देहरादून | 13 अक्टूबर 2026 | आपदा प्रबंधन एवं पर्यावरण

देहरादून। उत्तराखंड में हिमनद झीलों से उत्पन्न होने वाली संभावित आपदाओं की निगरानी और समय रहते चेतावनी जारी करने की दिशा में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक पहल पूरी हुई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर चमोली जिले के उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित वसुधारा ताल में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की निगरानी के लिए पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने का पहला चरण पूरा कर लिया गया है। अभियान पूरा करने के बाद वैज्ञानिक एवं तकनीकी दल वापस लौट आया है।
उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) में सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने दल का स्वागत किया। राज्य सरकार के अनुसार, उत्तराखंड में किसी ग्लेशियल झील पर इस प्रकार की पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने की यह पहली पहल है। इससे झील के जलस्तर, स्थानीय मौसम, बर्फ की स्थिति और आसपास की भू-गतिविधियों में होने वाले बदलावों की वैज्ञानिक निगरानी में मदद मिलेगी।
यह अभियान 29 सितंबर को मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन द्वारा वैज्ञानिक एवं तकनीकी दल को रवाना किए जाने के बाद शुरू हुआ था। इसमें केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI), रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के वैज्ञानिकों एवं तकनीकी विशेषज्ञों ने भाग लिया। SDRF, NDRF और ITBP ने भी अभियान में सहयोग दिया।
मुख्यमंत्री ने बताया आपदा प्रबंधन को मजबूत करने वाला कदम
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वसुधारा ताल में पूर्व चेतावनी प्रणाली की स्थापना के प्रथम चरण की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में ग्लेशियल झीलों से उत्पन्न संभावित खतरों की समय रहते पहचान करना बेहद जरूरी है।
मुख्यमंत्री के अनुसार, आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक अनुसंधान और संस्थागत समन्वय के माध्यम से राज्य की आपदा प्रबंधन व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया जा रहा है। वसुधारा ताल में स्थापित प्रणाली उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जोखिम की निगरानी और समयबद्ध चेतावनी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने भी इस पहल को ग्लेशियल झीलों की निगरानी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने कहा कि वैज्ञानिक और तकनीकी उपायों से राज्य की आपदा पूर्व तैयारी को मजबूत करने में मदद मिलेगी।
क्या है GLOF और क्यों जरूरी है इसकी निगरानी?
GLOF यानी Glacial Lake Outburst Flood ऐसी बाढ़ को कहा जाता है, जिसमें हिमनद के पास बनी झील से बड़ी मात्रा में पानी अचानक बाहर निकल जाता है। झील को रोकने वाली प्राकृतिक संरचना में बदलाव, भूस्खलन, हिमस्खलन या अन्य परिस्थितियों के कारण ऐसा हो सकता है।
ऐसी घटना होने पर झील से नीचे की ओर स्थित नदी घाटियों, बस्तियों, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुंचने का जोखिम हो सकता है। इसी वजह से ग्लेशियल झीलों के जलस्तर, मौसम और आसपास की भू-गतिविधियों में बदलाव की निगरानी को आपदा जोखिम न्यूनीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
झील और आसपास के क्षेत्र पर नजर रखेंगे अत्याधुनिक सेंसर
वसुधारा ताल में स्थापित प्रणाली में कई प्रकार के सेंसर लगाए गए हैं। इनका उद्देश्य झील और उसके आसपास की परिस्थितियों से संबंधित आंकड़े एकत्र करना है।
