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पत्रकारिता केवल खबर लिखने या कैमरे के सामने खड़े होकर बयान लेने का पेशा नहीं है। पत्रकारिता लोकतंत्र की वह व्यवस्था है, जो सत्ता, प्रशासन, बाजार और समाज से लगातार सवाल पूछती है। इसलिए आज सबसे जरूरी सवाल यह नहीं है कि पत्रकार के पास कितने संसाधन हैं, कितने सोशल मीडिया फॉलोअर्स हैं या कितने बड़े संस्थान का मंच है। असली सवाल है—क्या पत्रकार अपनी वास्तविक ताकत पहचानता है?

पत्रकार की ताकत सत्ता के गलियारों तक पहुंच में नहीं है। उसकी ताकत किसी मंत्री, अधिकारी या राजनीतिक दल से नजदीकी में भी नहीं है। पत्रकार की वास्तविक शक्ति है—तथ्य, स्वतंत्रता, सवाल, संविधान और जनता का विश्वास।

आज पत्रकारिता एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जिसमें सूचना की बाढ़ है लेकिन विश्वसनीय सूचना का संकट बढ़ रहा है। सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को प्रकाशक बना दिया है। व्हाट्सऐप, फेसबुक, यूट्यूब और अन्य डिजिटल मंचों पर हर दिन हजारों दावे सामने आते हैं। ऐसे समय में पत्रकार की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

लेकिन इसी दौर में पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा खतरा भी पैदा हुआ है—पत्रकार का खबर का हिस्सा बनने के बजाय सत्ता, बाजार या प्रचार तंत्र का हिस्सा बन जाना।

पत्रकार की पहली ताकत—सवाल

लोकतंत्र में पत्रकार का सबसे महत्वपूर्ण हथियार सवाल है।

सरकार ने सड़क बनाई तो सवाल होना चाहिए—कितने रुपये खर्च हुए? किस एजेंसी ने काम किया? गुणवत्ता की जांच किसने की? काम पूरा हुआ या केवल कागज पर?

किसी पुल की मरम्मत हुई तो सवाल होना चाहिए—पिछली मरम्मत पर कितना खर्च हुआ था? पुल दोबारा क्यों क्षतिग्रस्त हुआ? जिम्मेदारी किसकी है?

किसी योजना की घोषणा हुई तो सवाल होना चाहिए—लाभार्थी कौन हैं? बजट कितना है? जमीन पर कितना काम हुआ?

यही सवाल पत्रकारिता को प्रेस विज्ञप्ति से अलग करते हैं।

प्रेस नोट पढ़ना पत्रकारिता नहीं है। प्रेस नोट के पीछे छिपे सवाल को तलाशना पत्रकारिता है।

दूसरी ताकत—दस्तावेज

आज के पत्रकार के पास पहले की तुलना में कहीं अधिक साधन हैं। सरकारी वेबसाइटें, बजट दस्तावेज, विधानसभा प्रश्न, संसद के प्रश्न, कैग रिपोर्ट, टेंडर दस्तावेज, न्यायालय के आदेश, RTI और विभिन्न विभागों के रिकॉर्ड पत्रकार को तथ्य आधारित पत्रकारिता का मजबूत आधार देते हैं।

एक पत्रकार यदि केवल बयान पर निर्भर है तो उसकी खबर आसानी से प्रचार बन सकती है। लेकिन जब उसके पास दस्तावेज हैं, आंकड़े हैं और स्वतंत्र पुष्टि है, तब उसकी खबर जवाबदेही का माध्यम बनती है।

इसलिए पत्रकार को यह समझना होगा कि सूचना और पत्रकारिता एक ही चीज नहीं हैं।

सूचना मिलना पहला कदम है। उसकी सत्यता जांचना, संदर्भ समझना, दूसरे पक्ष को शामिल करना और उसके सार्वजनिक प्रभाव को सामने रखना पत्रकारिता है।

