संपादकीय: बाघ संरक्षण और जनजातीय अधिकार—स्वैच्छिक पुनर्वास के वादे की असल तस्वीर
लोकसभा में केंद्रीय जनजातीय मामलों के राज्य मंत्री श्री दुर्गादास उइके द्वारा दिया गया ताज़ा बयान देश के संरक्षण ढांचे और जनजातीय अधिकारों की संवेदनशील बहस को फिर एक बार केंद्र में लाता है। मंत्री ने साफ कहा कि बाघ अभ्यारण्यों के मुख्य और अत्यंत संवेदनशील आवासों से गांवों का पुनर्वास पूर्णतः स्वैच्छिक है—यह न केवल कानूनी प्रावधान है बल्कि नीति के रूप में भी इसे दोहराया जाता रहा है। लेकिन सवाल यह है कि जमीन पर स्थिति कितनी पारदर्शी और न्यायोचित है?
कानून का आश्वासन…
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 2006 की धारा 38V(5) और वन अधिकार अधिनियम, 2006 की धारा 4(2) स्पष्ट निर्देश देती हैं कि किसी भी पुनर्वास के लिए ग्राम सभा की पूर्व-सूचित और स्वतंत्र सहमति अनिवार्य होगी। कागज़ों पर यह सुरक्षा बेहद सुदृढ़ दिखती है। NTCA भी यह दावा करता है कि 257 गांवों का पुनर्वास पूरी तरह स्वेच्छा से हुआ है और राज्य स्तरीय समितियों को कोई जबरन विस्थापन की शिकायत नहीं मिली।
…और जमीनी चिंता
इसके ठीक विपरीत, जनजातीय मामलों के मंत्रालय को कई राज्यों से ग्राम सभाओं और नागरिक समाज संगठनों की ओर से बेदखली, दबाव, अपूर्ण अधिकार-निपटान और प्रक्रियागत कमियों से जुड़ी चिंताएँ लगातार भेजी जा रही हैं। सिमलीपाल, ताडोबा, नागरहोल, काली, रानी दुर्गावती और अचानकमार जैसे बड़े बाघ परिदृश्यों से आने वाली ये शिकायतें बताती हैं कि समुदायों का अनुभव सरकारी रिपोर्टों जितना सहज नहीं है।
यहां एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—क्या स्वैच्छिकता की परिभाषा हर जगह समान रूप से लागू हो रही है? यदि किसी गांव को वर्षों तक वन अधिकारों के दावों का निपटान नहीं मिलता, बुनियादी सुविधाओं में लगातार भेदभाव झेलना पड़ता है या संरक्षण के नाम पर अप्रत्यक्ष दबाव डाला जाता है, तो यह स्वैच्छिकता नहीं बल्कि संरचनात्मक विवशता है।
संरक्षण बनाम समुदाय – टकराव नहीं, साझेदारी
भारत का संरक्षण मॉडल तभी टिकाऊ हो सकता है जब उसे स्थानीय समुदायों का भरोसा और सहभागिता मिले। बाघों की सुरक्षा पर केंद्र और राज्य सरकारें हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च कर रही हैं—2024–25 में यह राशि 450 करोड़ से अधिक है। लेकिन इसी के समानांतर, यदि समुदायों की शिकायतें संवाद, सत्यापन और त्वरित समाधान के अभाव में अनसुनी रह जाती हैं, तो यह निवेश असंतुलित ही रहेगा।
सरकार की जवाबदेही
MoTA ने हाल के पत्रों (10 जनवरी और 22 अक्टूबर 2025) में एक बार फिर राज्यों को याद दिलाया है कि किसी भी पुनर्वास का आधार केवल स्वैच्छिकता ही हो सकती है। यह कदम स्वागत योग्य है, पर सवाल यह है कि—
- क्या ग्राम सभा की सहमति के दस्तावेज़ स्वतंत्र रूप से सत्यापित होते हैं?
- क्या अधिकार-निपटान और मुआवजा पारदर्शी तथा समयबद्ध है?
- क्या स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था मौजूद है, जो समुदायों की शिकायतों को सीधे दर्ज कर सके?
यदि इन सवालों के जवाब स्पष्ट नहीं हैं, तो फिर कानूनी स्वैच्छिकता और जमीनी वास्तविकता के बीच का अंतर और चौड़ा होता जाएगा।
आगे का रास्ता
भारत के पास दुनिया का सबसे व्यापक बाघ संरक्षण नेटवर्क है और लाखों वनवासियों की सांस्कृतिक-आर्थिक ज़रूरतें भी इसी पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी हैं। इन्हें एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखना गलत होगा। समाधान दो ही हैं—मजबूत पारदर्शिता और समुदाय-केंद्रित संरक्षण मॉडल।
- ग्राम सभा की सहमति की स्वतंत्र थर्ड-पार्टी पुष्टि
- सभी वन अधिकार दावों का समयबद्ध निपटारा
- पुनर्वास प्रक्रिया की खुली निगरानी
- संरक्षण लाभों का स्थानीय समुदायों के साथ साझा करना
स्वैच्छिक पुनर्वास का सिद्धांत तब ही सार्थक है जब उसके पीछे सम्मान, विश्वास और समानता हो।
संरक्षण की उपलब्धियाँ तभी स्थायी होंगी जब उसके केंद्र में बाघ ही नहीं, बल्कि जंगलों में सदियों से बसे लोग भी समान गरिमा के साथ शामिल हों।
