सत्ता से सच बोलना : लोकतंत्र की असली कसौटी
(संपादकीय)
किसी भी लोकतंत्र की मजबूती इस बात से नहीं आँकी जाती कि सत्ता कितनी शक्तिशाली है, बल्कि इससे आँकी जाती है कि सत्ता से सच कहने की कितनी आज़ादी और गुंजाइश मौजूद है। “सत्ता से सच बोलना” कोई नारा नहीं, बल्कि एक सामाजिक–राजनीतिक ज़िम्मेदारी है, जिसे निभाने वाले अक्सर अकेले पड़ जाते हैं।
इतिहास बताता है कि सत्ता स्वभाव से ही असहज होती है। वह प्रशंसा चाहती है, सवाल नहीं। लेकिन जब सवाल पूछने वाले ख़ामोश हो जाते हैं, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे भीड़तंत्र और फिर निरंकुशता में बदलने लगता है। सत्ता को आईना दिखाने का काम पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी और जागरूक नागरिक करते हैं—और यही भूमिका सबसे ज़्यादा जोखिम भरी भी होती है।
भारत का स्वतंत्रता आंदोलन इस बात का जीवंत उदाहरण है कि सच कैसे सत्ता की जड़ों को हिला सकता है। ने बिना हथियार उठाए, सिर्फ़ सत्य और नैतिक बल के सहारे साम्राज्यवादी सत्ता को चुनौती दी। वहीं ने सामाजिक सत्ता और जातिगत वर्चस्व के ख़िलाफ़ सच बोला, जिसकी क़ीमत उन्हें जीवन भर चुकानी पड़ी।
आज के दौर में सत्ता से सच बोलना और भी कठिन हो गया है। सोशल मीडिया के शोर, ट्रोल संस्कृति और राष्ट्रवाद के खोखले नारों के बीच असहमति को देशद्रोह और सवाल को षड्यंत्र बताया जाने लगा है। पत्रकारों पर मुक़दमे, कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी और लेखकों की चुप्पी—ये सब संकेत हैं कि सच कहना सस्ता नहीं रहा।
लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सत्ता की सबसे बड़ी कमजोरी सच ही होता है। सच देर से असर करता है, मगर स्थायी असर करता है। सत्ता बदल सकती है, चेहरे बदल सकते हैं, लेकिन सच अपना रास्ता खुद बनाता है।
लोकतंत्र में सबसे ख़तरनाक स्थिति वह नहीं होती जब लोग ग़लत के पक्ष में खड़े हों, बल्कि वह होती है जब सही के पक्ष में बोलने वाले चुप हो जाएँ। इसलिए आज ज़रूरत है कि सत्ता से टकराने की नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछने की संस्कृति को बचाया जाए।
क्योंकि अंततः—
सत्ता अस्थायी होती है,
लेकिन सच ही इतिहास लिखता है।
