संपादकीय
लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ और हकीकत: चमकती हेडलाइनों के पीछे छुपा हुआ अंधेरा
लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है—एक ऐसा स्तंभ जो सत्ता को आईना दिखाता है, समाज की आवाज उठाता है, और न्याय व्यवस्था का प्रहरी माना जाता है। लेकिन उत्तराखंड का परिदृश्य कुछ अलग ही कहानी कह रहा है। यह कहानी लोकतंत्र की नहीं, बल्कि पत्रकारों की बदहाली और मीडिया मालिकों की मनमानी की है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने ब्लॉक और तहसील स्तर पर पत्रकारों को मान्यता देने और उनकी समस्याओं को दूर करने की घोषणा की—एक ऐसा कदम जो लंबे समय से जरूरी था। इसकी पृष्ठभूमि दर्दनाक है: कई पत्रकार मामूली बीमारियों का इलाज न करा पाने के कारण असमय मौत का शिकार हुए, और पीछे उनके परिवार सड़क पर आ खड़े हुए। यह वही पत्रकार हैं जिनकी कलम बड़े-बड़े घोटाले उजागर करती है, लेकिन उनकी अपनी जिंदगी बदहाली और असुरक्षा से भरी है।
धामी की घोषणा का स्वागत होना चाहिए था, लेकिन उसके साथ ही एक कड़वी सच्चाई उजागर हुई—राज्य के 90% से अधिक पत्रकार वास्तव में किसी न किसी ठेकेदार की “लेबर” हैं।
हाँ, लेबर।
न मीडिया हाउस का पहचान पत्र, न औपचारिक नियुक्ति, न वेतनमान, न सुरक्षा।
बस बाइलाइन छापकर बड़े अखबार यह भ्रम पैदा करते हैं कि यह उनका रिपोर्टर है—जबकि मालिक साफ कह देते हैं कि उनका उससे कोई ‘कानूनी’ लेना-देना नहीं।
यह स्थिति केवल उत्तराखंड की नहीं, बल्कि पूरे देश की बीमारी बन चुकी है।
जो स्वयं शोषित हैं, उनसे जनपक्षीय पत्रकारिता की उम्मीद करना अन्याय है।
जो अपने घर के किराए, बच्चों की फीस और इलाज के पैसों के लिए संघर्ष कर रहे हों, वे सत्ता से सवाल कैसे पूछ पाएंगे?
मीडिया मालिक सरकारों से करोड़ों के विज्ञापन लेते हैं, लेकिन अपने पत्रकारों को मजीठिया वेज बोर्ड तक की सिफारिशें लागू नहीं होने देते।
अगर मजीठिया लागू होता, तो 2500–15000 रुपये में काम कर रहे पत्रकार एक सम्मानजनक जीवन जी सकते थे।
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि अपनी एकता खो चुके पत्रकार गुटों और कबीलों में बंट गए हैं—और यही विखराव मीडिया मालिकों की सबसे बड़ी ताकत बन चुका है।
दूसरी तरफ, सरकार की आलोचना करना अब “देशद्रोह” के बराबर माना जाने लगा है।
सोशल मीडिया पर थोड़ी-सी असहमति दर्ज कर देने भर से झूठे मुकदमे, नोटिस और चार्जशीटों की लाइन लग जाती है।
पुलिस, मीडिया और सत्ता के बीच जो अनकहा गठजोड़ बन गया है, उसने पत्रकारों को लोकतंत्र का प्रहरी नहीं—बल्कि सिस्टम का बंधक बना दिया है।
आज हाल यह है कि बड़े-बड़े मुद्दों पर खबरें लिखने वाला पत्रकार अपने ही अधिकारों पर एक छोटा-सा लेख भी नहीं लिख पाता।
जो दूसरों के लिए न्याय मांगते हैं, वही अपने लिए न्याय की लड़ाई लड़ने की क्षमता खो चुके हैं।
यह परिस्थितियां हमें बताती हैं कि चौथे स्तंभ की नींव कमजोर हो रही है। और जब नींव कमजोर होती है, तो लोकतंत्र की पूरी इमारत हिल जाती है।
समाधान कठिन नहीं है—इच्छाशक्ति कठिन है।
पत्रकारों की अनिवार्य पहचान,
रोजगार की वैधानिकता,
मजीठिया वेज बोर्ड का वास्तविक पालन,
और सत्ता से स्वतंत्र संस्थागत सुरक्षा
—ये सब लोकतंत्र के हित में उतने ही जरूरी हैं, जितने पत्रकार खुद के लिए।
जब तक पत्रकार सुरक्षित नहीं, तब तक लोकतंत्र सुरक्षित नहीं।
जब तक पत्रकार स्वतंत्र नहीं, तब तक जनता की आवाज स्वतंत्र नहीं।
सवाल यह है कि हम चौथे स्तंभ को बचाना चाहते हैं,
या सिर्फ उसकी “चमकती हुई छवि” को?