तीसरी ताकत—जनता का विश्वास

पत्रकार की सबसे बड़ी पूंजी उसका संस्थान नहीं, जनता का विश्वास है।

यदि किसी गांव का व्यक्ति यह मानता है कि उसकी समस्या पत्रकार तक पहुंचने के बाद दबाई नहीं जाएगी, तथ्य के साथ सामने आएगी और संबंधित अधिकारी से जवाब मांगा जाएगा, तो पत्रकार की सामाजिक शक्ति वहीं से शुरू होती है।

विशेषकर उत्तराखंड जैसे राज्य में स्थानीय पत्रकारिता का महत्व बहुत अधिक है। पहाड़ के दूरस्थ गांवों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, वन्यजीव संघर्ष, पलायन, रोजगार और कृषि से जुड़ी समस्याएं अक्सर राष्ट्रीय मीडिया की प्राथमिकताओं में नहीं आ पातीं।

स्थानीय पत्रकार उन आवाजों को सामने ला सकता है जिन्हें सत्ता के आंकड़ों में अक्सर केवल संख्या बनाकर छोड़ दिया जाता है।

पत्रकार बनाम प्रचारक

आज पत्रकारिता के सामने एक गंभीर वैचारिक संकट भी है।

पत्रकार का काम किसी सरकार को गिराना या बनाना नहीं है। उसका काम किसी राजनीतिक दल का प्रचार करना भी नहीं है। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि पत्रकार सत्ता से सवाल न पूछे।

सत्ता चाहे किसी की हो, पत्रकार का सवाल वही रहना चाहिए।

यदि सरकार अच्छा काम करती है तो पत्रकार को उसे भी तथ्य के साथ सामने रखना चाहिए। यदि सरकार की नीति में खामी है तो उसे भी तथ्य के साथ उजागर करना चाहिए।

पत्रकार का पैमाना व्यक्ति नहीं, लोकहित होना चाहिए।

छोटे शहर का पत्रकार कमजोर नहीं है

भारतीय पत्रकारिता में अक्सर यह धारणा दिखाई देती है कि बड़ी राजधानी में बैठा पत्रकार अधिक शक्तिशाली है और छोटे शहर का पत्रकार सीमित है। यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है।

कोटद्वार, पौड़ी, श्रीनगर, चमोली, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ या किसी छोटे कस्बे का पत्रकार यदि अपने क्षेत्र की किसी समस्या पर लगातार दस्तावेज जुटाकर रिपोर्ट करता है, तो उसकी खबर विधानसभा से लेकर संसद और राष्ट्रीय मीडिया तक पहुंच सकती है।

डिजिटल मीडिया ने इस संभावना को और बढ़ाया है।

अब खबर के लिए केवल बड़े न्यूज़रूम की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है विश्वसनीय रिपोर्टिंग की।

लेकिन डिजिटल स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी आती है। वायरल होने की जल्दबाजी में अपुष्ट सूचना फैलाना पत्रकार की शक्ति को कमजोर करता है।

पत्रकार संगठन अपनी भूमिका समझें

पत्रकारों की सामूहिक शक्ति भी महत्वपूर्ण है। लेकिन पत्रकार संगठनों का उद्देश्य केवल सदस्यता, पद और कार्यक्रम तक सीमित नहीं होना चाहिए।

पत्रकार संगठनों को पत्रकारों की सुरक्षा, प्रशिक्षण, कानूनी सहायता, डिजिटल सुरक्षा, RTI प्रशिक्षण, डेटा पत्रकारिता और खोजी पत्रकारिता को मजबूत करना चाहिए।

एक पत्रकार अकेले किसी शक्तिशाली व्यवस्था से लड़ने में कमजोर पड़ सकता है, लेकिन तथ्य आधारित और नैतिक पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों का मजबूत नेटवर्क लोकतंत्र में बड़ी भूमिका निभा सकता है।

विज्ञापन और स्वतंत्रता

पत्रकारिता की आर्थिक स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

यदि किसी मीडिया संस्थान की आर्थिक निर्भरता इतनी अधिक हो जाए कि विज्ञापनदाता के खिलाफ खबर प्रकाशित करना मुश्किल हो जाए, तो पत्रकारिता की स्वतंत्रता प्रभावित होती है।

