संपादकीय
गंगा की पवित्रता पर प्रदूषण का पहरा: देवप्रयाग से हरिद्वार तक 93 किलोमीटर में 32 गुना बढ़ा कोलीफॉर्म
हजारों करोड़ की योजनाएं, फिर भी गंगा की सेहत पर सवाल; नमामि गंगे की सफलता का पैमाना अब विज्ञापन नहीं, नदी की वास्तविक स्वच्छता होनी चाहिए
गंगा केवल एक नदी नहीं, भारत की सांस्कृतिक चेतना, करोड़ों लोगों की आस्था और उत्तराखंड की जीवनरेखा है। गंगोत्री से निकलने वाली भागीरथी और अलकनंदा का देवप्रयाग में संगम गंगा के रूप में उसकी पहचान स्थापित करता है। इसी गंगा के जल को श्रद्धालु आचमन करते समय अपने माथे से लगाते हैं, इसी में स्नान को पुण्य मानते हैं और इसी के किनारे बसे नगर अपनी आजीविका चलाते हैं। लेकिन जब इसी पवित्र नदी के पानी की गुणवत्ता पर भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट गंभीर सवाल खड़े करती है, तो यह केवल पर्यावरण का विषय नहीं रह जाता। यह सरकारी योजनाओं की प्रभावशीलता, प्रशासनिक जवाबदेही और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का प्रश्न बन जाता है।
कैग की रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि देवप्रयाग से हरिद्वार के हर की पौड़ी तक लगभग 93 किलोमीटर की दूरी में गंगा के जल में टोटल कोलीफॉर्म का स्तर अक्टूबर 2023 तक 32 गुना बढ़ गया था। रिपोर्ट संख्या 2, वर्ष 2025 में उत्तराखंड में नमामि गंगे कार्यक्रम के क्रियान्वयन की जांच के दौरान वर्ष 2018 से 2023 तक के जल गुणवत्ता संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। यह रिपोर्ट 10 मार्च 2026 को उत्तराखंड विधानसभा में प्रस्तुत की गई।
यह आंकड़ा हमें सोचने पर मजबूर करता है कि जिस नदी को स्वच्छ बनाने के लिए योजनाएं बनाई गईं, बजट खर्च हुआ और संस्थागत व्यवस्थाएं खड़ी की गईं, उसकी सेहत सुधारने में आखिर कहां कमी रह गई?
देवप्रयाग में ए श्रेणी, ऋषिकेश और हरिद्वार में बी श्रेणी
कैग की रिपोर्ट में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के जल गुणवत्ता वर्गीकरण के अनुसार देवप्रयाग में गंगा का पानी वर्ष 2018 से 2023 तक ए श्रेणी में दर्ज किया गया। इसके विपरीत, ऋषिकेश के लक्कड़घाट में पानी 2019, 2022 और 2023 में बी श्रेणी में रहा। कोविड काल के 2020 और 2021 में यहां पानी ए श्रेणी में दर्ज हुआ। हरिद्वार के हर की पौड़ी में वर्ष 2018 से 2023 तक पानी लगातार बी श्रेणी में दर्ज किया गया।
ए श्रेणी का अर्थ है ऐसा जलस्रोत, जिसका पानी विसंक्रमण के बाद पारंपरिक शोधन के बिना पेयजल स्रोत के रूप में उपयोग के निर्धारित मानकों पर खरा उतरता हो। बी श्रेणी का निर्धारित उपयोग सामूहिक बाहरी स्नान है।
इस वर्गीकरण को समझना जरूरी है। रिपोर्ट यह नहीं कहती कि ऋषिकेश और हरिद्वार में गंगा का पानी स्नान के लिए पूरी तरह अनुपयुक्त घोषित हो चुका है। लेकिन देवप्रयाग से आगे जल गुणवत्ता की श्रेणी में आया अंतर और कोलीफॉर्म के स्तर में दर्ज वृद्धि प्रदूषण नियंत्रण के उपायों की गंभीर समीक्षा की मांग जरूर करती है।
आस्था के नाम पर तथ्यों को नजरअंदाज करना और प्रदूषण के नाम पर बिना प्रमाण हर निष्कर्ष निकाल देना—दोनों ही गलत हैं। जरूरत वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर नदी की वास्तविक स्थिति समझने की है।
नमामि गंगे: योजनाएं बनीं, लेकिन क्या सीवेज का समाधान हुआ?
