विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस (3 मई) पर विशेष
योगेश कुमार गोयल

भारत में प्रेस की भूमिका और उसकी ताकत को रेखांकित करते हुए एकबार अकबर इलाहाबादी ने कहा था, ‘‘न खींचो कमान, न तलवार निकालो, जब तोप हो मुकाबिल, तब अखबार निकालो।’’ उनके इस कथन का आशय यही था कि तोप व तलवार तथा अन्य किसी भी हथियार से ज्यादा ताकतवर है कलम। कलम को तलवार से भी ज्यादा ताकतवर और तलवार की धार से भी ज्यादा प्रभावी इसलिए माना गया है क्योंकि इसी की सजगता के कारण न केवल भारत बल्कि अनेक देशों में पिछले कुछ दशकों के भीतर बड़े-बड़े घोटालों का पर्दाफाश हो सका, जिसके चलते बड़े-बड़े उद्योगपतियों, नेताओं तथा विभिन्न क्षेत्रों के दिग्गजों को एक ही झटके में अर्श से फर्श पर आना पड़ा। याद करें, जब 1970 के दशक में अमेरिका के मशहूर ‘वाटरगेट’ कांड का भंडाफोड़ हुआ था और उसी के चलते अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को पद छोड़ने पर विवश होना पड़ा था। भारत में भी मुख्यमंत्री और मंत्री पदों पर रहे कुछ आला दर्जे के नेता प्रेस की सजगता के ही कारण भ्रष्टाचार के विभिन्न मामलों में आज भी जेल की हवा खा रहे हैं। संभवतः यही कारण है कि समय-समय पर कलम रूपी इस हथियार को भोथरा बनाने या तोड़ने के कुचक्र होते रहे हैं और विभिन्न अवसरों पर न केवल भारत बल्कि दुनिया भर में सच की कीमत पत्रकारों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है।
प्रेस को सदैव लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की संज्ञा दी जाती है क्योंकि लोकतंत्र की मजबूती में इसकी बेहद महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यही कारण है कि स्वस्थ और मजबूत लोकतंत्र के लिए प्रेस की स्वतंत्रता को बहुत अहम माना गया है लेकिन विडंम्बना है कि विगत कुछ वर्षों से प्रेस स्वतंत्रता के मामले में लगातार कमी देखी जा रही है। 3 दिसम्बर 1950 को देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने अपने सम्बोधन में कहा था, ‘‘मैं प्रेस पर प्रतिबंध लगाने के बजाय, उसकी स्वतंत्रता के बेजा इस्तेमाल के तमाम खतरों के बावजूद पूरी तरह स्वतंत्र प्रेस रखना चाहूंगा क्योंकि प्रेस की स्वतंत्रता एक नारा भर नहीं है बल्कि लोकतंत्र का एक अभिन्न अंग है।’’ पिछले दशकों में प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में स्थितियां काफी बदल गई हैं। आज दुनियाभर में पत्रकारों पर राजनीतिक, अपराधिक और आतंकी समूहों का सर्वाधिक खतरा है और भारत भी इस मामले में अछूता नहीं है। विडंम्बना ही है कि दुनिया भर के न्यूज रूम्स में सरकारी तथा निजी समूहों की वजह से भय और तनाव में वृद्धि हुई है।
