उत्तराखंड के पास देश का बड़ा वन क्षेत्र है, लेकिन क्या राज्य के पास उन जंगलों पर असली अधिकार भी है?
42वां संविधान संशोधन के बाद वन और वन्यजीव “समवर्ती सूची” में आए—यानी केंद्र और राज्य दोनों की भूमिका।
लेकिन आज स्थिति क्या है?
Forest Conservation Act 1980 के तहत जंगल की जमीन पर कोई भी बदलाव — अंतिम मंजूरी केंद्र से
Wildlife Protection Act 1972 के तहत संरक्षित क्षेत्रों में नीति — केंद्र का वर्चस्व
👉 राज्य सिर्फ प्रस्ताव भेजता है, फैसला दिल्ली करती है
और विडंबना देखिए:
परियोजना रुके → जवाबदेही राज्य की
मंजूरी देरी से मिले → नुकसान राज्य का
लेकिन नियंत्रण? → केंद्र के पास
इसका असर:
- विकास परियोजनाएं अटकती हैं
- मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है
- स्थानीय लोगों की भूमिका घटती है
National Tiger Conservation Authority जैसे संस्थान संरक्षण की बात करते हैं,
लेकिन पहाड़ के गांवों की ज़मीनी हकीकत अलग है।
सबसे बड़ा सवाल:
क्या उत्तराखंड सिर्फ “संरक्षण का बोझ” उठाएगा,
या उसे अपने संसाधनों पर नीति-निर्माण का अधिकार भी मिलेगा?
जब तक अधिकार और जवाबदेही साथ नहीं होंगे,
तब तक उत्तराखंड अपने ही जंगलों में ‘निर्णय का दर्शक’ बना रहेगा।
