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प्राकृतिक संसाधनों पर पहला अधिकार जनहित का, सरकार मालिक नहीं—संरक्षक है

संपादकीय | उत्तराखंड

उत्तराखंड की पहचान उसके पहाड़ों, नदियों, जंगलों और प्राकृतिक संपदा से है। यही संसाधन यहाँ की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और जीवन का आधार हैं। लेकिन सवाल यह है कि इन संसाधनों का लाभ किसे मिल रहा है? पहाड़ों से निकलने वाले खनिजों से किसकी तिजोरी भर रही है? नदियों के सीने से निकाले जाने वाले पत्थर और रेत की कीमत कौन चुका रहा है? और जंगलों पर निर्भर रहने वाले ग्रामीणों को बदले में क्या मिल रहा है?

विकास के नाम पर खनन, सड़क निर्माण और अन्य परियोजनाएँ आवश्यक हो सकती हैं, लेकिन जब विकास की कीमत नदियों के अस्तित्व, पहाड़ों की स्थिरता, जंगलों की हरियाली और स्थानीय लोगों की आजीविका से चुकाई जाने लगे, तब विकास के मॉडल पर सवाल उठाना जरूरी हो जाता है।

सरकार मालिक नहीं, जनता की न्यासी है

भारतीय कानून में Public Trust Doctrine यानी सार्वजनिक न्यास का सिद्धांत प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए एक महत्त्वपूर्ण आधार है। इसका मूल विचार है कि सरकार सार्वजनिक महत्त्व के प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन जनता के हित में करे। वह इन संसाधनों का इस्तेमाल मनमाने ढंग से या केवल निजी लाभ को बढ़ावा देने के लिए नहीं कर सकती।

सर्वोच्च न्यायालय ने एम.सी. मेहता बनाम कमल नाथ (1997) मामले में इस सिद्धांत को महत्त्वपूर्ण मान्यता दी थी।

इसका अर्थ यह नहीं कि हर नदी, जंगल या खनिज का कानूनी स्वामित्व सीधे जनता के पास है। प्राकृतिक संसाधनों की कानूनी स्थिति अलग-अलग हो सकती है। लेकिन सरकार के अधिकार भी कानून, पर्यावरण संरक्षण और जनहित की जिम्मेदारियों से बंधे हैं।

इसलिए खनन की अनुमति देना ही सरकार की पूरी जिम्मेदारी नहीं है। यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि खनन निर्धारित सीमा में हो, पर्यावरणीय शर्तों का पालन हो और प्राकृतिक संसाधनों को अपूरणीय क्षति न पहुँचे।

खनन से राजस्व, लेकिन नुकसान की भरपाई कौन करेगा?

उत्तराखंड में नदियों से खनन, पहाड़ों की कटाई और निर्माण परियोजनाओं को लेकर सबसे बड़ा प्रश्न पर्यावरणीय संतुलन का है। खनन से सरकारी राजस्व और रोजगार मिल सकता है। निर्माण कार्यों के लिए पत्थर, रेत और अन्य खनिजों की आवश्यकता भी है। लेकिन इन गतिविधियों का संचालन वैज्ञानिक आकलन और कानूनी सीमाओं के भीतर होना चाहिए।

यदि किसी क्षेत्र में खनन से नदी का स्वरूप प्रभावित होता है, भूजल पर प्रतिकूल असर पड़ता है या आसपास की बस्तियों को नुकसान पहुँचता है, तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

Polluter Pays Principle यानी प्रदूषण करने वाला भुगतान करे और Precautionary Principle यानी एहतियाती सिद्धांत ऐसे मामलों में महत्त्वपूर्ण हैं। इनके अनुसार, पर्यावरणीय क्षति की भरपाई और संभावित गंभीर नुकसान को रोकने के लिए कानून के अनुरूप कदम उठाए जा सकते हैं।

सवाल यह है कि क्या हर परियोजना में पर्यावरणीय शर्तों की प्रभावी निगरानी हो रही है? क्या खनन से होने वाले नुकसान का निष्पक्ष आकलन किया जाता है? क्या उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध समान रूप से कार्रवाई होती है?

यदि नियम केवल कागजों पर रह जाएँ और उनका पालन कराने वाली व्यवस्था कमजोर हो, तो कानून का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

पहाड़ों का विकास या पहाड़ों की कीमत पर विकास?

