व्यवस्थाएं विकसित करनी चाहिए जिनसे दिव्यांग विद्यार्थी शिक्षा की मुख्यधारा से बाहर न हों।

परीक्षाओं में उचित सुविधा, सहायक उपकरण, सुलभ शिक्षण सामग्री और आवश्यकता के अनुसार अन्य सहायता इसी व्यापक उद्देश्य का हिस्सा हैं।

लेकिन वास्तविक स्थिति में अभी भी अनेक दिव्यांग विद्यार्थियों को स्कूल, कॉलेज, परिवहन, शौचालय, डिजिटल सामग्री और परीक्षा व्यवस्था में बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

रोजगार में अवसर

दिव्यांगजनों के आर्थिक सशक्तीकरण के बिना वास्तविक सामाजिक समावेशन संभव नहीं है।

RPwD Act सरकारी प्रतिष्ठानों में दिव्यांगजनों के लिए कम-से-कम 4 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करता है। इसके साथ ही रोजगार में भेदभाव रोकने और कार्यस्थल पर उचित सुविधा उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी कानून में है।

यहां एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है—क्या केवल आरक्षण की सीटें निर्धारित कर देना पर्याप्त है?

निश्चित रूप से नहीं।

भर्ती प्रक्रिया से लेकर नियुक्ति, पदस्थापन, कार्यस्थल, पदोन्नति और डिजिटल प्रणालियों तक पूरी व्यवस्था को सुलभ और गैर-भेदभावपूर्ण बनाना आवश्यक है।

सुगम्यता केवल रैंप तक सीमित नहीं

दिव्यांग अधिकारों की चर्चा में Accessibility यानी सुगम्यता सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक है।

सुगम्यता का मतलब केवल किसी सरकारी भवन में रैंप बना देना नहीं है। इसमें शामिल हैं—

  • सुलभ भवन और सार्वजनिक स्थान
  • सुगम परिवहन
  • सूचना एवं संचार तक पहुंच
  • डिजिटल एवं वेबसाइट accessibility
  • संकेत भाषा तथा संचार सहायता
  • सुलभ शौचालय
  • सार्वजनिक सेवाओं तक समान पहुंच

आज जब सरकारी सेवाएं तेजी से ऑनलाइन हो रही हैं, तब डिजिटल accessibility भी दिव्यांग अधिकारों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।

यदि कोई सरकारी वेबसाइट, आवेदन प्रणाली या ऑनलाइन सेवा स्क्रीन रीडर से काम नहीं करती, वीडियो में उपशीर्षक नहीं हैं या डिजिटल दस्तावेज सुलभ नहीं हैं, तो तकनीकी विकास स्वयं एक नई बाधा बन सकता है।

स्वास्थ्य और पुनर्वास

दिव्यांगजनों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं तक समान और सुलभ पहुंच भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

दिव्यांगता प्रमाण-पत्र, सहायक उपकरण, पुनर्वास सेवाएं, थेरेपी, मानसिक-सामाजिक सहायता और आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता व्यक्ति की स्वतंत्रता और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती है।

विशेष रूप से ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में चुनौती और बड़ी हो जाती है, जहां विशेषज्ञ सेवाएं और पुनर्वास केंद्र अक्सर दूर होते हैं।

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में यह प्रश्न विशेष महत्व रखता है। किसी दिव्यांग व्यक्ति के लिए 50–100 किलोमीटर की दूरी केवल यात्रा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच में वास्तविक बाधा हो सकती है।

सामाजिक सुरक्षा और स्वरोजगार

दिव्यांग अधिकारों का उद्देश्य केवल सरकारी नौकरी उपलब्ध कराना नहीं है।

स्वरोजगार, कौशल विकास, उद्यमिता, वित्तीय सहायता, सामाजिक सुरक्षा और आजीविका के अवसर भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