1. मौसम निगरानी सेंसर
ऑल-इन-वन मौसम सेंसर हवा की गति और दिशा, वर्षा, सौर विकिरण, वायु तापमान तथा वायुदाब से संबंधित आंकड़े मापेगा।
2. झील के जलस्तर की निगरानी
फ्लोटिंग और सबमर्ज्ड वाटर लेवल सेंसर झील के जलस्तर में होने वाले बदलावों को दर्ज करेंगे। इससे जलस्तर में असामान्य उतार-चढ़ाव की पहचान में मदद मिलेगी।
3. कंपन, झुकाव और भू-गतिविधियों का आकलन
संभावित बाढ़ के प्रभाव से जुड़ी तात्कालिक हलचल, कंपन और झुकाव की निगरानी के लिए दो एक्सेलेरोमीटर एवं टिल्ट सेंसर लगाए गए हैं। हिमस्खलन संबंधी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए एक अतिरिक्त एक्सेलेरोमीटर एवं टिल्ट सेंसर भी स्थापित किया गया है।
4. बर्फ की गहराई और तापमान
स्नो डेप्थ सेंसर बर्फ की गहराई मापेगा। बर्फ की सतह के नीचे अलग-अलग गहराइयों पर तापमान मापने के लिए सात सेंसर तथा झील की सतह का तापमान मापने के लिए एक अतिरिक्त सेंसर लगाया गया है।
इन सेंसरों से मिलने वाले आंकड़े झील और उसके आसपास की परिस्थितियों में होने वाले बदलावों को समझने तथा संभावित असामान्य स्थितियों की पहचान करने में सहायक होंगे।
हर दो घंटे में डेटा, आपात स्थिति में तत्काल संचार
अभियान दल के प्रमुख और CBRI, रुड़की के वैज्ञानिक डॉ. डीपी कानूनगो के अनुसार, सेंसरों एवं संचार प्रणाली के माध्यम से आंकड़ों के आदान-प्रदान का सत्यापन किया गया है। वापसी से पहले किए गए परीक्षण में डेटा अपेक्षा के अनुरूप प्राप्त हुआ।
सामान्य परिस्थितियों में सेंसर प्रत्येक दो घंटे में आंकड़े CBRI, रुड़की और USDMA में स्थापित डैशबोर्ड पर भेजेंगे। दोनों स्थानों पर प्राप्त आंकड़ों की नियमित निगरानी की जाएगी।
किसी आपातकालीन स्थिति में निर्धारित दो घंटे के अंतराल की प्रतीक्षा किए बिना सेंसर तत्काल आंकड़े भेज सकेंगे। इससे संभावित असामान्य परिस्थितियों की समय रहते पहचान करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
हालांकि, आंकड़ों का समय पर प्राप्त होना और वास्तविक खतरे की पहचान के बाद लोगों तक प्रभावी चेतावनी पहुंचना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। इस प्रणाली की वास्तविक उपयोगिता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण, अलर्ट जारी करने और संबंधित क्षेत्रों तक सूचना पहुंचाने की व्यवस्था कितनी प्रभावी रहती है।
मोबाइल नेटवर्क नहीं, इसलिए इरिडियम उपग्रह संचार का सहारा
वसुधारा ताल उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित है, जहां सामान्य मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं है। इस चुनौती से निपटने के लिए प्रणाली में इरिडियम उपग्रह संचार तकनीक का उपयोग किया गया है।
इसके माध्यम से सेंसरों से प्राप्त आंकड़े संबंधित डैशबोर्ड तक पहुंचाए जाएंगे। इस प्रकार दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्र में भी निगरानी व्यवस्था को संचालित करने की सुविधा मिलेगी।
उपकरणों को बिजली उपलब्ध कराने के लिए सौर पैनल और बैटरी लगाई गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 280 एम्पीयर क्षमता की बैटरी को इस तरह व्यवस्थित किया गया है कि पर्याप्त धूप न मिलने पर यह लगभग 10 दिनों तक बैकअप दे सके।
बिना सीमेंट के तैयार किया गया उपकरणों का आधार
उच्च हिमालयी क्षेत्र में उपकरणों की स्थापना के दौरान प्रतिकूल मौसम और उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखा गया। इसके लिए स्टील के मॉड्यूलर डिजाइन पर आधारित फाउंडेशन तैयार किया गया, जिसमें स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री और पत्थरों का उपयोग किया गया। इसमें सीमेंट का प्रयोग नहीं किया गया।
