उत्तराखंड में वनाधिकार कानून की हकीकत और जनजातीय समुदायों का संघर्ष
(शोधपरक संपादकीय – भाग 1)
भारत के संविधान ने अनुसूचित जनजातियों को केवल एक प्रशासनिक श्रेणी के रूप में नहीं देखा, बल्कि उन्हें देश की सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षक के रूप में भी स्वीकार किया है। विडंबना यह है कि जिन समुदायों ने सदियों तक जंगलों को बचाया, औषधीय पौधों का संरक्षण किया, जल स्रोतों की रक्षा की और हिमालय की पारिस्थितिकी को जीवित रखा, वही समुदाय आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था में सबसे अधिक अधिकारविहीन दिखाई देते हैं।
लोकसभा में केंद्रीय जनजातीय मामलों के राज्य मंत्री दुर्गादास उइके द्वारा यह जानकारी देना कि 5 जून 2025 को जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने उत्तराखंड सरकार तथा देहरादून, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली, उधमसिंह नगर, हरिद्वार, पौड़ी गढ़वाल, नैनीताल और टिहरी गढ़वाल के जिला प्रशासन को वनाधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के संबंध में पत्र भेजा था, केवल एक सरकारी सूचना नहीं है। यह संकेत है कि स्वयं केंद्र सरकार को भी यह महसूस हुआ कि राज्य में वनाधिकार अधिनियम (Forest Rights Act, 2006) का क्रियान्वयन अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पाया है।
यह प्रश्न केवल प्रशासनिक नहीं है। यह न्याय, आजीविका, पर्यावरण, संविधान और लोकतंत्र से जुड़ा हुआ विषय है।
ऐतिहासिक अन्याय की पृष्ठभूमि
ब्रिटिश शासन ने 1865, 1878 और 1927 के भारतीय वन कानूनों के माध्यम से विशाल वन क्षेत्रों को सरकारी नियंत्रण में ले लिया। जिन जंगलों पर स्थानीय समुदायों का पारंपरिक अधिकार था, वे अचानक “सरकारी वन” घोषित कर दिए गए।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले अनेक समुदायों का जीवन जंगलों पर आधारित था। उनके लिए जंगल केवल लकड़ी या ईंधन का स्रोत नहीं थे। जंगल उनकी संस्कृति, धार्मिक आस्था, पशुपालन, कृषि, औषधीय ज्ञान और स्थानीय अर्थव्यवस्था का आधार थे।
स्वतंत्रता के बाद भी स्थिति में बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं आया। वन संरक्षण के नाम पर अनेक क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों के पारंपरिक अधिकार सीमित होते चले गए।
इसी ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार करते हुए संसद ने वर्ष 2006 में अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम पारित किया। कानून की प्रस्तावना स्पष्ट रूप से कहती है कि इसका उद्देश्य “ऐतिहासिक अन्याय” को समाप्त करना है।
उत्तराखंड की विशेष परिस्थितियाँ
उत्तराखंड अन्य राज्यों की तुलना में अलग है।
राज्य का लगभग 71 प्रतिशत भूभाग वन क्षेत्र के अंतर्गत आता है। अनेक गाँव वन सीमाओं से घिरे हुए हैं। यहाँ वन संरक्षण और स्थानीय जीवन एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते।
राज्य में पाँच प्रमुख अनुसूचित जनजातियाँ—भोटिया, थारू, बुक्सा, राजी और जौनसारी—अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान रखती हैं। इनके अतिरिक्त वन गुज्जर जैसे पशुपालक समुदाय भी हैं, जिनकी आजीविका मौसमी प्रवास और पारंपरिक चराई मार्गों पर आधारित है।
विडंबना यह है कि आज भी अनेक समुदायों को अपने पारंपरिक चरागाहों, वन उत्पादों और मौसमी संसाधनों तक पहुँच के लिए प्रशासनिक स्वीकृतियों पर निर्भर रहना पड़ता है।
केंद्र सरकार का पत्र क्यों महत्वपूर्ण है?
