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“विश्व गुरु” की परिकल्पना: विचार, अवसर और चुनौतियां — दून की विचार गोष्ठी से उभरी दिशा

देहरादून के सर्वे चौक स्थित ऑडिटोरियम में आयोजित “भारत: विश्व गुरु की राह पर” विषयक उच्चस्तरीय विचार गोष्ठी ने भारत की वैश्विक भूमिका, नीतिगत प्राथमिकताओं और विकास मॉडल पर एक बहुस्तरीय विमर्श प्रस्तुत किया। , तथा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में नीति, प्रशासन, व्यापार और शहरी विकास से जुड़े वरिष्ठ विशेषज्ञों ने भाग लिया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता उत्तराखंड के मुख्य सचिव ने की, जबकि संचालन द्वारा किया गया। इस अवसर पर की पुस्तक Smarter than the Storm का विमोचन भी हुआ, जो भारत के आर्थिक और नीतिगत परिवर्तन की कहानी को समकालीन संदर्भ में प्रस्तुत करती है।


भारत की वैश्विक भूमिका: अवसर और अनिवार्य सुधार

पूर्व नीति आयोग सीईओ और G-20 शेरपा रहे अमिताभ कांत ने भारत की उभरती वैश्विक स्थिति को रेखांकित करते हुए पिछले एक दशक में तकनीक, कनेक्टिविटी और नीतिगत सुधारों में हुई प्रगति को निर्णायक बताया। उनका जोर तीन प्रमुख बिंदुओं पर रहा:

  • डेमोग्राफिक डिविडेंड का उपयोग: भारत की युवा आबादी को उत्पादक शक्ति में बदलना
  • स्किल एवं R&D गैप को पाटना: वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए नवाचार क्षमता बढ़ाना
  • गुणवत्ता-आधारित उत्पादन: “Zero Defect, Zero Effect” को औद्योगिक संस्कृति में लागू करना

कांत का स्पष्ट संकेत था कि यदि भारत को वैश्विक वैल्यू चेन में उच्च स्थान प्राप्त करना है, तो उसे निरंतर सुधार और नवाचार की दिशा में आगे बढ़ना होगा।


उत्तराखंड मॉडल: ग्रीन इकोनॉमी और जनभागीदारी

मुख्य सचिव आनंद बर्धन ने उत्तराखंड के संदर्भ में एक वैकल्पिक विकास मॉडल प्रस्तुत किया, जिसमें:

  • ग्रीन इकोनॉमी
  • पर्यटन एवं वेलनेस सेक्टर
  • जनभागीदारी आधारित विकास

को केंद्रीय स्तंभ बताया गया। उनका यह कथन—“जनभागीदारी के बिना विकास अधूरा है”—नीतिगत विमर्श में सहभागी शासन (participatory governance) की अनिवार्यता को रेखांकित करता है।


वैश्विक प्रतिस्पर्धा और भारत का आत्मचिंतन

ने ‘विश्व गुरु’ बनने की अवधारणा को केवल सांस्कृतिक या ऐतिहासिक गौरव तक सीमित न रखकर, उसे आत्मचिंतन और निरंतर सुधार से जोड़ने की आवश्यकता बताई। उनके अनुसार:

  • भारत की प्राचीन विरासत प्रेरणा दे सकती है,
  • लेकिन वैश्विक मंच पर टिकने के लिए गुणवत्ता, विश्वसनीयता और सकारात्मक दृष्टिकोण अनिवार्य हैं।

यह दृष्टिकोण भारत की सॉफ्ट पावर और नैतिक नेतृत्व की अवधारणा को आधुनिक आर्थिक यथार्थ से जोड़ता है।


व्यापार और गुणवत्ता: वैश्विक टिकाऊपन की शर्त

ने वैश्विक व्यापार परिप्रेक्ष्य में भारत की रणनीतिक क्षमता का विश्लेषण करते हुए कहा कि:

  • गुणवत्ता-आधारित प्रतिस्पर्धा ही दीर्घकालिक सफलता का आधार है
  • वैश्विक वैल्यू चेन में संतुलन और विश्वसनीयता बनाए रखना अनिवार्य है

उनका संदेश स्पष्ट था—जो देश गुणवत्ता सुनिश्चित करेगा, वही वैश्विक अर्थव्यवस्था में टिकेगा।


शहरीकरण: विकास का इंजन

ने शहरों को आर्थिक विकास के केंद्र के रूप में विकसित करने पर बल दिया। उन्होंने जिन प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया, वे हैं:

  • स्मार्ट अर्बन प्लानिंग
  • जल आपूर्ति, स्वास्थ्य और शिक्षा का सुदृढ़ीकरण
  • ग्रामीण-शहरी माइग्रेशन का संतुलन
  • तकनीक-आधारित शहरी प्रबंधन

यह दृष्टिकोण भारत के तीव्र शहरीकरण को एक अवसर के रूप में देखने की दिशा में महत्वपूर्ण है।


संपादकीय निष्कर्ष

यह विचार गोष्ठी इस तथ्य को पुष्ट करती है कि “विश्व गुरु” बनने की अवधारणा केवल सांस्कृतिक गौरव या राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि एक बहुआयामी नीति एजेंडा है।

  • इसमें आर्थिक प्रतिस्पर्धा,
  • सामाजिक समावेशन,
  • पर्यावरणीय संतुलन,
  • और प्रभावी शासन

सभी का संतुलित समावेश आवश्यक है।

उत्तराखंड जैसे राज्य, जहां प्राकृतिक संसाधन और मानव पूंजी दोनों उपलब्ध हैं, इस दृष्टि को जमीन पर उतारने के प्रयोगशाला बन सकते हैं—बशर्ते नीतियां जनभागीदारी और दीर्घकालिक दृष्टि के साथ लागू हों।


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By udaen

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