भारत वह देश है, जहां आज भी लोग ट्रैफिक सिग्नल से ज्यादा बिल्ली देखकर रुक जाते हैं। 21वीं सदी में भी डायन के संदेह में महिलाओं की हत्या, सांप के काटने पर डॉक्टर के पास ले जाने के बजाय ओझा बाबा के पास ले जाकर झाड़-फूंक कराना, विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए तंत्र-मंत्र और जादू-टोना कराना जैसे अंधविश्वास प्रचलित हैं। खासकर ग्रामीण इलाके इसकी बुरी तरह चपेट में हैं। इन तमाम कुरीतियों के खिलाफ एक शख्स ने पिछले 50 साल से मुहिम छेड़ रखी है और आज 74 साल की उम्र में भी वह लोगों को अंधविश्वास के खिलाफ जागरूक कर रहे हैं।
इस शख्स का नाम है प्रबीर घोष। दमदम के मोतीझील इलाके के रहने वाले प्रबीर को अपने इस अभियान के दौरान तांत्रिक, ओझा व पाखंडी बाबाओं के रोष का भी शिकार होना पड़ा। उन पर कई बार जानलेवा हमले हो चुके हैं, हालांकि इससे उनके इरादे और मजबूत होते चले गए। बंगाल के पुरुलिया जिले के बेहद पिछड़े आद्रा इलाके में बचपन बिताने वाले प्रबीर ने अंधविश्वास व उसमें जकड़े लोगों को बेहद करीब से देखा है।
