✍️ संपादकीय लेख ,दिनेश गुसाईं
भ्रष्टाचार पर पहली चोट — जागता उत्तराखंड और गैरसैंण की पुकार
कभी-कभी किसी विधानसभा की दीवारों में गूँजने वाला एक वाक्य पूरे प्रदेश की आत्मा को झकझोर देता है।
विपक्ष के उपनेता भुवन कापड़ी का यह कहना कि “भ्रष्टाचार की शुरुआत हमसे होती है” और “विधायक निधि से 15% कमीशन काट लिया जाता है” — सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि राज्य व्यवस्था की सबसे गहरी सच्चाई का उजागर होना है।
उत्तराखंड ने 25 वर्षों में बहुत कुछ पाया — सड़कें, इमारतें, संस्थान, योजनाएँ।
परंतु क्या हमने वह हासिल किया जिसके लिए यह राज्य बना था?
भुवन कापड़ी का वक्तव्य हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हमने पहाड़ तो अलग कर लिया, लेकिन पहाड़ का दर्द अब भी जस का तस है।
भ्रष्टाचार और असमानता की इस लड़ाई में अब आत्मचिंतन ही एकमात्र रास्ता है।
यह वक्तव्य केवल सत्ता की आलोचना नहीं है, यह आत्मस्वीकृति है —
एक ऐसा क्षण जब व्यवस्था अपने भीतर झाँकने को तैयार होती है।
जब एक जनप्रतिनिधि सदन के भीतर खड़ा होकर कहता है कि “हम गले तक भ्रष्टाचार में डूबे हैं”,
तो यह सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि नैतिक पुनर्जागरण की शुरुआत होती है।
और इसी आत्मजागरण के क्षण में हमें उस राजधानी के सपने को भी याद करना चाहिए,
जो उत्तराखंड की जनभावना से जुड़ा है — स्थायी राजधानी गैरसैंण।
यह केवल भौगोलिक निर्णय नहीं, बल्कि भावनात्मक न्याय का प्रतीक है।
गैरसैंण को राजधानी बनाना, पहाड़ की आत्मा को उसका सम्मान लौटाना होगा।
यहीं से शासन और जनता के बीच वह दूरी मिटेगी, जिसने भ्रष्टाचार को जन्म दिया है।
आज उत्तराखंड को किसी एक नारे या व्यक्ति की नहीं, बल्कि ईमानदारी और संवेदना पर आधारित नई राजनीति की आवश्यकता है।
भुवन कापड़ी का साहसिक वक्तव्य उस दिशा में पहला कदम है।
अब देखना यह है कि क्या यह “सदन में जागी आत्मा”
वास्तव में गैरसैंण से जागते उत्तराखंड का प्रतीक बन पाएगी।
