पत्रकारिता का नया परिचय: पहले बताइए, आप किसके आदमी हैं?
पत्रकारिता को कभी मिशन कहा जाता था। फिर वह प्रोफेशन बनी। अब कई जगह यह सवाल उठने लगा है कि क्या यह अवसरों का खुला मंच है या पहचान, संपर्क और वंशवाद का सीमित क्लब?
आज अनेक युवा पत्रकारों के सामने पहला सवाल यह नहीं होता कि वे कितना अच्छा लिखते हैं या कितनी दमदार रिपोर्टिंग कर सकते हैं। अक्सर अनकहा सवाल होता है—”आपको भेजा किसने है?”, “आप किसके परिचित हैं?”, “आप किस समूह से जुड़े हैं?” यदि इन सवालों के जवाब मजबूत हों, तो कई बार योग्यता बाद में देखी जाती है।
विडंबना यह है कि जो मीडिया रोज़ राजनीति, फ़िल्म और खेल में नेपोटिज्म पर बहस करता है, वह अपने भीतर झाँकने से अक्सर बचता है। क्या मीडिया संस्थानों में नियुक्तियाँ हमेशा पूरी तरह पारदर्शी होती हैं? क्या हर योग्य पत्रकार को समान अवसर मिलता है? क्या ग्रामीण और छोटे शहरों से आने वाली प्रतिभाओं के लिए रास्ते वास्तव में खुले हैं? ये प्रश्न असुविधाजनक हैं, लेकिन आवश्यक भी।
सबसे अधिक मार उस युवा पत्रकार पर पड़ती है जिसके पास न कोई बड़ा उपनाम है, न कोई राजनीतिक संरक्षण और न ही किसी प्रभावशाली संपादक तक सीधी पहुँच। वह खबरें ढूँढ़ता है, जोखिम उठाता है, फील्ड में पसीना बहाता है, लेकिन कई बार सुर्खियाँ किसी और के हिस्से में चली जाती हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर सफल पत्रकार नेपोटिज्म का परिणाम है। यह निष्कर्ष न केवल गलत होगा बल्कि उन हजारों पत्रकारों के साथ अन्याय भी होगा जिन्होंने संघर्ष, ईमानदारी और उत्कृष्ट कार्य के बल पर अपनी पहचान बनाई है। समस्या व्यक्तियों से अधिक व्यवस्था की है। जहाँ अवसरों की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होती, वहाँ पक्षपात की आशंका हमेशा बनी रहती है।
सौभाग्य से डिजिटल पत्रकारिता ने इस बंद दरवाज़े पर दस्तक दी है। आज एक मोबाइल फोन, तथ्य आधारित रिपोर्टिंग और जनता का विश्वास कई बार उन रास्तों को खोल देते हैं जिन्हें कभी केवल बड़े मीडिया संस्थान नियंत्रित करते थे। फिर भी संस्थागत मीडिया की जिम्मेदारी कम नहीं होती। यदि वह समाज से जवाबदेही की अपेक्षा करता है, तो उसे स्वयं भी भर्ती, पदोन्नति और संपादकीय निर्णयों में निष्पक्षता का उदाहरण बनना होगा।
पत्रकारिता की विश्वसनीयता कैमरों, स्टूडियो या बड़े नामों से नहीं बनती। वह बनती है उस भरोसे से जो जनता पत्रकार पर करती है। और भरोसा वहीं टिकता है जहाँ अवसर रिश्तों से नहीं, योग्यता से तय होते हैं।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ तभी मजबूत रहेगा, जब उसकी नींव प्रतिभा, पारदर्शिता और नैतिकता पर होगी—न कि पहचान, सिफारिश और वंशवाद पर।
