संपादकीय | देहरादून
वीवीआईपी कार्यक्रम किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं और संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की सुरक्षा राज्य की जिम्मेदारी है। देहरादून में 19 और 20 अगस्त को प्रस्तावित वीवीआईपी कार्यक्रम को देखते हुए पुलिस द्वारा सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करना स्वाभाविक है। हाईराइज इमारतों, पानी की टंकियों, फ्लाईओवर और अन्य संवेदनशील स्थानों की जांच, बम डिस्पोजल स्क्वॉड और डॉग स्क्वॉड की तैनाती, प्रवेश से पहले पहचान और फ्रिस्किंग तथा ड्रोन पर प्रतिबंध जैसे कदम सुरक्षा प्रोटोकॉल का हिस्सा हैं।
लेकिन इस पूरी व्यवस्था के बीच एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है—वीवीआईपी की सुरक्षा और आम नागरिक की सुविधा के बीच संतुलन कैसे कायम होगा?
लोकतंत्र में सड़कें, सार्वजनिक स्थान और सरकारी संस्थान किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं होते। वे जनता के हैं। इसलिए वीवीआईपी सुरक्षा आवश्यक होने के बावजूद यह अपेक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है कि सुरक्षा व्यवस्था आम नागरिक के लिए अनावश्यक परेशानी का कारण न बने।
देहरादून पहले ही बढ़ते यातायात, सीमित सड़क क्षमता और लगातार बढ़ते शहरी दबाव से जूझ रहा है। ऐसे में यदि वीवीआईपी मूवमेंट के दौरान लंबे समय तक सड़कें बंद होती हैं, यातायात को बार-बार रोका जाता है या अस्पताल, स्कूल, कार्यालय और बाजार जाने वाले नागरिकों को घंटों जाम में फंसना पड़ता है, तो सुरक्षा व्यवस्था का सामाजिक मूल्य भी सामने आना चाहिए।
सुरक्षा जरूरी, लेकिन नागरिक भी महत्वपूर्ण
सुरक्षा व्यवस्था में सबसे पहली प्राथमिकता वीवीआईपी की सुरक्षा हो सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक शासन में नागरिकों की सुरक्षा और सुविधा दूसरी प्राथमिकता नहीं हो सकती।
किसी मरीज की एंबुलेंस, परीक्षा देने जा रहे छात्र, काम पर जा रहे कर्मचारी या किसी जरूरी कार्य से निकले नागरिक के लिए सड़क पर बिताया गया अतिरिक्त समय भी महत्वपूर्ण है।
इसलिए वीवीआईपी रूट तय करते समय यह देखा जाना चाहिए कि वैकल्पिक मार्ग पर्याप्त और व्यावहारिक हैं या नहीं। यातायात रोकने की आवश्यकता हो तो उसकी अवधि न्यूनतम हो। ट्रैफिक पुलिस जनता को पहले से वैकल्पिक मार्गों की जानकारी दे और सोशल मीडिया तथा अन्य माध्यमों से वास्तविक समय में यातायात संबंधी अपडेट उपलब्ध कराए।
सुरक्षा का मतलब केवल बैरिकेडिंग नहीं
वीवीआईपी सुरक्षा का पारंपरिक मॉडल अक्सर बैरिकेडिंग, रूट डायवर्जन और पुलिस बल की भारी तैनाती पर केंद्रित दिखाई देता है। लेकिन आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था इससे कहीं आगे की चीज है।
हाईराइज इमारतों और संवेदनशील स्थानों की जांच, सीसीटीवी निगरानी, ड्रोन-विरोधी व्यवस्था, संचार तंत्र, इंटेलिजेंस इनपुट और विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय सुरक्षा की वास्तविक मजबूती निर्धारित करते हैं।
इस दृष्टि से देहरादून में होने वाला यह कार्यक्रम पुलिस के लिए केवल एक सुरक्षा ड्यूटी नहीं बल्कि शहरी सुरक्षा प्रबंधन की परीक्षा भी है।
ड्रोन प्रतिबंध का दूसरा पहलू
कार्यक्रम के दौरान ड्रोन उड़ाने पर प्रतिबंध सुरक्षा की दृष्टि से उचित हो सकता है। लेकिन प्रतिबंध के साथ यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि प्रतिबंधित क्षेत्र और समय की सीमा क्या है तथा वैध मीडिया कवरेज के लिए क्या व्यवस्था होगी।
