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अगले पांच साल दुनिया के लिए क्यों हैं निर्णायक? WMO की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

दुनिया एक बार फिर रिकॉर्ड तोड़ गर्मी की ओर बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र की मौसम एजेंसी World Meteorological Organization (WMO) की नई रिपोर्ट ने संकेत दिया है कि वर्ष 2026 से 2030 के बीच पृथ्वी का तापमान अब तक के सबसे ऊंचे स्तर तक पहुंच सकता है। रिपोर्ट के अनुसार 86 प्रतिशत संभावना है कि इस अवधि का कोई एक वर्ष 2024 को पीछे छोड़ते हुए इतिहास का सबसे गर्म वर्ष बन जाएगा।

रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि 91 प्रतिशत संभावना है कि अगले पांच वर्षों में कम से कम एक वर्ष ऐसा होगा जब वैश्विक तापमान औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहेगा। यह वही सीमा है जिसे पेरिस जलवायु समझौते में एक महत्वपूर्ण लक्ष्य माना गया था।

क्यों बढ़ रही है गर्मी?

वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण जीवाश्म ईंधनों—कोयला, पेट्रोलियम और गैस—का लगातार बढ़ता उपयोग है। वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा लगातार बढ़ रही है, जिससे पृथ्वी अधिक गर्मी को अपने भीतर रोक रही है। इसके साथ ही 2026 के अंत तक संभावित एल नीनो (El Niño) प्रभाव भी तापमान को और ऊपर ले जा सकता है।

WMO के अनुसार 2025-2029 के लिए पांच वर्षीय औसत तापमान के 1.5°C से ऊपर रहने की संभावना 70 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, जो पिछले वर्षों की तुलना में काफी अधिक है।

इसका असर क्या होगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि तापमान में हर अतिरिक्त वृद्धि के साथ हीटवेव, सूखा, अत्यधिक वर्षा, जंगलों में आग, ग्लेशियरों का पिघलना और समुद्र स्तर में वृद्धि जैसी घटनाएं और गंभीर होंगी। WMO ने स्पष्ट कहा है कि हर अतिरिक्त दशमलव डिग्री गर्मी मानव जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जोखिम बढ़ाती है।

रिपोर्ट के अनुसार आर्कटिक क्षेत्र में गर्मी वैश्विक औसत से साढ़े तीन गुना अधिक गति से बढ़ सकती है। इससे ध्रुवीय बर्फ तेजी से पिघलेगी और दुनिया भर के मौसम चक्र प्रभावित होंगे।

भारत और उत्तराखंड के लिए क्या संकेत?

भारत पहले से ही लगातार बढ़ती हीटवेव, अनियमित मानसून, जल संकट और चरम मौसम घटनाओं का सामना कर रहा है। उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्यों में इसका असर और गंभीर हो सकता है। ग्लेशियरों का सिकुड़ना, जंगलों में आग की घटनाएं, असामान्य वर्षा और भूस्खलन जैसी आपदाएं जलवायु परिवर्तन से सीधे जुड़ी चुनौतियों के रूप में सामने आ रही हैं।

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन कम नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में जल, कृषि, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा पर दबाव और बढ़ सकता है।

केवल पर्यावरण नहीं, विकास का भी संकट

जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रह गया है। यह अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा और सामाजिक न्याय से जुड़ा वैश्विक संकट बन चुका है। WMO की यह रिपोर्ट दुनिया की सरकारों को यह याद दिलाती है कि समय तेजी से निकल रहा है। यदि कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण नहीं हुआ तो भविष्य की पीढ़ियों को अधिक अस्थिर और खतरनाक जलवायु का सामना करना पड़ सकता है।

WMO की आधिकारिक जानकारी: World Meteorological Organization (WMO) Climate Update


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By udaen

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