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10 अक्टूबर को केरल हाउस के पास प्रदर्शन में पहुंचे अर्थशास्त्री ने भारी पुलिस बंदोबस्त पर उठाए सवाल; मतदाता सूची के पुनरीक्षण में पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों पर फिर चर्चा।

जंतर-मंतर के पास क्या हुआ?

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द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ज्याँ द्रेज़ 10 अक्टूबर को फिल्मकार अबान रज़ा, शोधकर्ता परन अमिताभ और कलाकार-शोधकर्ता अंजलि एस. के साथ केरल हाउस के पास पहुंचे थे। यह स्थान जंतर-मंतर के निकट है, जहां कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रदर्शन प्रस्तावित था।

द्रेज़ और उनके साथियों के हाथों में पोस्टर थे और वे मीडिया से बातचीत कर रहे थे। द्रेज़ के मुताबिक, पुलिस ने उन्हें बिना कारण बताए हिरासत में ले लिया। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य अपनी उपस्थिति दर्ज कराना था। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि प्रदर्शन में शामिल होने के इच्छुक लोगों की आवाजाही पर इतनी व्यापक पाबंदियां क्यों लगाई गईं।

द्रेज़ ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन से असंबंधित कुछ आम लोगों को भी हिरासत में लिया गया और उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ। ये आरोप मीडिया रिपोर्ट में उनके बयान के रूप में दर्ज हैं; इन्हें पुलिस या किसी न्यायिक जांच द्वारा प्रमाणित निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।

एसआईआर विवाद के केंद्र में क्या है?

एसआईआर यानी Special Intensive Revision मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण है। निर्वाचन आयोग का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना है, जबकि इसके आलोचक प्रक्रिया के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम छूटने, दस्तावेजों की उपलब्धता और आपत्तियों के निपटारे को लेकर चिंता जता रहे हैं।

दिल्ली में हाल के विरोध प्रदर्शनों में विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तथा कथित अनियमितताओं की जांच की मांग उठाई है। ये प्रदर्शनकारी पक्ष के आरोप और मांगें हैं, न कि अपने आप में अनियमितताओं का प्रमाण।

इस विवाद का मूल सवाल है कि मतदाता सूची को शुद्ध करने की प्रक्रिया में किसी पात्र नागरिक का नाम गलती से न छूटे और प्रभावित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का प्रभावी अवसर मिले। लोकतंत्र में मतदान का अधिकार तभी सार्थक होता है, जब पात्र मतदाता बिना अनुचित बाधाओं के चुनावी प्रक्रिया में भाग ले सकें।

कौन हैं ज्याँ द्रेज़?

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ज्याँ द्रेज़ — अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता

जन्म: 22 जनवरी 1959, बेल्जियम

भारत में गरीबी, भूख, शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के प्रश्नों पर उनके शोध और सक्रियता ने उन्हें विशिष्ट पहचान दिलाई। वे 1979 में भारत आए और 2002 में भारतीय नागरिक बने।

द्रेज़ का काम केवल अकादमिक शोध तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने सरकारी नीतियों के निर्माण, उनके क्रियान्वयन और आम लोगों तक उनके लाभ पहुंचने से जुड़े सवालों पर लगातार काम किया है।

  • मनरेगा: ग्रामीण परिवारों के लिए रोजगार गारंटी की अवधारणा और कानून के निर्माण से जुड़ी नीतिगत बहसों में योगदान दिया।
  • सूचना का अधिकार: सरकारी जवाबदेही और नागरिकों को सूचना उपलब्ध कराने के पक्ष में सक्रिय रहे।
  • भोजन का अधिकार: भूख, कुपोषण और खाद्य सुरक्षा को सार्वजनिक नीति के केंद्र में लाने वाले विमर्श में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • सामाजिक सुरक्षा: शिक्षा, स्वास्थ्य और कमजोर तबकों के जीवन स्तर से जुड़े मुद्दों पर शोध और जनपक्षधर हस्तक्षेप किया।

उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के साथ Hunger and Public Action तथा An Uncertain Glory: India and Its Contradictions जैसी चर्चित पुस्तकें लिखीं।

इलाहाबाद से लेकर राष्ट्रीय नीति तक का सफर

ज्याँ द्रेज़ ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग की योजना एवं विकास इकाई में मानद चेयर प्रोफेसर के रूप में काम किया। वे गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, झूंसी में भी विजिटिंग फैकल्टी रहे।

इलाहाबाद में उनके शैक्षणिक कार्य का महत्व इसलिए भी रहा कि रोजगार गारंटी, सूचना के अधिकार और खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दे केवल आर्थिक योजनाओं तक सीमित नहीं थे। वे इस बात से जुड़े थे कि सरकार नागरिकों के प्रति कितनी जवाबदेह हो, गरीब परिवारों को रोजगार और भोजन की सुरक्षा कैसे मिले तथा सरकारी योजनाओं को कानूनी अधिकारों का स्वरूप किस तरह दिया जाए।

इसी पृष्ठभूमि में दिल्ली के एसआईआर विरोध में उनकी भागीदारी महत्वपूर्ण दिखाई देती है। मनरेगा और सूचना के अधिकार जैसे कानूनों के संदर्भ में उनकी सार्वजनिक भूमिका सरकारी जवाबदेही और नागरिक अधिकारों के प्रश्नों से जुड़ी रही है। हालांकि, उनके पुराने नीतिगत योगदान को वर्तमान एसआईआर विवाद पर उनके किसी विशेष कानूनी निष्कर्ष के बराबर नहीं माना जाना चाहिए।

लोकतंत्र में मतदाता की जगह सबसे ऊपर

ज्याँ द्रेज़ की भागीदारी इस बहस को एक व्यापक दृष्टिकोण देती है। सामाजिक कल्याण की योजनाओं में पात्र व्यक्ति तक लाभ पहुंचना जितना जरूरी है, लोकतांत्रिक व्यवस्था में पात्र मतदाता का नाम मतदाता सूची में होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

एसआईआर के समर्थकों के लिए मतदाता सूची की शुद्धता महत्वपूर्ण है, तो आलोचकों के लिए यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि प्रक्रिया के कारण किसी पात्र नागरिक का मतदान का अवसर न छिने। इन दोनों उद्देश्यों के बीच संतुलन बनाने के लिए पारदर्शी प्रक्रिया, स्पष्ट नियम, प्रभावी आपत्ति-निवारण और समय पर सुनवाई आवश्यक हैं।

ज्याँ द्रेज़ का दिल्ली पहुंचना इसी व्यापक बहस की ओर ध्यान खींचता है—क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रक्रियाएं नागरिकों के अधिकारों को मजबूत कर रही हैं और क्या उन प्रक्रियाओं पर सवाल उठाने वालों को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का अवसर मिल रहा है?

समाचार स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस, 11 अक्टूबर 2026; हिंदुस्तान टाइम्स, 10 अक्टूबर 2026; Ideas for India में ज्याँ द्रेज़ का परिचय।


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By udaen

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