पेरिस स्थित ‘रिपोर्टर्स सैन्स फ्रंटियर्स’ (आरएसएफ) अथवा ‘रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स’ नामक संस्था द्वारा हर साल अपनी वार्षिक रिपोर्ट में प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर जो तथ्य प्रस्तुत किए जाते रहे हैं, वे सदैव चौंकाने वाले होते हैं। ‘रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स’ एक ऐसा गैर लाभकारी संगठन है, जो दुनिया भर के पत्रकारों पर हमलों का दस्तावेजीकरण करने और मुकाबला करने के लिए कार्यरत है और प्रतिवर्ष ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ अर्थात् ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’ नामक रिपोर्ट पेश करता है। ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2019’ में उसने भारत में प्रेस की स्वतंत्रता की स्थिति की विवेचना करते हुए यह भी स्पष्ट किया था कि किस प्रकार विश्वभर में पत्रकारों के खिलाफ घृणा हिंसा में बदल गई है, जिससे दुनियाभर में पत्रकारों में डर बढ़ा है। सऊदी अरब के जमाल खगोशी की षड्यंत्रपूर्ण हत्या पत्रकारों के प्रति ऐसी ही घृणा व दुश्मनी का जीता-जागता उदाहरण था।
अमेरिकी वॉचडॉग फ्रीडम हाउस की एक रिपोर्ट में कुछ समय पूर्व कहा गया था कि प्रेस स्वतंत्रता में पिछले करीब डेढ़ दशकों से कमी देखी जा रही है। 22 अप्रैल 2020 को आई ‘रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स’ की वार्षिक रिपोर्ट में तो भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर जो तथ्य पेश किए गए, वे काफी हैरान-परेशान करने वाले हैं। रिपोर्ट के अनुसार भारत जहां प्रेस स्वतंत्रता के मामले में 2017 में 136वें स्थान पर, 2018 में 138वें और 2019 में 140वें पायदान पर था, वहीं 2020 में दो पायदान और नीचे खिसककर 142वें स्थान पर पहुंच गया है। संस्था के अनुसार दुनियाभर में पत्रकारों के खिलाफ घृणा हिंसा में बदल रही है, जिससे विश्वभर में पत्रकारों में डर बढ़ा है। भारत में प्रेस की स्वतंत्रता में मामले का अवलोकन किया जाए तो इस संस्था की वर्ष 2009 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत प्रेस की आजादी के मामले में 109वें पायदान पर था लेकिन 2020 में 33 पायदान लुढ़ककर 142वें स्थान पर जा पहुंचा। प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में यह गिरावट स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
प्रेस की आजादी के मामले में सबसे बेहतर स्थिति नार्वे की है। नार्वे के अलावा फिनलैंड, डेनमार्क, स्वीडन, नीदरलैंड, जमैका, कोस्टारिका, स्विटजरलैंड, न्यूजीलैंड, पुर्तगाल और जर्मनी भी प्रेस स्वतंत्रता वाले देशों में शीर्ष स्थान पर विराजमान हैं। ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2019’ में फ्रांस 34वें पायदान पर, यूके 35वें पर, अमेरिका 45वें पर, जापान 66वें, मालदीव 79वें, ब्राजील 107वें, नेपाल 112वें, अफगानिस्तान 122वें, श्रीलंका 127वें, पाकिस्तान 145वें तथा बांग्लादेश 151वें पायदान पर हैं जबकि पूरी दुनिया में खलनायक के रूप में उभरा चीन प्रेस स्वतंत्रता के मामले में 177वें स्थान पर है। जहां तक भारत की बात है तो प्रेस की आजादी के मामले में अगर अफगानिस्तान जैसा देश हमसे आगे है तो हमें गंभीरता से यह विचार मंथन करने की जरूरत है कि हम इस मामले में वर्ष दर वर्ष क्यों फिसल रहे हैं?
