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संपादकीय

हाट-बाजार की जमीन पर सवाल: क्या अब जागा प्रशासन या वर्षों की अनदेखी का हिसाब होगा?

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में साप्ताहिक हाट-बाजार केवल व्यापार का माध्यम नहीं हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, स्थानीय संस्कृति और सामाजिक जीवन की धुरी भी हैं। कोटद्वार नगर निगम क्षेत्र में संचालित झण्डीचौड़ उत्तरी, झण्डीचौड़ पूर्वी, लोकमणिपुर (अम्बेडकर पार्क) और जशोधरपुर के साप्ताहिक हाट-बाजार दशकों से हजारों छोटे व्यापारियों, किसानों और उपभोक्ताओं की आजीविका का आधार रहे हैं।

अब इन्हीं हाट-बाजारों की भूमि के स्वामित्व और सीमांकन को लेकर नगर निगम, पुलिस और राजस्व विभाग के बीच शुरू हुआ पत्राचार कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है। उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि पुलिस ने जनसुरक्षा के दृष्टिकोण से निरीक्षण किया और नगर निगम ने भूमि के स्वामित्व, खसरा, सीमांकन तथा अभिलेखों की जानकारी मांगी है। पहली दृष्टि में यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया लग सकती है, लेकिन इसके पीछे वर्षों से चली आ रही व्यवस्थागत कमजोरियों की कहानी भी छिपी हुई है।

सवाल केवल जमीन का नहीं, प्रशासनिक जवाबदेही का है

यदि इन स्थानों पर वर्षों से साप्ताहिक बाजार लग रहे हैं, तो सबसे पहला प्रश्न यही है कि आज तक इनकी भूमि का स्वामित्व स्पष्ट क्यों नहीं था?

यदि भूमि नगर निगम की थी, तो उसका विधिवत सीमांकन क्यों नहीं कराया गया?

यदि भूमि राजस्व विभाग की थी, तो उसका रिकॉर्ड नगर निगम के पास क्यों उपलब्ध नहीं था?

यदि किसी प्रकार का अतिक्रमण हुआ, तो वह वर्षों तक प्रशासन की नजर से कैसे बचा रहा?

इन सवालों के जवाब केवल वर्तमान अधिकारियों से नहीं, बल्कि उस पूरी प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े हैं जिसने वर्षों तक इन बाजारों को बिना स्पष्ट भूमि प्रबंधन के संचालित होने दिया।

हाट-बाजार: गरीब की अर्थव्यवस्था का आधार

साप्ताहिक हाट बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों की तरह नहीं होते। यहां गांव का किसान अपनी सब्जी बेचता है, महिला स्वयं सहायता समूह अपने उत्पाद लाते हैं, छोटे दुकानदार सीमित पूंजी से व्यवसाय करते हैं और स्थानीय उपभोक्ताओं को सस्ती वस्तुएं उपलब्ध होती हैं।

यदि बिना वैकल्पिक व्यवस्था के किसी भी बाजार पर कार्रवाई होती है तो सबसे अधिक प्रभावित वही वर्ग होगा जिसकी आजीविका पहले से ही सीमित है।

इसलिए प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि वैधानिक कार्रवाई और आजीविका संरक्षण दोनों साथ-साथ चलें।

जनसुरक्षा का मुद्दा भी महत्वपूर्ण

पुलिस द्वारा निरीक्षण का आधार जनसुरक्षा बताया गया है। यह उचित भी है।

यदि बाजारों में—

  • अग्निशमन की व्यवस्था नहीं है,
  • आपातकालीन निकास मार्ग अवरुद्ध हैं,
  • यातायात बाधित होता है,
  • एम्बुलेंस और फायर ब्रिगेड का प्रवेश संभव नहीं है,

तो प्रशासन का हस्तक्षेप आवश्यक है।

लेकिन जनसुरक्षा के नाम पर केवल छोटे व्यापारियों पर कार्रवाई करना समाधान नहीं होगा। प्रशासन को पहले अपनी योजना, प्रबंधन और निगरानी व्यवस्था पर भी आत्ममंथन करना होगा।

भूमि प्रबंधन की पुरानी समस्या

उत्तराखंड के अधिकांश नगरों में सार्वजनिक भूमि का डिजिटल रिकॉर्ड आज भी अधूरा है।

नगर निगम, राजस्व विभाग और विकास प्राधिकरण के रिकॉर्ड कई बार एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।

यही कारण है कि वर्षों बाद अचानक यह प्रश्न उठता है कि जिस भूमि पर बाजार लग रहा है, उसका वास्तविक स्वामी कौन है।

यदि भूमि प्रबंधन समय पर होता तो आज यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती।

क्या केवल अतिक्रमण ही मुद्दा है?

