जब विकास और लालच के बीच पिसने लगता है हिमालय
उत्तराखंड के जंगलों में रहने वाला बाघ, तेंदुआ, भालू या हाथी कभी पहाड़ को लूटकर नहीं ले जाता। वह प्रकृति के नियमों का पालन करता है। वह उतना ही लेता है जितना उसके जीवन के लिए आवश्यक है। लेकिन मनुष्य, जब लालच से संचालित होता है, तो वह पूरे पहाड़ का भूगोल, पर्यावरण और भविष्य बदल देता है। इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि पहाड़ को जंगली जानवरों से कैसे बचाया जाए, बल्कि यह है कि पहाड़ को उन लोगों से कैसे बचाया जाए जो विकास, निवेश और रोजगार के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का असीमित दोहन करना चाहते हैं।
हिमालय दुनिया की सबसे युवा पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। यह अभी भी भूगर्भीय रूप से सक्रिय है। वैज्ञानिक लगातार बताते रहे हैं कि यह क्षेत्र भूकंप, भूस्खलन, बादल फटना और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी प्राकृतिक घटनाओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील है। ऐसे क्षेत्र में विकास असंभव नहीं है, लेकिन विकास का मॉडल वैज्ञानिक, संतुलित और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए।
दुर्भाग्य से उत्तराखंड में विकास की चर्चा अक्सर परियोजनाओं की संख्या, निवेश की राशि और उद्घाटनों तक सीमित रह जाती है। बहुत कम चर्चा इस बात पर होती है कि किसी परियोजना का दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभाव क्या होगा। क्या नदी की धारा बदलेगी? क्या भूजल प्रभावित होगा? क्या जंगलों का नुकसान होगा? क्या स्थानीय समुदायों की आजीविका सुरक्षित रहेगी? क्या आपदा का जोखिम बढ़ेगा? यही वे प्रश्न हैं जो लोकतंत्र में पूछे जाने चाहिए।
उत्तराखंड में समय-समय पर अवैध खनन, नदियों से अत्यधिक सामग्री निकासी, वन कटान, नदी तटों पर अतिक्रमण और अनियोजित निर्माण जैसे मुद्दे सार्वजनिक बहस का हिस्सा रहे हैं। यह आवश्यक है कि इन सभी मामलों में कानून का समान रूप से पालन हो और यदि कहीं अनियमितताएँ हों तो उनकी निष्पक्ष जाँच तथा जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास दोनों को कानून के दायरे में संतुलित करना ही सुशासन की कसौटी है।
केदारनाथ त्रासदी, जोशीमठ भू-धंसाव और मानसून के दौरान बार-बार होने वाले भूस्खलन हमें यह याद दिलाते हैं कि हिमालय की अपनी सीमाएँ हैं। हर प्राकृतिक घटना का कारण मानव गतिविधियाँ नहीं होतीं, लेकिन अनेक विशेषज्ञों ने यह अवश्य कहा है कि अनियोजित निर्माण, ढलानों की अत्यधिक कटाई और पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी जोखिम को बढ़ा सकती है। इसलिए विकास परियोजनाओं की वैज्ञानिक समीक्षा और पर्यावरणीय प्रभाव का गंभीर मूल्यांकन अनिवार्य होना चाहिए।
चारधाम सड़क परियोजना, जलविद्युत परियोजनाएँ और पर्यटन अवसंरचना जैसे विषयों पर वर्षों से अलग-अलग मत रहे हैं। एक पक्ष इन्हें विकास और सामरिक दृष्टि से आवश्यक मानता है, जबकि दूसरा पक्ष पर्यावरणीय प्रभावों पर चिंता व्यक्त करता है। लोकतांत्रिक समाज में दोनों पक्षों की बात सुनना और वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर निर्णय लेना ही सबसे उचित मार्ग है।
आज उत्तराखंड में सबसे अधिक आवश्यकता ‘ईकोलॉजिकल गवर्नेंस’ की है—ऐसी व्यवस्था जिसमें विकास का प्रत्येक निर्णय पर्यावरण, स्थानीय समाज और भविष्य की पीढ़ियों के हितों को ध्यान में रखकर लिया जाए। केवल आर्थिक लाभ को सफलता का पैमाना मानना हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र के लिए पर्याप्त नहीं है।
इस प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। जिन लोगों ने पीढ़ियों से जंगलों, जल स्रोतों और पहाड़ों की रक्षा की है, उन्हें विकास की योजनाओं में भागीदार बनाया जाना चाहिए, केवल दर्शक नहीं। ग्राम सभाओं, स्थानीय निकायों और नागरिक समाज की सक्रिय भागीदारी से विकास अधिक टिकाऊ और स्वीकार्य बन सकता है।
पत्रकारिता की भी एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। मीडिया का काम केवल आपदाओं की तस्वीरें दिखाना नहीं, बल्कि उन नीतियों, प्रक्रियाओं और निर्णयों की पड़ताल करना भी है जो भविष्य में जोखिम बढ़ा सकते हैं। सत्ता से प्रश्न पूछना, तथ्यों की जाँच करना और जनता के सामने संतुलित जानकारी रखना ही स्वतंत्र पत्रकारिता का मूल दायित्व है।
हिमालय केवल उत्तराखंड की पहचान नहीं, बल्कि पूरे भारत की जल और पर्यावरण सुरक्षा का आधार है। यदि पहाड़ सुरक्षित रहेंगे तो नदियाँ सुरक्षित रहेंगी, खेती सुरक्षित रहेगी और करोड़ों लोगों का भविष्य सुरक्षित रहेगा।
अंततः यह याद रखना होगा कि सबसे बड़ा शिकारी वह नहीं जो जंगल में रहता है, बल्कि वह है जो लालच में प्रकृति की सीमाएँ भूल जाता है। जानवर कभी पहाड़ को लूटकर नहीं ले जाते, लेकिन मनुष्य यदि विवेक खो दे तो वह आने वाली पीढ़ियों के हिस्से का हिमालय भी बेच सकता है।
अब समय आ गया है कि उत्तराखंड विकास की दौड़ में सबसे आगे नहीं, बल्कि संतुलित, वैज्ञानिक और टिकाऊ विकास का राष्ट्रीय उदाहरण बने। यही पहाड़ के प्रति हमारी सच्ची जिम्मेदारी होगी।
