समाज की सेहत पूछने वाला पत्रकार खुद कितना सुरक्षित है?
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। लेकिन इस स्तंभ की मजबूती केवल उसकी स्वतंत्रता से नहीं, बल्कि उन पत्रकारों की सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा से भी तय होती है, जो प्रतिदिन लोकतंत्र की निगरानी करते हैं।
आज पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट केवल फेक न्यूज, कॉरपोरेट दबाव, राजनीतिक हस्तक्षेप या डिजिटल मीडिया की चुनौतियां नहीं हैं। उससे भी गहरा संकट है—पत्रकार की अपनी असुरक्षा।
जो व्यक्ति समाज के स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार, पर्यावरण और जनसमस्याओं पर लगातार सवाल उठाता है, वही पत्रकार जब स्वयं बीमारी, दुर्घटना, बेरोजगारी या आर्थिक संकट का सामना करता है तो उसके लिए व्यवस्था कितनी संवेदनशील होती है?
यह सवाल असहज है, लेकिन जरूरी है।
सवाल पूछने वाला खुद सवाल बन गया
देश में पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा आज भी स्थायी रोजगार की सुरक्षा से बाहर है। छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले अनेक पत्रकार सीमित संसाधनों में अपना काम करते हैं। कई जगह नियमित वेतन नहीं, सामाजिक सुरक्षा नहीं और स्वास्थ्य बीमा जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं होतीं।
पत्रकार को खबर के लिए अस्पताल जाना पड़ता है, दुर्घटना स्थल पर पहुंचना पड़ता है, बाढ़ और आपदा में जोखिम उठाना पड़ता है, जंगल और पहाड़ों में जाना पड़ता है, सत्ता के गलियारों में सवाल पूछने पड़ते हैं और कभी-कभी प्रभावशाली लोगों के विरोध का सामना भी करना पड़ता है।
लेकिन सवाल यह है कि इन जोखिमों की कीमत कौन चुकाता है?
अगर पत्रकार घायल हो जाए तो उसके इलाज का खर्च कौन उठाएगा?
अगर उसे गंभीर बीमारी हो जाए तो उसके परिवार का भविष्य क्या होगा?
अगर किसी स्वतंत्र पत्रकार की मृत्यु हो जाए तो उसके परिवार के लिए क्या व्यवस्था है?
और अगर पत्रकार उम्रदराज हो जाए तथा उसकी आय का स्रोत समाप्त हो जाए तो क्या पत्रकारिता में वर्षों की सेवा के बाद उसके पास सम्मानजनक जीवन जीने की कोई गारंटी है?
इन सवालों का जवाब केवल संवेदना नहीं हो सकता।
पत्रकार सुरक्षा का अर्थ केवल पुलिस सुरक्षा नहीं
पत्रकार सुरक्षा पर चर्चा होते ही अक्सर पत्रकारों पर हमले, धमकियों और मुकदमों की बात होती है। यह महत्वपूर्ण है, लेकिन सुरक्षा की परिभाषा इससे कहीं व्यापक होनी चाहिए।
पत्रकार सुरक्षा में स्वास्थ्य, आय, दुर्घटना, जीवन, कानूनी सहायता और वृद्धावस्था की सुरक्षा भी शामिल होनी चाहिए।