गंगा की स्वच्छता के लिए नमामि गंगे कार्यक्रम शुरू किया गया। सीवेज शोधन संयंत्र बनाए गए, नालों के पानी को नदी में जाने से रोकने के प्रयास हुए और गंगा तटवर्ती नगरों में स्वच्छता के लिए संसाधन लगाए गए। इन प्रयासों का महत्व नकारा नहीं जा सकता।
लेकिन किसी भी सरकारी योजना की सफलता केवल स्वीकृत बजट, निर्मित संयंत्रों और जारी किए गए आदेशों से तय नहीं होती। उसका वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि प्रदूषण कितना घटा और नदी की जल गुणवत्ता में कितना सुधार हुआ।
कैग की रिपोर्ट में सीवेज प्रबंधन से जुड़ी कई कमियां भी सामने आईं। इनमें सात नगरों में बनाए गए 21 सीवेज शोधन संयंत्रों का किसी भी घर से सीवर नेटवर्क के माध्यम से जुड़ा न होना शामिल था। रिपोर्ट में शोधन संयंत्रों के संचालन, क्षमता और प्रदूषण नियंत्रण संबंधी मानकों के अनुपालन पर भी सवाल उठाए गए।
यहां सबसे बुनियादी सवाल है: यदि किसी नगर में सीवेज शोधन संयंत्र बना दिया जाए, लेकिन घरों का गंदा पानी उससे जुड़े ही नहीं, तो उस संयंत्र के निर्माण का वास्तविक लाभ कितना होगा?
निर्माण और परिणाम के बीच का यही अंतर सरकारी योजनाओं की जवाबदेही का असली परीक्षण है।
उत्तराखंड के लिए यह केवल धार्मिक नहीं, आर्थिक संकट का भी संकेत है
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में पर्यटन और तीर्थाटन की महत्वपूर्ण भूमिका है। हरिद्वार और ऋषिकेश देश-विदेश के श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। गंगा के घाटों पर होने वाले धार्मिक अनुष्ठान, योग और आध्यात्मिक पर्यटन यहां के स्थानीय कारोबार तथा रोजगार से जुड़े हैं।
ऐसे में गंगा की जल गुणवत्ता में गिरावट का सवाल केवल श्रद्धालुओं की भावनाओं तक सीमित नहीं है। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्थानीय आजीविका और पर्यटन स्थलों की दीर्घकालिक विश्वसनीयता से भी जुड़ा है।
यदि गंगा को स्वच्छ रखने की व्यवस्था कमजोर होती है, तो इसका असर उन छोटे दुकानदारों, नाव संचालकों, होटल व्यवसायियों, तीर्थ पुरोहितों और अन्य लोगों पर भी पड़ सकता है जिनकी आजीविका नदी से जुड़ी है।
इसलिए गंगा की स्वच्छता को केवल धार्मिक कार्यक्रमों या पर्यावरणीय अभियानों तक सीमित रखने के बजाय इसे उत्तराखंड की विकास नीति का केंद्रीय विषय बनाया जाना चाहिए।
जिम्मेदारी किसकी है?
