राष्ट्रीय महिला आयोग की रिपोर्ट के ये पन्ने आज भी सवाल पूछ रहे हैं—32 साल बाद भी जवाबदेही कहाँ है?
2 अक्टूबर 1994 को उत्तराखंड आंदोलनकारी दिल्ली की ओर जा रहे थे। रामपुर तिराहे पर उन्हें रोका गया। प्रशासन का तर्क था—हथियारों की तलाशी। आंदोलनकारियों पर आरोप था कि उन्होंने तलाशी का विरोध किया और स्थिति बिगड़ी।

लेकिन राष्ट्रीय महिला आयोग की तथ्य-जांच रिपोर्ट इस सरकारी कहानी के आगे एक दूसरा और कहीं अधिक गंभीर सवाल रखती है।

आयोग ने मुजफ्फरनगर के तत्कालीन जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक का पक्ष भी दर्ज किया। अधिकारियों ने अखबारों में प्रकाशित आरोपों को खारिज किया और कहा कि आंदोलनकारियों को हथियारों की जांच के लिए रोका गया था तथा उनके विरोध के बाद लाठीचार्ज हुआ।
लेकिन आयोग की टीम ने मौके और बाद में उत्तराखंड जाकर महिलाओं के बयान दर्ज किए। रिपोर्ट में दर्ज निष्कर्ष किसी सामान्य पुलिस कार्रवाई का चित्र नहीं खींचते।
रिपोर्ट के अनुसार पुलिस द्वारा महिलाओं को पीटने, उनके कपड़े खींचने, उनके साथ छेड़छाड़ और लूटपाट करने तथा दो मामलों में बलात्कार के आरोप सामने आए। रिपोर्ट में एक महिला आंदोलनकारी के गोली लगने से घायल/मारे जाने की सूचना का भी उल्लेख है। महिलाओं ने पुलिसकर्मियों के व्यवहार को लेकर गंभीर आरोप लगाए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आयोग ने केवल पीड़ितों की बातें दर्ज करके बात खत्म नहीं की। उसने प्रशासन के तर्क पर भी सवाल उठाया।
यदि उद्देश्य केवल हथियारों की तलाशी था, तो आंदोलनकारियों को उनके शुरुआती स्थानों—गोपीश्वर, टिहरी या देहरादून—से ही क्यों नहीं रोका गया?
यह सवाल आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
किसी लोकतांत्रिक राज्य में पुलिस को कानून लागू करने का अधिकार है, लेकिन कानून लागू करने का अधिकार कानून तोड़ने का लाइसेंस नहीं है।
राष्ट्रीय महिला आयोग की रिपोर्ट का सबसे कठोर हिस्सा उसका निष्कर्ष है। आयोग ने लिखा कि पूरे घटनाक्रम में पुलिस का रवैया ऐसा था मानो वह बदला लेने की मानसिकता में कार्रवाई कर रही हो। रिपोर्ट में महिलाओं द्वारा पुलिसकर्मियों के कथित ताने का भी उल्लेख है—“उत्तराखंड चाहिए? यह लो उत्तराखंड।”
अगर यह कथन और घटनाएं जांच में प्रमाणित हुई थीं, तो यह केवल कुछ पुलिसकर्मियों की ज्यादती नहीं थी। यह राज्य शक्ति के दुरुपयोग का प्रश्न था।
और आयोग यहीं नहीं रुका।
उसने सिफारिश की कि महिलाओं के साथ अत्याचार के लिए जिम्मेदार पुलिसकर्मियों और जिला अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो। दोषियों को विभागीय या आपराधिक दंड दिए जाने की बात कही। महिलाओं को हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई की अनुशंसा की। भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार की जरूरत बताई।
रिपोर्ट की एक पंक्ति आज के लोकतंत्र के लिए भी चेतावनी है—पुलिस को इसलिए खुला हाथ नहीं दिया जा सकता कि वह पुलिस है।
यही इस पूरे कांड का सबसे बड़ा सबक है।
सवाल सिर्फ मुजफ्फरनगर का नहीं है
उत्तराखंड आंदोलनकारियों की मांग अंततः स्वीकार हुई। उत्तराखंड बना। आंदोलन का इतिहास पाठ्यक्रमों, सरकारी आयोजनों और राजनीतिक भाषणों में सम्मान के साथ दोहराया जाता है।
लेकिन क्या आंदोलनकारियों की पीड़ा भी उसी गंभीरता से याद की जाती है?
हर साल 2 अक्टूबर को श्रद्धांजलियां दी जाती हैं। शहीदों को याद किया जाता है। मंचों से आंदोलन के गौरव की बातें होती हैं। लेकिन न्याय की स्थिति पर कितनी सार्वजनिक चर्चा होती है?
राष्ट्रीय महिला आयोग की रिपोर्ट को किसी राजनीतिक दल के चश्मे से पढ़ने की जरूरत नहीं है। इसे लोकतांत्रिक शासन और नागरिक अधिकारों के दस्तावेज के रूप में पढ़ने की जरूरत है।
क्योंकि कल यदि किसी दूसरे राज्य में नागरिक किसी लोकतांत्रिक मांग के लिए सड़क पर उतरें, तो सरकार का उत्तर क्या होगा?
संवाद या डंडा?
कानून या प्रतिशोध?
जवाबदेही या वर्दी की चुप्पी?
मुजफ्फरनगर कांड इन सवालों का भयावह ऐतिहासिक संदर्भ है।
और सबसे बड़ा सवाल आज उत्तराखंड की सरकार से है—
जिस आंदोलन की पीड़ा और बलिदान से यह राज्य बना, क्या उसकी सरकार के पास आज भी इतना साहस है कि वह रामपुर तिराहा की पूरी न्यायिक यात्रा को जनता के सामने रखे?
कितने मुकदमे दर्ज हुए?
कितने आरोपपत्र दाखिल हुए?
कितने दोषी ठहराए गए?
कितने बरी हुए?
कितने मामले अब भी लंबित हैं?
पीड़ित परिवारों को क्या मिला?
और सबसे महत्वपूर्ण—जिन पर जिम्मेदारी थी, उनकी जवाबदेही कहाँ तक पहुंची?
इन सवालों का उत्तर किसी राजनीतिक भाषण से नहीं, दस्तावेजों और न्यायिक अभिलेखों से मिलना चाहिए।
32 वर्ष बाद भी रामपुर तिराहा केवल इतिहास की तारीख नहीं है।
यह लोकतंत्र की वह परीक्षा है जिसमें सवाल आज भी वही है—
सत्ता नागरिकों की आवाज सुनने के लिए है या उन्हें चुप कराने के लिए?
रामपुर तिराहा को भूलना केवल इतिहास को भूलना नहीं होगा; यह लोकतंत्र में राज्य की जवाबदेही के सबसे जरूरी सबक को भूलना होगा।