एक पत्रकार को यदि खबर करते समय दुर्घटना हो जाती है तो उसे तत्काल चिकित्सा सहायता मिलनी चाहिए। गंभीर बीमारी की स्थिति में परिवार आर्थिक तबाही की ओर न जाए। पेशागत कारणों से कानूनी विवाद उत्पन्न होने पर उसे उचित कानूनी सहायता मिले। वृद्ध पत्रकार के लिए सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था हो।
यह विशेष रूप से उन पत्रकारों के लिए महत्वपूर्ण है जो ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में काम करते हैं।
उत्तराखंड में चुनौती और बड़ी है
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में पत्रकारिता का जोखिम मैदानी क्षेत्रों से अलग है।
दुर्गम गांवों तक पहुंचना, सड़क दुर्घटनाओं का जोखिम, भूस्खलन, बाढ़, वनाग्नि, आपदा और खराब संचार व्यवस्था के बीच रिपोर्टिंग करना यहां पत्रकार के पेशे का हिस्सा है।
चारधाम यात्रा, आपदा, बादल फटना, भूस्खलन या जंगल की आग जैसी घटनाओं में स्थानीय पत्रकार अक्सर सबसे पहले घटनास्थल तक पहुंचते हैं। राष्ट्रीय मीडिया के कैमरे बाद में पहुंचते हैं, लेकिन स्थानीय पत्रकार कई बार शुरुआती घंटों में ही सूचना और तस्वीरें उपलब्ध कराते हैं।
विडंबना यह है कि जो पत्रकार आपदा में दूसरों की कहानी दुनिया तक पहुंचाता है, उसकी अपनी सुरक्षा अक्सर व्यवस्था की प्राथमिकता नहीं बनती।
यह स्थिति बदलनी चाहिए।
स्वास्थ्य सुरक्षा को अधिकार की तरह देखना होगा
पत्रकारिता में मानसिक और शारीरिक तनाव दोनों मौजूद हैं। लगातार भागदौड़, अनिश्चित आय, समय का दबाव, संवेदनशील घटनाओं की रिपोर्टिंग और राजनीतिक-सामाजिक दबाव पत्रकार के जीवन को प्रभावित करते हैं।
इसलिए पत्रकारों के लिए केवल सामान्य बीमा योजना पर्याप्त नहीं होगी।
एक व्यापक Journalist Health Protection Scheme की आवश्यकता है, जिसमें मान्यता प्राप्त पत्रकारों के साथ-साथ वास्तविक रूप से सक्रिय स्वतंत्र, ग्रामीण और डिजिटल पत्रकारों को भी पारदर्शी मानकों के आधार पर शामिल किया जा सके।
इसमें कैशलेस उपचार, दुर्घटना कवर, गंभीर बीमारी का उपचार और परिवार के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा जैसे प्रावधान होने चाहिए।
पत्रकारिता को ‘मुफ्त सेवा’ समझना बंद करना होगा
एक और गंभीर समस्या है—पत्रकारिता में काम करने वाले व्यक्ति को अक्सर यह मान लिया जाता है कि उसे अपने पेशे के प्रति समर्पण के कारण आर्थिक कठिनाइयों को स्वीकार कर लेना चाहिए।
यह सोच खतरनाक है।
समर्पण और आर्थिक असुरक्षा एक ही चीज नहीं हैं।
एक शिक्षक को वेतन चाहिए, डॉक्टर को वेतन चाहिए, सरकारी कर्मचारी को सामाजिक सुरक्षा चाहिए, मजदूर को श्रम अधिकार चाहिए—तो पत्रकार से यह अपेक्षा क्यों की जाए कि वह लोकतंत्र की रक्षा करे लेकिन अपनी आर्थिक सुरक्षा की चिंता न करे?