गंगा को प्रदूषण से बचाने की जिम्मेदारी किसी एक विभाग की नहीं हो सकती। राज्य सरकार, नगर निकायों, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, सीवेज प्रबंधन एजेंसियों और संबंधित केंद्रीय संस्थाओं को अपनी-अपनी भूमिका स्पष्ट करनी होगी।
पहला सवाल यह है कि गंगा में गिरने वाले नालों और सीवेज की नियमित निगरानी कितनी प्रभावी है।
दूसरा सवाल यह है कि निर्मित सीवेज शोधन संयंत्र अपनी निर्धारित क्षमता और मानकों के अनुसार काम कर रहे हैं या नहीं।
तीसरा सवाल यह है कि प्रदूषण के स्रोतों की पहचान होने के बाद सुधारात्मक कार्रवाई कितनी जल्दी होती है।
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जनता को जल गुणवत्ता की वास्तविक स्थिति की जानकारी कितनी आसानी से उपलब्ध है।
गंगा की स्वच्छता से संबंधित आंकड़े नियमित रूप से सार्वजनिक होने चाहिए। प्रत्येक प्रमुख घाट पर जल गुणवत्ता की नवीनतम रिपोर्ट उपलब्ध कराई जानी चाहिए। सीवेज शोधन संयंत्रों के संचालन, उनसे जुड़े घरों की संख्या, शोधन क्षमता और मानकों के उल्लंघन पर हुई कार्रवाई का विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
यदि किसी संयंत्र पर करोड़ों रुपये खर्च हुए हैं, तो उसके परिणामों का स्वतंत्र परीक्षण भी होना चाहिए। जहां कमियां मिलें, वहां जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और सुधार की समयसीमा निर्धारित की जानी चाहिए।
आस्था की रक्षा के लिए विज्ञान से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता
गंगा की पवित्रता करोड़ों लोगों की आस्था का विषय है। लेकिन आस्था का सम्मान करने का अर्थ नदी की वास्तविक स्थिति पर सवाल उठाने से बचना नहीं है। इसके उलट, गंगा को प्रदूषण से मुक्त रखना ही उस आस्था के प्रति सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
टोटल कोलीफॉर्म का बढ़ा हुआ स्तर प्रदूषण की स्थिति समझने का एक महत्वपूर्ण संकेतक है, लेकिन केवल इसी आधार पर पानी की हर दृष्टि से सुरक्षा या असुरक्षा का अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए मलजनित कोलीफॉर्म, घुलित ऑक्सीजन, जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग और अन्य संबंधित मानकों की भी जांच जरूरी है।
इसलिए सरकार को जल गुणवत्ता की निगरानी केवल औपचारिकता के रूप में नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण की अनिवार्य व्यवस्था के रूप में देखना होगा।
गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए लोगों से अपील करना पर्याप्त नहीं है। जब तक नगरों का सीवेज पूरी तरह उपचारित नहीं होगा, ठोस कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण नहीं होगा और प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं होगा, तब तक स्थायी सुधार की उम्मीद अधूरी रहेगी।
निष्कर्ष: गंगा की सफाई का प्रमाण नदी का पानी होना चाहिए
कैग की रिपोर्ट ने एक महत्वपूर्ण अवसर दिया है—नमामि गंगे कार्यक्रम की उपलब्धियों और कमियों का तथ्यों के आधार पर मूल्यांकन करने का। इस रिपोर्ट को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित कर देना या केवल सुर्खियों में इस्तेमाल करना उसके महत्व को कम करना होगा।
देवप्रयाग से हरिद्वार के बीच कोलीफॉर्म का 32 गुना बढ़ना एक गंभीर चेतावनी है। यह जांचने की जरूरत है कि प्रदूषण के कौन-से स्रोत इसके लिए जिम्मेदार हैं, सीवेज शोधन की व्यवस्था कहां कमजोर है और सुधार के लिए कौन-से कदम तत्काल उठाए जाने चाहिए।
सरकार को जल गुणवत्ता के नवीनतम आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए, प्रदूषण के स्रोतों की पहचान करनी चाहिए और कमियों को दूर करने के लिए समयबद्ध कार्ययोजना लागू करनी चाहिए।
गंगा की सफाई का मूल्यांकन प्रचार, नारों और खर्च की गई राशि से नहीं, बल्कि नदी में बहते पानी की गुणवत्ता से होना चाहिए।
क्योंकि गंगा की पवित्रता केवल हमारी मान्यता नहीं, हमारी जिम्मेदारी भी है। और इस जिम्मेदारी का प्रमाण तभी मिलेगा, जब गंगा का पानी वास्तव में स्वच्छ होगा।
