
Voice of Media का आह्वान—बिना RNI पंजीकरण वाले AI न्यूजपेपरों का बहिष्कार करें
देहरादून। Voice of Media ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से तैयार किए जा रहे ऐसे न्यूजपेपरों को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है, जिनका वैधानिक पंजीकरण नहीं है। संगठन ने कहा कि वर्तमान समय में AI टूल्स के माध्यम से समाचार सामग्री तैयार कर उसे अखबार के स्वरूप में प्रस्तुत करने का चलन बढ़ रहा है। यदि ऐसी सामग्री में फेक न्यूज, भ्रामक अथवा अपुष्ट सूचनाएं शामिल हो जाएं तो इसका सीधा असर प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता पर पड़ सकता है।
Voice of Media का कहना है कि ऐसी स्थिति में पाठकों के बीच वास्तविक और पंजीकृत समाचार पत्रों को लेकर भी अविश्वास पैदा हो सकता है। इसका सबसे अधिक प्रभाव मध्यम एवं छोटे समाचार पत्रों पर पड़ने की आशंका है। यदि समय रहते इस दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो पाठकों का भरोसा धीरे-धीरे केवल बड़े कॉरपोरेट मीडिया समूहों तक सीमित हो सकता है।
संगठन ने कहा कि मध्यम और छोटे समाचार पत्र लोकतंत्र में स्थानीय एवं जनसरोकार से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इनके माध्यम से बड़ी संख्या में पत्रकार, संपादकीय कर्मचारी, ऑपरेटर, प्रिंटिंग कर्मी, वितरक और अन्य लोग प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्राप्त करते हैं। ऐसे समाचार पत्रों की विश्वसनीयता प्रभावित होने से हजारों लोगों की आजीविका पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
Voice of Media ने केंद्र सरकार से मांग की है कि AI के माध्यम से समाचार पत्र प्रकाशित करने की गतिविधियों के लिए स्पष्ट नियम और प्रभावी नियमन सुनिश्चित किया जाए, ताकि फर्जी, भ्रामक अथवा बिना वैधानिक पंजीकरण के प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों पर प्रभावी कार्रवाई की जा सके।
संगठन ने पत्रकारों, समाचार पत्र संचालकों और पाठकों से भी अपील की है कि वे समाचार पत्र की वैधानिक स्थिति एवं पंजीकरण की जानकारी की पुष्टि करें और बिना आवश्यक वैधानिक पंजीकरण के प्रकाशित होने वाले AI आधारित न्यूजपेपरों को बढ़ावा न दें।
Voice of Media ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा केवल AI तकनीक का विरोध करने का नहीं, बल्कि प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता, पत्रकारिता के मूल्यों और मध्यम एवं छोटे समाचार पत्रों के अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। संगठन ने केंद्र सरकार से समय रहते ठोस कदम उठाने की अपील की है, ताकि पाठकों का विश्वास कायम रहे और प्रिंट मीडिया से जुड़े लाखों लोगों की आजीविका सुरक्षित रह सके।