आर्थिक रूप से असुरक्षित पत्रकार पर दबाव डालना आसान होता है। इसलिए पत्रकार की सामाजिक सुरक्षा वास्तव में पत्रकारिता की स्वतंत्रता का भी प्रश्न है।
पत्रकार सुरक्षा को राजनीतिक कृपा नहीं, संस्थागत व्यवस्था बनाना होगा
पत्रकारों के लिए किसी भी कल्याणकारी योजना को राजनीतिक कृपा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
सरकारें बदलती हैं। राजनीतिक प्राथमिकताएं बदलती हैं। लेकिन पत्रकारिता की संस्थागत भूमिका बनी रहती है।
इसलिए आवश्यकता है कि पत्रकारों के लिए एक स्पष्ट और पारदर्शी सामाजिक सुरक्षा ढांचा तैयार किया जाए।
इसमें पत्रकार संगठनों, प्रेस संस्थानों, राज्य सरकारों, केंद्र सरकार और मीडिया संस्थानों की स्पष्ट जिम्मेदारियां निर्धारित हों।
साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पत्रकार कल्याण योजनाएं किसी सरकार की आलोचना करने या समर्थन करने का पुरस्कार अथवा दंड न बन जाएं।
पत्रकारिता की स्वतंत्रता तभी वास्तविक होगी जब पत्रकार आर्थिक और सामाजिक रूप से स्वतंत्र होकर सवाल पूछ सके।
मीडिया संस्थानों की भी जिम्मेदारी
इस बहस में केवल सरकार को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।
बड़े मीडिया संस्थानों को भी अपने पत्रकारों के लिए स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना बीमा, जीवन बीमा और मानसिक स्वास्थ्य सहायता जैसी व्यवस्थाएं मजबूत करनी चाहिए।
फ्रीलांस और स्ट्रिंगर पत्रकारों के योगदान को भी गंभीरता से स्वीकार करना होगा। वे अक्सर संस्थान के लिए सबसे जोखिमपूर्ण और कम संसाधन वाले क्षेत्रों में काम करते हैं।
यदि कोई मीडिया संस्थान किसी पत्रकार की रिपोर्टिंग से आर्थिक लाभ अर्जित करता है, तो उसके पेशागत जोखिम की पूरी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
पत्रकार कल्याण की नई परिभाषा चाहिए
समय आ गया है कि पत्रकार कल्याण को केवल प्रेस मान्यता, आवास या पेंशन तक सीमित न रखा जाए।
हमें एक व्यापक मॉडल पर विचार करना चाहिए—
स्वास्थ्य सुरक्षा + दुर्घटना बीमा + जीवन सुरक्षा + कानूनी सहायता + मानसिक स्वास्थ्य सहायता + वृद्धावस्था सुरक्षा + परिवार की सामाजिक सुरक्षा।
इसके लिए राज्य स्तर पर स्वतंत्र और पारदर्शी पत्रकार कल्याण कोष बनाया जा सकता है। इसमें सरकार, मीडिया संस्थान और पत्रकार संगठनों की भागीदारी हो सकती है।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात होगी—पारदर्शिता और पात्रता के स्पष्ट मानदंड।
क्योंकि पत्रकार सुरक्षा की योजना भी अगर राजनीतिक या संस्थागत पक्षपात का शिकार हो गई तो उसका उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।
लोकतंत्र को अपने पहरेदार की चिंता करनी होगी
पत्रकार हर दिन समाज से सवाल करता है—
अस्पताल में इलाज क्यों नहीं है?
स्कूल में शिक्षक क्यों नहीं हैं?
युवाओं को रोजगार क्यों नहीं मिल रहा?
सड़क क्यों टूटी है?
भ्रष्टाचार क्यों हो रहा है?
कानून सबके लिए समान क्यों नहीं है?
पर अब समाज और सरकार को भी एक सवाल सुनना होगा—
जो व्यक्ति ये सवाल पूछ रहा है, उसकी अपनी सुरक्षा कौन सुनिश्चित करेगा?
यह केवल पत्रकारों का मुद्दा नहीं है। यह लोकतंत्र की गुणवत्ता का मुद्दा है।
जिस लोकतंत्र में पत्रकार को सच बोलने के लिए आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी असुरक्षा का सामना करना पड़े, वहां पत्रकारिता की स्वतंत्रता केवल कागज पर रह जाने का खतरा पैदा हो जाता है।
इसलिए अब पत्रकार सुरक्षा की बहस को “पत्रकार पर हमला हुआ या नहीं” से आगे ले जाने का समय है।
पत्रकार की सुरक्षा का अर्थ है—उसके जीवन की सुरक्षा, उसके स्वास्थ्य की सुरक्षा, उसके परिवार की सुरक्षा और उसकी स्वतंत्र आवाज की सुरक्षा।
क्योंकि समाज की सेहत का लगातार परीक्षण करने वाले पत्रकार की अपनी सेहत, गरिमा और भविष्य भी लोकतंत्र की जिम्मेदारी है।
एक स्वस्थ, सुरक्षित और स्वतंत्र पत्रकार ही एक स्वस्थ और जवाबदेह लोकतंत्र की मजबूत नींव रख सकता है।
