Spread the love

विषय: उत्तराखंड पंचायत चुनाव में कोर्ट-कचहरी बनाम ग्रामसभा की भूमिका पर बहस

“पंचायत चुनाव अब गांव में नहीं, कोर्ट में लड़े जा रहे हैं – क्या ग्रामसभा खुद चुन सकती है अपना प्रतिनिधि?”

स्थान: देहरादून / कोटद्वार

रिपोर्टर: संवाददाता, Udaen News Network

तारीख: 21 जुलाई 2025

मुख्य समाचार:

उत्तराखंड में पंचायती राज चुनाव अब गांव की चौपाल में नहीं बल्कि कोर्ट-कचहरी के गलियारों में लड़े जा रहे हैं। एक ओर राज्य चुनाव आयोग और प्रशासनिक व्यवस्था के तहत हो रहे पंचायत चुनावों में बढ़ते विवाद, नामांकन अयोग्यता, और चुनाव बाद मुकदमों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है, वहीं दूसरी ओर एक पुरानी बहस फिर से गरमाई है — क्या ग्रामसभा खुद अपने जनप्रतिनिधि का चयन नहीं कर सकती?

पृष्ठभूमि:

73वें संविधान संशोधन के तहत पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्राप्त है और प्रत्येक राज्य में चुनाव आयोग द्वारा इनका चुनाव कराया जाता है। परंतु उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहां परंपरागत ग्रामसभाएं अब भी सामाजिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, कई गांवों में यह मांग उठ रही है कि यदि पूरा गांव किसी एक योग्य व्यक्ति पर सहमति बना ले तो क्या उसे बिना चुनावी प्रक्रिया के पंचायत प्रतिनिधि घोषित नहीं किया जा सकता?

समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण:

ग्राम स्वराज और आत्मनिर्भर पंचायत की अवधारणा को मानने वाले विशेषज्ञ मानते हैं कि ग्रामसभा की भूमिका केवल मतदाता की नहीं, निर्णायक शक्ति की होनी चाहिए। यदि ग्रामसभा संगठित होकर सर्वसम्मति से प्रतिनिधि का चयन करती है, तो न तो प्रचार की जरूरत होती है, न धनबल का प्रदर्शन, न ही कोर्ट-कचहरी की दौड़।

लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का मत:

इस तरह के चयन संवैधानिक रूप से अमान्य हो सकते हैं जब तक कि राज्य चुनाव आयोग उन्हें मान्यता न दे। संवैधानिक चुनाव प्रक्रिया से हटकर कोई भी चयन, भले ही सामाजिक रूप से मान्य हो, सरकारी योजनाओं व फंडिंग में अड़चन पैदा कर सकता है।

जनता की राय:

कोटद्वार के नजदीकी एक गांव के बुजुर्ग बलबीर सिंह का कहना है,

“हमने गांव में मिल बैठकर एक नौजवान को चुन लिया था, लेकिन अधिकारियों ने कहा कि वो ‘चुना हुआ’ नहीं है। अब वही गांव दो गुटों में बंट गया है, और मामला कोर्ट तक पहुंच गया।”

विशेष रिपोर्ट बिंदु:

राज्य में पिछले दो सालों में पंचायत चुनाव संबंधी 400 से अधिक केस कोर्ट में लंबित हैं।

कई गांवों में पंच व प्रधान का चुनाव न होने से विकास योजनाएं अटकी हुई हैं।

कुछ जगहों पर ग्रामसभा द्वारा सहमति से चुने गए प्रत्याशियों को भी प्रशासन द्वारा अमान्य कर दिया गया।

निष्कर्ष और सुझाव:

पंचायत चुनाव प्रक्रिया को सरल बनाया जाए।

ग्रामसभा की राय को संवैधानिक प्रक्रिया में एक स्थान दिया जाए।

कोर्ट-कचहरी से पंचायत व्यवस्था को बचाने के लिए संवाद, सुलह और सामूहिक चेतना की आवश्यकता है।

यदि गांव एक स्वर में बोले, तो उसे संवैधानिक मान्यता दिलाने की दिशा में सुधार जरूरी है।

“गांव की सरकार यदि गांव नहीं बनाएगा, तो फिर कौन बनाएगा?”

Udaen News Network, ग्राम से सीधे सवाल कर रहा है — क्या ग्रामसभा की राय सर्वोच्च मानी जानी चाहिए या सिर्फ वोटिंग मशीन ही लोकतंत्र है।


Spread the love

By udaen

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *