मुख्यधारा की मीडिया, खासकर बड़े कॉर्पोरेट और राजनीतिक प्रभाव में आने वाली संस्थाएँ, प्रायः उन्हीं मुद्दों को प्राथमिकता देती हैं जो व्यावसायिक रूप से लाभदायक होते हैं या सत्ताधारी वर्ग के हितों से मेल खाते हैं। इससे वंचित और हाशिए पर पड़े समुदायों की समस्याएँ अक्सर हाशिए पर चली जाती हैं।
हालांकि, यह पूरी तरह सच नहीं है कि मीडिया अब कमजोरों की आवाज नहीं रहा। डिजिटल मीडिया, स्वतंत्र पत्रकारिता, और ग्रासरूट लेवल के न्यूज़ प्लेटफॉर्म अब भी जनता की असली समस्याएँ उठाने का काम कर रहे हैं। लेकिन उनकी पहुँच और प्रभाव मुख्यधारा के मीडिया जितनी व्यापक नहीं है।
राष्ट्रीय स्तर और उत्तराखंड स्तर पर उनकी भूमिकाओं को देखते हैं ।
राष्ट्रीय स्तर पर
भारतीय मुख्यधारा का मीडिया (टेलीविजन, प्रिंट, और बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म) धीरे-धीरे सत्ता, कॉर्पोरेट हितों और विज्ञापनदाताओं के प्रभाव में आ गया है। इस वजह से कई बार कमजोर और हाशिए पर पड़े समुदायों के मुद्दे प्राथमिकता नहीं पाते। मुख्यधारा के समाचार चैनल राजनीतिक बयानबाजी, टीआरपी आधारित बहसों और सनसनीखेज खबरों को अधिक महत्व देते हैं, जबकि किसानों, मजदूरों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं और हाशिए पर खड़े अन्य वर्गों की समस्याओं पर सीमित कवरेज होती है।
हालांकि, डिजिटल मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता के माध्यम से कई नए प्लेटफॉर्म उभरे हैं, जैसे The Wire, Scroll, Alt News, और न्यूज़लॉन्ड्री, जो दबे-कुचले वर्गों की आवाज को जगह दे रहे हैं। लेकिन इनकी पहुँच अभी भी मुख्यधारा के बड़े मीडिया हाउसों जितनी व्यापक नहीं है।
सरकार द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता पर नियंत्रण, फेक न्यूज का बढ़ता चलन, और बड़े कॉर्पोरेट्स का मीडिया हाउसों पर स्वामित्व भी एक बड़ी चुनौती है। इससे ग्रासरूट स्तर की पत्रकारिता कमजोर होती जा रही है।
उत्तराखंड के संदर्भ में
उत्तराखंड में स्थानीय मीडिया की स्थिति भी राष्ट्रीय परिदृश्य से अलग नहीं है। यहाँ की मुख्यधारा की पत्रकारिता अक्सर शहरी मुद्दों, पर्यटन, धार्मिक स्थलों, और सरकार द्वारा प्रचारित विकास परियोजनाओं पर केंद्रित होती है। ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याएँ, जैसे पलायन, जल संकट, वन अधिकार, स्थानीय व्यवसायों की कठिनाइयाँ, और पारंपरिक कृषि मॉडल का पतन, मीडिया में उतनी प्रमुखता से नहीं आते।
स्थानीय अखबार और टीवी चैनल कभी-कभी ग्रामीण समस्याओं को कवर करते हैं, लेकिन उनमें भी सरकारी विज्ञापन और राजनीतिक दबाव की झलक दिखती है। उत्तराखंड के दूरदराज़ के गाँवों में हो रहे संघर्षों, महिला मंगल दलों और अन्य सामुदायिक संगठनों के प्रयासों को मीडिया में सीमित स्थान मिलता है।
हालांकि, सोशल मीडिया और कुछ स्वतंत्र पत्रकारों ने इस कमी को भरने की कोशिश की है। उदाहरण के लिए, यूट्यूब और फेसबुक पर कई स्थानीय स्वतंत्र पत्रकार, ब्लॉगर और छोटे न्यूज़ पोर्टल्स उभर रहे हैं, जो ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे हैं। अगर ऐसे प्लेटफॉर्म को सही दिशा और समर्थन मिले, तो उत्तराखंड की उपेक्षित आवाज़ों को मुख्यधारा में लाया जा सकता है।