अभियान दल के अनुसार, क्षेत्र में हवा की गति लगभग 15 से 50 किलोमीटर प्रति घंटा आंकी गई है, जबकि फाउंडेशन का डिजाइन 100 किलोमीटर प्रति घंटा तक की हवा की गति को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
38.50 मीटर गहरा और 900 मीटर लंबा है वसुंधरा ताल
डॉ. डीपी कानूनगो के अनुसार, वसुधारा ताल की गहराई लगभग 38.50 मीटर, चौड़ाई करीब 600 मीटर और लंबाई लगभग 900 मीटर है।
उन्होंने बताया कि पूर्व के आंकड़ों और वर्तमान स्थिति की तुलना में झील के आकार में कोई विशेष बदलाव नहीं देखा गया है। उपकरणों की स्थापना के लिए ऐसे स्थान का चयन किया गया, जहां भूस्खलन और हिमस्खलन जैसी गतिविधियों का जोखिम अपेक्षाकृत कम है।
यह जानकारी झील की मौजूदा स्थिति को समझने में उपयोगी है। हालांकि, झील के आकार में विशेष बदलाव न मिलना अपने आप में भविष्य में GLOF का जोखिम समाप्त होने का प्रमाण नहीं है। इसके लिए नियमित निगरानी और वैज्ञानिक आकलन आवश्यक रहेगा।
अभियान में इन संस्थानों और बलों की रही भूमिका
वसुधारा ताल में पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने का अभियान उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने राष्ट्रीय ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के अंतर्गत संचालित किया।
अभियान में प्रमुख रूप से निम्न संस्थानों की भूमिका रही:
- केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI), रुड़की: वैज्ञानिक एवं तकनीकी सहयोग।
- वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून: हिमालयी भूविज्ञान संबंधी विशेषज्ञता।
- USDMA: समन्वय, लॉजिस्टिक सहायता और संचार उपकरण।
- SDRF, NDRF और ITBP: दुर्गम क्षेत्र में अभियान के संचालन और सुरक्षा में सहयोग।
अभियान दल के स्वागत के अवसर पर CBRI के निदेशक प्रो. आर. प्रदीप कुमार, USDMA के अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी (क्रियान्वयन) डीआईजी राजकुमार नेगी, ULMMC के निदेशक डॉ. शांतनु सरकार सहित अन्य वैज्ञानिक और अधिकारी उपस्थित रहे।
आगे क्या होगा?
वसुधारा ताल में पूर्व चेतावनी प्रणाली की स्थापना उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों की निगरानी को केवल सर्वेक्षण तक सीमित न रखकर नियमित उपकरण-आधारित आंकड़ों से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
इसका अगला महत्वपूर्ण पहलू सेंसरों से प्राप्त आंकड़ों का निरंतर विश्लेषण, संभावित खतरे के स्तर निर्धारित करना, संचार व्यवस्था को चालू बनाए रखना और जरूरत पड़ने पर चेतावनी को संबंधित प्रशासन तथा संवेदनशील क्षेत्रों तक पहुंचाना होगा।
राज्य सरकार ने इस पहल को आपदा प्रबंधन की वैज्ञानिक तैयारी मजबूत करने वाला कदम बताया है। अब इस प्रणाली के नियमित संचालन और प्राप्त आंकड़ों के आधार पर होने वाली कार्रवाई से इसकी प्रभावशीलता का आकलन किया जा सकेगा।
वसुधारा ताल में पूर्व चेतावनी प्रणाली की स्थापना उत्तराखंड के लिए महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि है। यह हिमालयी झीलों से जुड़े संभावित जोखिमों को समझने और समय रहते कार्रवाई की तैयारी को मजबूत करने में मदद कर सकती है। लेकिन तकनीकी निगरानी का वास्तविक लाभ तभी सुनिश्चित होगा, जब आंकड़ों से मिलने वाले संकेतों को विश्वसनीय चेतावनी, प्रभावी प्रशासनिक कार्रवाई और जोखिमग्रस्त आबादी की सुरक्षा से जोड़ा जाए।
स्रोत एवं तथ्याधार: उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण से संबंधित उपलब्ध सरकारी विवरण तथा अभियान संबंधी प्रकाशित रिपोर्टें। तकनीकी आंकड़े उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार प्रस्तुत किए गए हैं।