‘रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय पत्रकार कई तरह के खतरों का सामना करते हैं, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-अंग्रेजी भाषी मीडिया के लिए कार्यरत पत्रकार। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि प्रशासन जिन क्षेत्रों को संवेदनशील मानता है, वहां रिपोर्टिंग करना बहुत मुश्किल है। दुनियाभर में पत्रकारों की हत्याओं पर इस संस्था की रिपोर्ट में हर साल चिंता जताई जाती रही है। हालांकि शायद विश्वभर में सालभर में 15-20 पत्रकारों की हत्या का आंकड़ा लोगों को इतना नहीं झकझोरता होगा किन्तु अगर मामले की गहराई तक जाकर देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि स्थिति कितनी बदतर है। कुछ समय पहले इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट की एक रिपोर्ट में खुलासा किया गया था कि 1990 से लेकर अबतक पिछले करीब तीन दशकों में 2300 से भी अधिक पत्रकारों की हत्या हुई है।
जहां तक भारत में प्रेस की आजादी की बात है तो कुछ लोगों का कहना है कि इस समय हम दूसरे आपातकाल के दौर से गुजर रहे हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि सरकार द्वारा प्रेस पर न कोई प्रतिबंध है और न ही सेंसरशिप। आपातकाल के दौरान कानूनी तौर पर अवश्य मीडिया पर सेंसरशिप लागू हुई थी लेकिन उसके बाद मीडिया पर सरकारी तौर पर ऐसी कोई पाबंदी कभी देखने को नहीं मिली। भारत के संबंध में ‘रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स’ की रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि भारत में प्रेस स्वतंत्रता की वर्तमान स्थिति में से एक पत्रकारों के खिलाफ हिंसा है, जिसमें पुलिस की हिंसा, माओवादियों के हमले, अपराधी समूहों या भ्रष्ट राजनीतिज्ञों का प्रतिशोध शामिल है। इसका सीधा और स्पष्ट अर्थ यही है कि अगर कहीं भी कुछ गलत या अनैतिक हो रहा है, जिसे दबाने या छिपाने की कोशिश की जा रही हो और कोई पत्रकार उसे उजागर करने का प्रयास करता है तो वह अपनी जान जोखिम में डाल रहा होता है क्योंकि ऐसे पत्रकार पर अंकुश लगाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद हर प्रकार के अनैतिक तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। पत्रकारों की हत्या करना मीडिया पर दबाव बनाने का सबसे आखिरी और क्रूरतम तरीका है।
हालांकि भारतीय संविधान में प्रेस को अलग से स्वतंत्रता प्रदान नहीं की गई है बल्कि उसकी स्वतंत्रता भी नागरिकों की अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता में ही निहित है। देश की एकता तथा अखण्डता खतरे में पड़ने की स्थिति में इस स्वतंत्रता को बाधित भी किया जा सकता है किन्तु ऐसी कोई स्थिति निर्मित नहीं होने पर भी देश में पत्रकारों की हत्याएं तथा पत्रकारिता का चुनौतीपूर्ण बनते जाना लोकतंत्र के हित में कदापि नहीं है बल्कि यह स्पष्ट रूप से कुछ शक्तियों द्वारा लोकतांत्रिक व्यवस्था के चौथे स्तंभ को ध्वस्त करने का ही प्रयास माना जा सकता है। कल्पना की जा सकती है कि प्रेस की स्वतंत्रता अगर इसी प्रकार सवालों के घेरे में रही तो पत्रकार कैसे पारदर्शिता के साथ अपने कार्य को अंजाम देते रहेंगे? प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित करने के प्रयासों के चलते कैसे सच को उजागर कर उसे निष्पक्ष तरीके से जनता तक पहुंचाया जाना संभव होगा? अगर प्रेस की स्वतंत्रता पर इसी प्रकार प्रश्नचिन्ह लगते रहे तो पत्रकारों से सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दे उठाने की कल्पना कैसे की जा सकेगी? हालांकि कुछ अवसरों पर कुछेक पत्रकारों पर दलाली खाने और भ्रष्ट राजनीतिक या प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बनने के आरोप भी लगते रहे हैं, इसलिए यह भी बेहद जरूरी है कि लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ ‘प्रेस’ को भी अपनी सीमाओं और मर्यादाओं का ध्यान रखते हुए अपनी स्वतंत्रता का सही इस्तेमाल करना चाहिए। देश में प्रेस की स्वतंत्रता बरकरार रहे, इसके लिए किसी मीडिया संस्थान से जुड़े पत्रकार हों या स्वतंत्र पत्रकार, उनकी सुरक्षा को लेकर कड़े कानून बनाए जाने की सख्त दरकार है ताकि बगैर किसी दबाव या भय के पत्रकार अपना कर्त्तव्य बखूबी निभाते रहें।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