आज पत्रकारिता में ड्रोन कैमरों का उपयोग समाचार कवरेज का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। इसलिए सुरक्षा और स्वतंत्र पत्रकारिता के बीच स्पष्ट प्रोटोकॉल होना चाहिए। अनधिकृत ड्रोन और अधिकृत मीडिया गतिविधि के बीच अंतर स्पष्ट रहना चाहिए।
आम नागरिक को सूचना देना भी सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा है
पुलिस यदि वीवीआईपी रूट पर यातायात प्रभावित होने की संभावना को पहले से सार्वजनिक करती है, तो नागरिक अपने आवागमन की योजना बदल सकते हैं। इससे जाम भी कम होगा और पुलिस पर दबाव भी घटेगा।
सुरक्षा व्यवस्था जितनी गोपनीय होनी चाहिए, जनता को प्रभावित करने वाली यातायात संबंधी जानकारी उतनी ही पारदर्शी होनी चाहिए।
कौन-से मार्ग प्रभावित होंगे, किस समय यातायात डायवर्ट होगा, वैकल्पिक मार्ग कौन-से होंगे और आपातकालीन सेवाओं के लिए क्या व्यवस्था रहेगी—इन सवालों की जानकारी जनता तक समय पर पहुंचनी चाहिए।
पुलिसकर्मियों की जवाबदेही भी जरूरी
वरिष्ठ अधिकारियों ने ड्यूटी में लापरवाही पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी है। यह आवश्यक है। लेकिन जवाबदेही केवल निचले स्तर के पुलिसकर्मियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
यदि सुरक्षा व्यवस्था के कारण नागरिकों को अनावश्यक परेशानी होती है, यातायात प्रबंधन विफल होता है या किसी आपातकालीन वाहन को रास्ता नहीं मिलता, तो पूरे सुरक्षा और यातायात प्रबंधन तंत्र की समीक्षा होनी चाहिए।
अच्छी सुरक्षा व्यवस्था वह नहीं है जिसमें सबसे ज्यादा पुलिसकर्मी दिखाई दें। अच्छी सुरक्षा व्यवस्था वह है जिसमें खतरा नियंत्रित रहे और आम नागरिक का जीवन न्यूनतम प्रभावित हो।
देहरादून को वीआईपी शहर नहीं, नागरिक शहर बने रहना होगा
देहरादून उत्तराखंड की राजधानी है। राजधानी होने के कारण यहां वीवीआईपी और महत्वपूर्ण संवैधानिक कार्यक्रम होते रहेंगे। लेकिन राजधानी की पहचान केवल वीआईपी मूवमेंट से नहीं, बल्कि उसके नागरिक जीवन की गुणवत्ता से भी होती है।
बार-बार होने वाले वीआईपी कार्यक्रमों के लिए यदि स्थायी और वैज्ञानिक ट्रैफिक प्रबंधन व्यवस्था विकसित की जाए, तो हर बार शहर को अचानक संकट की स्थिति में डालने की आवश्यकता कम होगी।
जरूरत है कि देहरादून में वीआईपी सुरक्षा प्रोटोकॉल और नागरिक यातायात प्रबंधन का एक स्थायी मॉडल तैयार किया जाए। इसमें पुलिस, प्रशासन, नगर निकाय, स्वास्थ्य विभाग और यातायात पुलिस के बीच स्पष्ट समन्वय हो।
अंततः सवाल सुरक्षा का नहीं, संतुलन का है
वीआईपी सुरक्षा पर सवाल उठाना सुरक्षा के महत्व को नकारना नहीं है। सवाल केवल इतना है कि क्या एक लोकतांत्रिक राज्य अपने विशिष्ट अतिथि की सुरक्षा करते हुए अपने सामान्य नागरिक के अधिकार और सुविधा की भी रक्षा कर सकता है?
जवाब होना चाहिए—हां।
19 और 20 अगस्त का वीवीआईपी कार्यक्रम पुलिस के लिए सुरक्षा की चुनौती है, लेकिन प्रशासन के लिए इससे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि देहरादून की सड़कें, अस्पताल, बाजार और नागरिक जीवन अनावश्यक रूप से बंधक न बनें।
लोकतंत्र में वीआईपी की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन आम नागरिक की जिंदगी भी उतनी ही मूल्यवान है। सुरक्षा ऐसी होनी चाहिए जिसमें वीआईपी सुरक्षित रहे और जनता को यह महसूस न हो कि उसकी अपनी राजधानी कुछ घंटों के लिए उससे छीन ली गई है।
