माल्टा, बुरांश और आंवला: समस्या फूलों और फलों की नहीं, व्यवस्था की है
उत्तराखंड के पहाड़ों में हर साल बुरांश के फूल जंगलों को लाल कर देते हैं। माल्टा के पेड़ फलों से लद जाते हैं और आंवला भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है। ये कोई पारंपरिक कृषि फसलें नहीं हैं जिन्हें हर मौसम में बोया और काटा जाता हो। ये पहाड़ की प्राकृतिक और बागवानी आधारित संपदा हैं, जो स्थानीय पारिस्थितिकी, संस्कृति और अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। फिर भी सवाल वही है—इतनी समृद्ध प्राकृतिक पूंजी होने के बावजूद पहाड़ के लोगों की आय और आजीविका में अपेक्षित सुधार क्यों नहीं हो पाया?
समस्या की जड़ तक पहुंचने के लिए यदि “5 Whys” की पद्धति अपनाई जाए तो स्पष्ट होता है कि असफलता फूलों या फलों की नहीं, बल्कि उस आर्थिक ढांचे की है जो इन्हें मूल्य में बदलने में विफल रहा है।
माल्टा इसलिए नहीं सड़ता कि उसमें गुणवत्ता की कमी है। बुरांश इसलिए जंगल में नहीं झरता कि उसकी मांग नहीं है। आंवला इसलिए कम कीमत पर नहीं बिकता कि उसके गुण कम हैं। वास्तविक समस्या यह है कि इन उत्पादों को संग्रहण, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और विपणन से जोड़ने वाली श्रृंखला कमजोर है।
दशकों से पहाड़ को उत्पादन क्षेत्र के रूप में देखा गया, लेकिन मूल्य निर्माण का केंद्र नहीं बनाया गया। नतीजा यह हुआ कि प्राकृतिक संसाधन तो मौजूद रहे, लेकिन उनसे जुड़ी स्थानीय अर्थव्यवस्था विकसित नहीं हो सकी। जहां दुनिया “नेचुरल”, “ऑर्गेनिक” और “हेल्थ प्रोडक्ट्स” के नाम पर अरबों डॉलर का कारोबार कर रही है, वहीं उत्तराखंड का बुरांश और माल्टा अभी भी स्थानीय बाजारों और मौसमी बिक्री तक सीमित है।
यह केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है। यह विकास की उस सोच का परिणाम है जिसमें पहाड़ को संसाधनों का भंडार तो माना गया, लेकिन उद्यमिता, प्रसंस्करण और बाजार के केंद्र के रूप में नहीं देखा गया। यही कारण है कि प्राकृतिक संपदा होने के बावजूद रोजगार का संकट बना रहता है और पलायन जारी रहता है।
उत्तराखंड को अब उत्पादन बढ़ाने की नहीं, बल्कि मूल्य बढ़ाने की नीति की आवश्यकता है। बुरांश के फूल को पेय उद्योग, माल्टा को प्रसंस्कृत खाद्य उद्योग और आंवला को स्वास्थ्य एवं पोषण उद्योग से जोड़ना होगा। स्थानीय समुदायों, महिला समूहों, किसान उत्पादक संगठनों और छोटे उद्यमों को इस प्रक्रिया का केंद्र बनाना होगा।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि बुरांश कितना खिला या माल्टा कितना फलित हुआ। असली प्रश्न यह है कि इन फूलों और फलों से पहाड़ के लोगों को कितना आर्थिक और सामाजिक लाभ मिला। यदि इसका उत्तर संतोषजनक नहीं है, तो समस्या प्रकृति में नहीं, नीति और व्यवस्था में है। यही उत्तराखंड के विकास विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न भी है।
