गांव से उत्तराखंड है, उत्तराखंड से गांव नहीं
उत्तराखंड को अक्सर देवभूमि, पर्यटन प्रदेश और प्राकृतिक सौंदर्य की भूमि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन इस राज्य की असली पहचान उसके गांव हैं। वे गांव, जिन्होंने सदियों से जल, जंगल, जमीन और संस्कृति को संभालकर रखा। वे गांव, जिनकी मेहनत से पहाड़ आबाद रहे, नदियां स्वच्छ रहीं और समाज जीवित रहा। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि “उत्तराखंड गांवों से है, गांव उत्तराखंड से नहीं।”
राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी उत्तराखंड का सबसे बड़ा प्रश्न सड़क, बिजली या भवन निर्माण नहीं, बल्कि गांवों का भविष्य है। एक ओर सरकारें निवेश, पर्यटन और शहरीकरण की बात करती हैं, दूसरी ओर हजारों गांव पलायन, बेरोजगारी और कृषि संकट से जूझ रहे हैं। अनेक गांव ऐसे हैं जहां घर तो खड़े हैं, लेकिन उनमें रहने वाले लोग नहीं हैं।
विडंबना यह है कि जिन गांवों ने उत्तराखंड की नदियों, जंगलों और पर्यावरण को बचाए रखा, वही गांव आज विकास की मुख्यधारा से सबसे दूर हैं। पहाड़ का युवा रोजगार के लिए देहरादून, हल्द्वानी, दिल्ली और चंडीगढ़ की ओर जा रहा है। खेत बंजर हो रहे हैं, पारंपरिक फसलें समाप्त हो रही हैं और सामुदायिक जीवन कमजोर पड़ रहा है।
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा आज भी उन प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित है जिनकी रक्षा ग्रामीण समाज करता आया है। जलविद्युत परियोजनाओं के लिए पानी गांवों से आता है, पर्यटन के लिए प्राकृतिक सौंदर्य गांवों के आसपास बचा हुआ है, और जंगलों की सुरक्षा का वास्तविक भार भी ग्रामीण समुदायों पर ही है। लेकिन इन संसाधनों से होने वाले आर्थिक लाभ का बड़ा हिस्सा गांवों तक नहीं पहुंचता।
राज्य की विकास नीतियों में भी एक असंतुलन दिखाई देता है। शहरों का विस्तार हो रहा है, लेकिन गांवों की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। स्थानीय कृषि, पशुपालन, वनाधारित आजीविका, हस्तशिल्प और लघु उद्योगों को यदि मजबूत किया जाता, तो पलायन की समस्या इतनी गंभीर नहीं होती।
उत्तराखंड का इतिहास भी बताता है कि यहां के गांव केवल आर्थिक इकाइयां नहीं, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय सुरक्षा की पहली पंक्ति हैं। चिपको आंदोलन जैसे ऐतिहासिक जनआंदोलन गांवों से ही निकले थे। जल स्रोतों, वन पंचायतों और सामुदायिक श्रम की परंपराओं ने इस हिमालयी क्षेत्र को जीवित रखा। यदि गांव कमजोर होंगे तो पर्यावरणीय संकट भी गहराएगा।
आज आवश्यकता केवल “रिवर्स पलायन” के नारे की नहीं, बल्कि ऐसी नीतियों की है जो गांवों में सम्मानजनक जीवन और आय सुनिश्चित कर सकें। स्थानीय उत्पादों के लिए बाजार, कृषि प्रसंस्करण इकाइयां, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और डिजिटल कनेक्टिविटी गांवों को पुनर्जीवित कर सकती हैं।
उत्तराखंड का भविष्य केवल देहरादून, ऋषिकेश या हल्द्वानी में नहीं लिखा जाएगा। उसका भविष्य उन पहाड़ी गांवों में तय होगा जहां आज भी लोग सीमित संसाधनों के बावजूद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।
यदि गांव खाली हो गए, तो केवल घर नहीं उजड़ेंगे; उत्तराखंड की संस्कृति, पर्यावरण, जल स्रोत और सामाजिक संरचना भी कमजोर हो जाएगी।
इसलिए उत्तराखंड के संदर्भ में सबसे बड़ा विकास मंत्र यही है—
“गांव बचेंगे, तभी पहाड़ बचेगा; पहाड़ बचेगा, तभी उत्तराखंड बचेगा।”