उत्तराखंड में सड़कें, पुल, पर्यटन और औद्योगिक गतिविधियाँ जरूरी हैं। दुर्गम क्षेत्रों को बेहतर संपर्क और स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलना चाहिए। लेकिन विकास की सफलता केवल परियोजनाओं की संख्या या सरकारी राजस्व से नहीं मापी जा सकती।

यह भी देखना होगा कि परियोजनाओं से कितने स्थानीय लोगों को स्थायी रोजगार मिला, कितने परिवारों की आजीविका सुरक्षित रही और प्राकृतिक संसाधनों पर कितना दबाव पड़ा।

सतत विकास का सिद्धांत यही कहता है कि वर्तमान की जरूरतें पूरी करते समय भविष्य की पीढ़ियों के हितों को नष्ट नहीं किया जाना चाहिए।

पहाड़ों की पारिस्थितिकी मैदानी क्षेत्रों से अलग है। इसलिए यहाँ खनन और निर्माण संबंधी निर्णयों में स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों, भूगर्भीय जोखिमों, जलस्रोतों और पर्यावरणीय प्रभावों का गंभीरता से आकलन आवश्यक है।

जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय लोगों के अधिकार

जल, जंगल और जमीन से स्थानीय समुदायों का संबंध केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। ग्रामीणों की आजीविका जंगलों, जलस्रोतों, खेती और सामुदायिक संसाधनों पर निर्भर हो सकती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक स्थानीय व्यक्ति को हर प्राकृतिक संसाधन पर स्वतः स्वामित्व या वीटो का अधिकार प्राप्त है। लेकिन जहाँ कानून वनाधिकार, सामुदायिक अधिकार, ग्रामसभा की भूमिका, जनसुनवाई या प्रभावित लोगों की भागीदारी निर्धारित करता है, वहाँ इन प्रावधानों का पालन अनिवार्य है।

विकास की योजनाएँ बनाते समय स्थानीय जनता को केवल लाभार्थी मानना पर्याप्त नहीं। उनकी समस्याओं को सुनना, कानूनी अधिकारों की रक्षा करना और निर्णय प्रक्रिया में लागू नियमों के अनुसार भागीदारी सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

प्राकृतिक संपदा का लाभ जनता तक पहुँचे

उत्तराखंड के सामने चुनौती केवल अवैध खनन रोकने की नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के न्यायसंगत प्रबंधन की भी है।

खनन से मिलने वाले राजस्व और अन्य वैधानिक लाभों का उपयोग स्थानीय बुनियादी सुविधाओं, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और प्रभावित क्षेत्रों के विकास में किस सीमा तक हो रहा है, इसका पारदर्शी आकलन होना चाहिए।

साथ ही, खनन पट्टों, पर्यावरणीय स्वीकृतियों, उत्पादन की निर्धारित सीमा, उल्लंघनों पर कार्रवाई और पर्यावरणीय क्षति की भरपाई से संबंधित जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होनी चाहिए।

प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने की अनुमति किसी को भी कानून से ऊपर होने का अधिकार नहीं देती।

निष्कर्ष: विकास जरूरी, लेकिन प्रकृति की कीमत पर नहीं

जल, जंगल और जमीन का सवाल किसी एक सरकार, राजनीतिक दल या खनन व्यवसाय तक सीमित नहीं है। यह उत्तराखंड के भविष्य का सवाल है।

सरकार की जिम्मेदारी है कि वह विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए। खनन कारोबार की जिम्मेदारी है कि वह कानून का पालन करे। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह निष्पक्ष निगरानी करे। और नागरिक समाज तथा मीडिया की जिम्मेदारी है कि वे तथ्यों के आधार पर जवाबदेही सुनिश्चित करें।

प्राकृतिक संसाधन केवल आज की पीढ़ी की संपत्ति नहीं हैं। इनके संरक्षण में भविष्य की पीढ़ियों का हित भी जुड़ा है।

सवाल खनन होना चाहिए या नहीं, केवल इतना नहीं है। असली सवाल है—खनन कहाँ हो, कितना हो, किन शर्तों पर हो, उससे लाभ किसे मिले और नुकसान की जिम्मेदारी कौन उठाए?

क्योंकि उत्तराखंड के पहाड़ केवल पत्थर नहीं, नदियाँ केवल पानी नहीं और जंगल केवल लकड़ी नहीं हैं। ये जीवन, आजीविका और आने वाली पीढ़ियों की विरासत हैं।

विकास वह नहीं जो पहाड़ों से संपदा निकालकर उन्हें खोखला कर दे। विकास वह है जो प्रकृति को सुरक्षित रखते हुए स्थानीय लोगों के जीवन को समृद्ध बनाए।


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By udaen

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