यदि किसी दिव्यांग व्यक्ति को अपना व्यवसाय शुरू करने की क्षमता है, तो उसे प्रशिक्षण, ऋण, बाजार, डिजिटल प्लेटफॉर्म और सरकारी योजनाओं तक सुलभ पहुंच मिलनी चाहिए।

विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में दिव्यांगजन स्वयं सहायता समूह, कृषि-आधारित गतिविधियों, स्थानीय उत्पाद, डिजिटल सेवाओं और छोटे उद्यमों के माध्यम से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकते हैं।

कानूनी क्षमता और निर्णय लेने का अधिकार

दिव्यांग व्यक्ति को केवल इसलिए अपने जीवन के निर्णय लेने से वंचित नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वह दिव्यांग है।

कानून दिव्यांगजनों की कानूनी क्षमता और निर्णय लेने के अधिकार को मान्यता देता है तथा सहायता की आवश्यकता होने पर supported decision-making की अवधारणा को महत्व देता है।

यह सोच महत्वपूर्ण है क्योंकि समाज में लंबे समय तक दिव्यांग व्यक्ति को “निर्भर” मानने की प्रवृत्ति रही है।

आधुनिक दिव्यांग अधिकारों का दृष्टिकोण इसके विपरीत है—दिव्यांग व्यक्ति सहायता का पात्र हो सकता है, लेकिन अपनी पहचान और निर्णयों का अधिकार रखने वाला नागरिक भी है।

राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी

लोकतंत्र में भागीदारी केवल मतदान करने तक सीमित नहीं है।

दिव्यांगजनों को राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और सार्वजनिक जीवन में समान भागीदारी का अवसर मिलना चाहिए।

मतदान केंद्रों की accessibility, सुलभ चुनावी जानकारी और सहायक सुविधाएं लोकतांत्रिक अधिकारों की वास्तविक पहुंच के लिए आवश्यक हैं।

कानून और जमीन के बीच की दूरी

RPwD Act, 2016 ने भारत में दिव्यांग अधिकारों के लिए मजबूत कानूनी ढांचा बनाया है। लेकिन कानून की सफलता का मूल्यांकन केवल अधिनियम बनने से नहीं किया जा सकता।

सवाल यह है कि—

क्या हर सरकारी भवन वास्तव में accessible है?
क्या हर सरकारी वेबसाइट दिव्यांगजनों के लिए उपयोगी है?
क्या भर्ती प्रक्रिया में उचित सुविधा मिलती है?
क्या दिव्यांग विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण समावेशी शिक्षा मिल रही है?
क्या ग्रामीण दिव्यांगजन सामाजिक सुरक्षा और पुनर्वास योजनाओं तक पहुंच पा रहे हैं?
क्या दिव्यांग महिलाओं और बच्चों की विशेष चुनौतियों पर पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है?

इन सवालों के जवाब ही बताएंगे कि कानून कागज से निकलकर समाज तक कितना पहुंचा है।

अधिकार जानना पहला कदम है

दिव्यांगजन अपने अधिकारों के लिए केवल सहानुभूति के पात्र नहीं हैं। वे अधिकार-संपन्न नागरिक हैं।

इसलिए आवश्यकता है कि दिव्यांगजन, उनके परिवार, स्वयंसेवी संगठन, पत्रकार, वकील, शिक्षक और प्रशासन—सभी RPwD Act की जानकारी को व्यापक स्तर पर पहुंचाएं।

जब कोई अधिकार कानून में लिखा जाता है, तो वह केवल सरकारी घोषणा नहीं रहता। वह नागरिक के लिए कानूनी संरक्षण और जवाबदेही का आधार बन जाता है।

दिव्यांग अधिकारों की असली परीक्षा यही है कि समाज दिव्यांग व्यक्ति को “बेचारा” नहीं, बल्कि बराबरी का नागरिक समझे।

समानता दया से नहीं, अधिकार से आती है।
सुगम्यता सुविधा नहीं, समान भागीदारी की शर्त है।
और सम्मान कोई उपकार नहीं—हर नागरिक का अधिकार है।


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By udaen

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