यह चुनौती स्थानीय मीडिया के लिए और गंभीर है।

इसलिए पत्रकारिता के नए आर्थिक मॉडल, सदस्यता, पाठक-समर्थित पत्रकारिता, सामुदायिक मीडिया और पारदर्शी विज्ञापन व्यवस्था पर गंभीर चर्चा आवश्यक है।

पत्रकार को अपनी सीमाएं भी पहचाननी होंगी

ताकत पहचानने का अर्थ यह नहीं कि पत्रकार कानून, नैतिकता या तथ्य की सीमाओं से बाहर चला जाए।

किसी व्यक्ति पर आरोप लगाना और आरोप को प्रमाणित करना अलग बातें हैं।

किसी दस्तावेज को प्रकाशित करना और उसकी प्रामाणिकता जांचना अलग बातें हैं।

किसी वायरल वीडियो को चलाना और उसके स्रोत की पुष्टि करना अलग बातें हैं।

स्वतंत्र पत्रकारिता का अर्थ बेलगाम पत्रकारिता नहीं है। स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी अनिवार्य है।

उत्तराखंड में पत्रकारिता की नई भूमिका

उत्तराखंड के सामने आने वाले वर्षों में कई बड़े प्रश्न हैं—पलायन, अनियोजित शहरीकरण, आपदा प्रबंधन, पर्यटन का दबाव, जल संकट, वन संरक्षण, मानव-वन्यजीव संघर्ष, कृषि की बदलती अर्थव्यवस्था, स्थानीय रोजगार, भूमि नीति और पहाड़ी क्षेत्रों में सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति।

इन मुद्दों पर पत्रकारिता केवल घटनाओं की रिपोर्टिंग तक सीमित नहीं रह सकती।

जरूरत है कि पत्रकार पूछे—

नीति क्या है?
पैसा कितना आया?
पैसा कहां खर्च हुआ?
लाभ किसे मिला?
नुकसान किसका हुआ?
जवाबदेह कौन है?
और भविष्य का रास्ता क्या है?

यही पत्रकारिता को लोकतांत्रिक संस्था बनाती है।

अब समय है आत्ममंथन का

पत्रकारों को यह तय करना होगा कि वे केवल घटनाओं के दर्शक बनकर रहेंगे या लोकतांत्रिक जवाबदेही के सक्रिय प्रहरी बनेंगे।

पत्रकार की ताकत किसी राजनीतिक संरक्षण में नहीं है।

उसकी ताकत किसी अधिकारी के फोन में नहीं है।

उसकी ताकत किसी बड़े मंच में नहीं है।

उसकी ताकत है—एक सही सवाल, एक प्रमाणित दस्तावेज, एक निष्पक्ष रिपोर्ट और जनता का विश्वास।

आज पत्रकारों को अपनी ताकत पहचानने की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि लोकतंत्र में कमजोर पत्रकारिता का अर्थ केवल कमजोर मीडिया नहीं है। इसका अर्थ है—कमजोर सार्वजनिक जवाबदेही।

जब पत्रकार सवाल पूछना छोड़ देता है, तो सत्ता को जवाब देने की मजबूरी कम हो जाती है।

जब पत्रकार दस्तावेज देखना छोड़ देता है, तो दावे खबर बन जाते हैं।

जब पत्रकार जनता से दूर हो जाता है, तो पत्रकारिता प्रचार में बदलने लगती है।

इसलिए आज का सबसे जरूरी संदेश यही है—

पत्रकार किसी के विरोधी बनने के लिए स्वतंत्र नहीं है, लेकिन किसी का प्रचारक बनने के लिए भी नहीं। वह जनता के प्रति जवाबदेह है।

और शायद यही पत्रकार की सबसे बड़ी ताकत है।

सत्ता बदलती रहती है, सरकारें आती-जाती रहती हैं, संस्थान बदलते रहते हैं—लेकिन तथ्य और जनता के प्रति पत्रकार की जवाबदेही ही उसकी स्थायी पहचान होनी चाहिए।

यही पहचान पत्रकारिता को फिर से मजबूत करेगी। यही पहचान लोकतंत्र को मजबूत करेगी। और यही वह ताकत है, जिसे आज हर पत्रकार को पहचानने की जरूरत है।


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By udaen

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