उपलब्ध दस्तावेजों से यह स्पष्ट नहीं होता कि किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा अतिक्रमण सिद्ध हो चुका है। दस्तावेज केवल जांच और अभिलेख उपलब्ध कराने की प्रक्रिया दर्शाते हैं।

इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना अभी जल्दबाजी होगी।

लेकिन यदि जांच में अनियमितताएं सामने आती हैं तो यह भी देखा जाना चाहिए कि—

  • क्या किसी अधिकारी की लापरवाही रही?
  • क्या बिना अनुमति बाजार संचालित होते रहे?
  • क्या किसी विभाग ने समय रहते आपत्ति नहीं उठाई?
  • क्या नगर निगम द्वारा बाजार शुल्क लिया जाता रहा?

यदि उत्तर “हाँ” है तो जवाबदेही केवल दुकानदारों की नहीं हो सकती।

प्रशासन को पारदर्शिता अपनानी होगी

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता पारदर्शिता की है।

नगर निगम और जिला प्रशासन को सार्वजनिक रूप से यह बताना चाहिए—

  • प्रत्येक हाट-बाजार किस भूमि पर संचालित हो रहा है।
  • भूमि का स्वामी कौन है।
  • सीमांकन कब होगा।
  • यदि कोई अतिक्रमण है तो उसकी प्रकृति क्या है।
  • कार्रवाई की समय-सीमा क्या होगी।
  • छोटे व्यापारियों के हितों की रक्षा कैसे की जाएगी।

छोटे व्यापारियों को विश्वास में लेना होगा

अक्सर प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान संवाद का अभाव विवाद को जन्म देता है।

यदि वास्तव में किसी बाजार का पुनर्गठन आवश्यक है, तो—

  • व्यापारियों,
  • स्थानीय जनप्रतिनिधियों,
  • बाजार समिति,
  • सामाजिक संगठनों

के साथ बैठक कर समाधान निकाला जाना चाहिए।

कोटद्वार के लिए अवसर भी

यदि यह प्रक्रिया पारदर्शी और विधिसम्मत ढंग से पूरी होती है, तो कोटद्वार अपने साप्ताहिक हाट-बाजारों को अधिक व्यवस्थित बना सकता है।

भविष्य में—

  • स्थायी दुकान चिन्हांकन,
  • पार्किंग व्यवस्था,
  • अग्निशमन सुरक्षा,
  • स्वच्छता,
  • सीसीटीवी,
  • डिजिटल शुल्क व्यवस्था,
  • महिला एवं दिव्यांग अनुकूल सुविधाएं,

जैसी व्यवस्थाएं विकसित की जा सकती हैं।

निष्कर्ष

कोटद्वार के हाट-बाजारों की भूमि की जांच केवल सीमांकन का मामला नहीं है; यह प्रशासनिक पारदर्शिता, सार्वजनिक भूमि प्रबंधन और स्थानीय अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करने की परीक्षा भी है।

यह आवश्यक है कि जांच निष्पक्ष, तथ्यों पर आधारित और विधिसम्मत हो। साथ ही, दशकों से इन बाजारों पर निर्भर छोटे व्यापारियों और किसानों के हितों की भी रक्षा की जाए। यदि जांच में कोई अनियमितता सामने आती है, तो जिम्मेदारी केवल अंतिम कड़ी पर नहीं, बल्कि उन संस्थागत कमियों पर भी तय होनी चाहिए जिन्होंने ऐसी स्थिति को वर्षों तक बनने दिया।

कोटद्वार के लिए यह केवल भूमि विवाद नहीं, बल्कि एक अवसर है—सार्वजनिक परिसंपत्तियों के बेहतर प्रबंधन, पारदर्शी प्रशासन और सुव्यवस्थित शहरी विकास की दिशा में एक ठोस कदम उठाने का।


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By udaen

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