नई दिल्ली/देहरादून। केंद्र सरकार ने उत्तराखंड में अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों के वनाधिकारों के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर राज्य सरकार और नौ जिलों के प्रशासन को आवश्यक निर्देश जारी किए हैं।
लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में जनजातीय मामलों के राज्य मंत्री दुर्गादास उइके ने बुधवार को बताया कि जनजातीय मामलों के मंत्रालय (MoTA) ने 5 जून 2025 को उत्तराखंड सरकार तथा देहरादून, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली, उधमसिंह नगर, हरिद्वार, पौड़ी गढ़वाल, नैनीताल और टिहरी गढ़वाल के जिला प्रशासन को पत्र भेजा था।
मंत्री ने बताया कि उत्तराखंड सरकार के जनजातीय कल्याण विभाग ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए संबंधित जिला प्रशासन को आवश्यक कार्रवाई करने और लंबित मुद्दों के समाधान के निर्देश दिए हैं।
वनाधिकार से कोई पात्र व्यक्ति वंचित न रहे
केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से लगातार आग्रह किया है कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act) के तहत किसी भी पात्र लाभार्थी को उसके वैधानिक अधिकारों से वंचित न किया जाए।
विशेष रूप से मंत्रालय ने अधिनियम की धारा 3(1)(d) का उल्लेख करते हुए कहा है कि खानाबदोश और पशुपालक समुदायों को उनके पारंपरिक मौसमी संसाधनों तक सामुदायिक पहुँच के अधिकार सुनिश्चित किए जाने चाहिए। इन अधिकारों का उद्देश्य ऐसे समुदायों की पारंपरिक आजीविका, चराई मार्गों और मौसमी प्रवास से जुड़े संसाधनों की कानूनी सुरक्षा प्रदान करना है।
उत्तराखंड के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में भोटिया, वन गुज्जर, जौनसारी, थारू, बुक्सा और अन्य पारंपरिक वन-आश्रित समुदायों की आजीविका लंबे समय से जंगलों और मौसमी संसाधनों पर निर्भर रही है। ऐसे में वनाधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन से इन समुदायों के व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों की सुरक्षा को बल मिल सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जिला स्तर पर दावों का समयबद्ध निस्तारण और सामुदायिक अधिकारों की विधिवत मान्यता सुनिश्चित होती है, तो इससे पारंपरिक आजीविका, वन संरक्षण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी आधारित प्रबंधन व्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
महत्वपूर्ण तथ्य
- 5 जून 2025 को MoTA ने उत्तराखंड सरकार और 9 जिलों को पत्र जारी किया।
- राज्य के जनजातीय कल्याण विभाग ने संबंधित जिलाधिकारियों को कार्रवाई के निर्देश दिए।
- केंद्र ने सभी पात्र लाभार्थियों को वनाधिकार सुनिश्चित करने पर जोर दिया।
- FRA की धारा 3(1)(d) के तहत खानाबदोश एवं पशुपालक समुदायों के पारंपरिक मौसमी संसाधनों तक सामुदायिक पहुँच के अधिकार को विशेष रूप से लागू करने की बात कही गई है।
