छोटे अखबारों पर बड़ा संकट: क्या दम तोड़ देगी स्वतंत्र पत्रकारिता?
देश में एक साल के भीतर 80 हजार से अधिक पत्र-पत्रिकाओं के पंजीकरण रद्द होने की खबर केवल सरकारी आंकड़ों में आई गिरावट नहीं है। यह देश में छोटे, स्वतंत्र और क्षेत्रीय प्रकाशनों के भविष्य पर गंभीर बहस का विषय है। सवाल यह नहीं कि निष्क्रिय और फर्जी प्रकाशनों पर कार्रवाई क्यों हुई, बल्कि सवाल यह है कि इस प्रक्रिया में वास्तविक रूप से प्रकाशित होने वाले छोटे समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के हितों की कितनी चिंता की गई?
सरकार के अनुसार, प्रेस एवं आवधिक प्रकाशन अधिनियम, 2023 के तहत पंजीकरण व्यवस्था को डिजिटल और व्यवस्थित किया जा रहा है। वार्षिक विवरण, प्रकाशन संबंधी जानकारी और निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन जरूरी है। निश्चित रूप से फर्जी, निष्क्रिय और नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रकाशनों पर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन क्या हर छोटा प्रकाशक तकनीकी रूप से इतना सक्षम है कि वह डिजिटल पोर्टल की सभी प्रक्रियाओं को आसानी से पूरा कर सके? क्या दूरदराज के पहाड़ी क्षेत्रों में सीमित संसाधनों से समाचार पत्र निकालने वाले प्रकाशकों को पर्याप्त तकनीकी सहायता मिल रही है?
पत्रकारिता केवल बड़े मीडिया घरानों की संपत्ति नहीं है। देश में हजारों छोटे समाचार पत्र और मासिक पत्रिकाएं ऐसी हैं, जो सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद स्थानीय समस्याओं को आवाज देती हैं। उत्तराखंड इसका उदाहरण है। यहां के छोटे प्रकाशन पलायन, बेरोजगारी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, वन अधिकार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत सामने लाते हैं। कई बार जिन गांवों की समस्याएं बड़े समाचार माध्यमों तक नहीं पहुंच पातीं, उन्हें स्थानीय समाचार पत्र ही सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाते हैं।
अब इन प्रकाशनों के सामने एक और चुनौती खड़ी हो रही है। डाक नियमों में बदलाव से मासिक और त्रैमासिक पत्रिकाओं की रियायती वितरण व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका है। छोटे प्रकाशनों के लिए डाक से प्रतियां भेजना केवल वितरण का माध्यम नहीं, बल्कि पाठकों तक पहुंचने का महत्वपूर्ण साधन है। यदि वितरण लागत बढ़ती है तो उसका सीधा असर सदस्यता, प्रसार और प्रकाशन की निरंतरता पर पड़ेगा।
विडंबना देखिए कि एक ओर सरकार डिजिटल इंडिया और सूचना के व्यापक प्रसार की बात करती है, दूसरी ओर छोटे प्रकाशनों के सामने बढ़ती अनुपालन प्रक्रिया, आर्थिक बोझ और वितरण संबंधी कठिनाइयों का सवाल खड़ा है। सरकारी विज्ञापन नीति भी यहां महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि विज्ञापनों का लाभ केवल बड़े और अधिक प्रसार वाले संस्थानों तक सीमित रहता है, तो छोटे प्रकाशनों के लिए आर्थिक रूप से टिके रहना और कठिन होगा।
यहां सरकार की जवाबदेही तय होनी चाहिए। फर्जी प्रकाशनों पर कार्रवाई का विरोध नहीं, लेकिन वास्तविक रूप से प्रकाशित होने वाले छोटे समाचार पत्रों को तकनीकी गलतियां सुधारने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। मासिक और त्रैमासिक पत्रिकाओं के लिए किफायती डाक व्यवस्था होनी चाहिए। सरकारी विज्ञापन नीति में पारदर्शिता के साथ लघु और क्षेत्रीय प्रकाशनों के लिए न्यायसंगत अवसर सुनिश्चित किए जाने चाहिए।
उत्तराखंड सरकार को भी इस विषय पर चुप नहीं रहना चाहिए। राज्य के 1,096 प्रकाशनों के पंजीकरण रद्द होने के आंकड़े की जिला और प्रकाशन श्रेणीवार समीक्षा होनी चाहिए। यह स्पष्ट होना चाहिए कि कितने प्रकाशन वास्तव में बंद थे, कितनों के दस्तावेज अधूरे थे और कितने तकनीकी या प्रक्रियागत कारणों से प्रभावित हुए।
लोकतंत्र में पत्रकारिता का महत्व केवल खबर प्रकाशित करने तक सीमित नहीं है। पत्रकारिता सत्ता से सवाल पूछती है, प्रशासन को जवाबदेह बनाती है और आम नागरिक को सूचना का अधिकार देती है। यदि छोटे समाचार पत्र आर्थिक और प्रशासनिक दबावों के कारण बंद होते हैं, तो इसका असर केवल प्रकाशकों और पत्रकारों पर नहीं, बल्कि उन पाठकों पर भी पड़ेगा जिनकी आवाज ये प्रकाशन बनते हैं।
सरकार को यह तय करना होगा कि उसकी प्राथमिकता केवल पंजीकरण का रिकॉर्ड दुरुस्त करना है या देश में वास्तविक और स्वतंत्र पत्रकारिता को जीवित रखने की व्यवस्था भी करना है।
क्योंकि फर्जी प्रकाशनों को रोकना प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए अनुकूल वातावरण बनाना भी लोकतांत्रिक शासन की उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है।