लोकसभा में दिए गए उत्तर के अनुसार जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने राज्य सरकार और नौ जिलों को विशेष रूप से यह सुनिश्चित करने को कहा कि कोई भी पात्र व्यक्ति वनाधिकार से वंचित न रहे।
विशेष उल्लेख वन अधिकार अधिनियम की धारा 3(1)(d) का किया गया, जिसके अंतर्गत खानाबदोश तथा पशुपालक समुदायों को उनके पारंपरिक मौसमी संसाधनों तक सामुदायिक पहुँच का अधिकार दिया गया है।
यह उल्लेख सामान्य नहीं है।
इसका अर्थ यह भी है कि मंत्रालय को यह आशंका रही होगी कि ऐसे समुदायों के अधिकार पर्याप्त रूप से लागू नहीं हो पाए हैं।
क्या उत्तराखंड में वनाधिकार कानून सफल रहा?
यहीं से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न शुरू होता है।
यदि लगभग दो दशक पहले लागू हुआ कानून आज भी केंद्र सरकार को राज्यों को पत्र लिखने के लिए विवश कर रहा है, तो यह मान लेना कठिन है कि उसका उद्देश्य पूरी तरह पूरा हो चुका है।
उत्तराखंड में वनाधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन की गति लंबे समय से चर्चा का विषय रही है।
कई सामाजिक संगठनों का आरोप रहा है कि—
- ग्राम सभाओं को पर्याप्त अधिकार नहीं दिए गए।
- सामुदायिक वन अधिकारों की तुलना में व्यक्तिगत दावों पर अधिक ध्यान दिया गया।
- अनेक दावे दस्तावेजों के अभाव में निरस्त कर दिए गए।
- वन विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच समन्वय की कमी रही।
- पात्र समुदायों को कानून की जानकारी तक पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं कराई गई।
यदि ये आरोप सही हैं, तो यह केवल प्रशासनिक कमी नहीं बल्कि कानून की मूल भावना से विचलन है।
पर्यावरण बनाम अधिकार—एक कृत्रिम बहस
उत्तराखंड में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि यदि वनाधिकारों का व्यापक क्रियान्वयन किया गया तो जंगलों पर दबाव बढ़ जाएगा।
लेकिन क्या यह तर्क तथ्यों पर आधारित है?
विश्व के अनेक देशों के अनुभव बताते हैं कि जिन समुदायों को अपने प्राकृतिक संसाधनों पर वैधानिक अधिकार और जिम्मेदारी दोनों मिलती हैं, वे संसाधनों के संरक्षण में अधिक सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
उत्तराखंड स्वयं इसका उदाहरण रहा है। चिपको आंदोलन ने यह सिद्ध किया था कि स्थानीय समुदाय जंगलों के सबसे बड़े रक्षक हो सकते हैं। वन पंचायतों की अवधारणा भी इसी विश्वास पर आधारित थी कि स्थानीय भागीदारी से संरक्षण अधिक प्रभावी होता है।
फिर प्रश्न उठता है कि जिन समुदायों पर संरक्षण का भरोसा किया जाता है, उन्हें अधिकार देने में संकोच क्यों दिखाई देता है?
क्या केवल पत्र पर्याप्त हैं?
केंद्र सरकार का पत्र स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन किसी भी कानून की सफलता पत्राचार से नहीं, बल्कि उसके ज़मीनी परिणामों से मापी जाती है।
जब तक ग्राम सभाओं के निर्णयों का सम्मान नहीं होगा, लंबित दावों का समयबद्ध निस्तारण नहीं होगा, सामुदायिक वन संसाधनों की विधिवत मान्यता नहीं मिलेगी और जनजातीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी नहीं दी जाएगी, तब तक वनाधिकार अधिनियम का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा।
उत्तराखंड के संदर्भ में यह मुद्दा केवल जनजातीय अधिकारों का नहीं, बल्कि हिमालय के भविष्य का भी प्रश्न है। यदि जंगलों के वास्तविक संरक्षक स्वयं अधिकारविहीन रहेंगे, तो संरक्षण की पूरी व्यवस्था भी कमजोर होगी।
