Spread the love

जैन पांडुलिपि पर राष्ट्रीय कार्यशाला अल्पसंख्यको की विरासत के संरक्षण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है

भारत की सभ्यतागत गहराई और समावेशी सांस्कृतिक नीति को दर्शाने वाली एक ऐतिहासिक पहल के तहत, उन्नत अनुसंधान के माध्यम से भारतीय ज्ञान प्रमाणीकरण विभाग के तत्वावधान में आज गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद में जैन पाण्डुलिपि के महत्व पर एक राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की गई।

भारत सरकार के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम (पीएमजेवीके) द्वारा वित्त पोषित इस कार्यशाला में जैन पांडुलिपियों में निहित गहन बौद्धिक और आध्यात्मिक विरासत को जानने और उसका उत्‍सव मनाने के लिए प्रतिष्ठित विद्वानों, जैन भिक्षुओं, शिक्षाविदों और अधिकारियों को एक साथ लाया गया।

इस कार्यक्रम में जैन दर्शन और प्राकृत साहित्य के प्रख्यात विद्वान श्री सुनील सागर महाराज की गरिमामयी उपस्थिति रही। उनकी उपस्थिति और आशीर्वाद ने कार्यशाला के शैक्षणिक वातावरण को और समृद्ध किया।

मुख्य अतिथि के रूप में मुख्य भाषण देते हुए, अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के सचिव डॉ. चंद्रशेखर कुमार ने पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों और अल्पसंख्यकों की विरासतीय भाषाओं के संरक्षण, पुनरुद्धार और प्रसार के लिए सरकार की अटूट प्रतिबद्धता दोहराई। उनके साथ संयुक्त सचिव श्री राम सिंह और उप सचिव श्री श्रवण कुमार भी उपस्थित थे। उन्होंने प्राचीन भारतीय परंपराओं के अनुसंधान और प्रमाणीकरण को बढ़ावा देने में मंत्रालय की सक्रिय भूमिका के बारे में बताया।

डॉ. कुमार ने कहा, “भारत सरकार को उन पहलों का समर्थन करने पर गर्व है जो हमारे अल्पसंख्यक समुदायों की विशाल और विविध बौद्धिक परंपराओं को दर्शाती हैं। इन परंपराओं का संरक्षण न केवल हमारे अतीत का सम्मान है बल्कि सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भविष्य की नींव को भी मजबूत करता है।”

यह कार्यशाला प्राचीन ज्ञान को समकालीन शैक्षिक और सांस्कृतिक ढांचे में एकीकृत करने के सरकार के रणनीतिक प्रयास का प्रमाण है जिससे यह सुनिश्चित होता है कि पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को न केवल संरक्षित किया जाए बल्कि उन्हें भावी पीढ़ियों के लिए सुलभ और प्रासंगिक भी बनाया जाए।

यह पीएमजेवीके के तहत सभी छह अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों—मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन—के उत्थान और सशक्तिकरण के व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है जिसमें शैक्षणिक अनुसंधान और विरासत के संरक्षण को बढ़ावा दिया जाएगा। पारसी-ज़ोरास्ट्रियन परंपरा की अवेस्ता और पहलवी भाषाओं के संरक्षण के लिए मुंबई विश्वविद्यालय के सहयोग से एक ऐसी ही पहल पहले से ही चल रही है। यह सरकार के समावेशी और अखिल भारतीय दृष्टिकोण को और भी रेखांकित करती है।

गुजरात विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका के साथ, ऐसे सहयोग नए शैक्षणिक रास्ते तैयार कर रहे हैं जो परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु का काम करते हैं तथा भारत के विविध समुदायों के बीच गौरव, संरक्षण और प्रगति को बढ़ावा देते हैं।

https://platform.twitter.com/embed/Tweet.html?dnt=false&embedId=twitter-widget-0&features=eyJ0ZndfdGltZWxpbmVfbGlzdCI6eyJidWNrZXQiOltdLCJ2ZXJzaW9uIjpudWxsfSwidGZ3X2ZvbGxvd2VyX2NvdW50X3N1bnNldCI6eyJidWNrZXQiOnRydWUsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfdHdlZXRfZWRpdF9iYWNrZW5kIjp7ImJ1Y2tldCI6Im9uIiwidmVyc2lvbiI6bnVsbH0sInRmd19yZWZzcmNfc2Vzc2lvbiI6eyJidWNrZXQiOiJvbiIsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfZm9zbnJfc29mdF9pbnRlcnZlbnRpb25zX2VuYWJsZWQiOnsiYnVja2V0Ijoib24iLCJ2ZXJzaW9uIjpudWxsfSwidGZ3X21peGVkX21lZGlhXzE1ODk3Ijp7ImJ1Y2tldCI6InRyZWF0bWVudCIsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfZXhwZXJpbWVudHNfY29va2llX2V4cGlyYXRpb24iOnsiYnVja2V0IjoxMjA5NjAwLCJ2ZXJzaW9uIjpudWxsfSwidGZ3X3Nob3dfYmlyZHdhdGNoX3Bpdm90c19lbmFibGVkIjp7ImJ1Y2tldCI6Im9uIiwidmVyc2lvbiI6bnVsbH0sInRmd19kdXBsaWNhdGVfc2NyaWJlc190b19zZXR0aW5ncyI6eyJidWNrZXQiOiJvbiIsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfdXNlX3Byb2ZpbGVfaW1hZ2Vfc2hhcGVfZW5hYmxlZCI6eyJidWNrZXQiOiJvbiIsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfdmlkZW9faGxzX2R5bmFtaWNfbWFuaWZlc3RzXzE1MDgyIjp7ImJ1Y2tldCI6InRydWVfYml0cmF0ZSIsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfbGVnYWN5X3RpbWVsaW5lX3N1bnNldCI6eyJidWNrZXQiOnRydWUsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfdHdlZXRfZWRpdF9mcm9udGVuZCI6eyJidWNrZXQiOiJvbiIsInZlcnNpb24iOm51bGx9fQ%3D%3D&frame=false&hideCard=false&hideThread=false&id=1946479566467518896&lang=en&origin=https%3A%2F%2Fwww.pib.gov.in%2FPressReleasePage.aspx%3FPRID%3D2146088&sessionId=e847aee2efbf0fcbf44e78cdc6fb3414617086fa&theme=light&widgetsVersion=2615f7e52b7e0%3A1702314776716&width=550px

***


Spread the love

By udaen

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *