खबरों के पीछे मरता हुआ आदमी : भारतीय पत्रकारिता का अनकहा संकट
समाज में पत्रकार को अक्सर एक मजबूत, निर्भीक और हर परिस्थिति में खड़े रहने वाले व्यक्ति के रूप में देखा जाता है। वह बाढ़ में भी दिखाई देता है, दंगों में भी, अस्पतालों के बाहर भी और युद्ध जैसे हालातों में भी। कैमरे के सामने उसकी आवाज़ स्थिर रहती है, शब्द नियंत्रित रहते हैं और चेहरा पेशेवर दिखता है। लेकिन इस चमकदार पेशे के पीछे एक ऐसा अंधेरा है, जिसके बारे में बहुत कम बात होती है।
पत्रकार हर दिन सिर्फ “खबर” नहीं देखता, वह मनुष्यता के टूटने का दृश्य देखता है। सड़क हादसों में बिखरी लाशें, रोती हुई माँएँ, आत्महत्या के बाद बिखरे परिवार, अस्पतालों में तड़पते गरीब, बलात्कार पीड़िताओं की चुप्पी, किसानों की बेबसी और सत्ता की निर्ममता — यह सब उसके दिमाग में सिर्फ फुटेज बनकर नहीं रहता। यह धीरे-धीरे उसकी मानसिक दुनिया का हिस्सा बन जाता है।
विडंबना यह है कि जो व्यक्ति समाज के दुख को रिकॉर्ड करता है, उसके अपने दुख का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता।
भारत में पत्रकारिता का बड़ा हिस्सा आज आर्थिक और मानसिक असुरक्षा के दौर से गुजर रहा है। छोटे शहरों और जिलों में काम करने वाले हजारों पत्रकार बेहद कम वेतन, अनियमित भुगतान और अस्थायी अनुबंधों पर काम कर रहे हैं। कई पत्रकार ऐसे हैं जिन्हें “स्ट्रिंगर” के नाम पर बिना किसी सामाजिक सुरक्षा, बीमा या स्थायी आय के काम कराया जाता है। दुर्घटना हो जाए, बीमारी आ जाए या नौकरी चली जाए — संस्थान अक्सर उनसे दूरी बना लेते हैं।
डिजिटल मीडिया और “ब्रेकिंग न्यूज़” की संस्कृति ने इस संकट को और गहरा किया है। अब पत्रकार सिर्फ रिपोर्टर नहीं रहा, उसे कैमरा भी उठाना है, वीडियो भी बनाना है, लाइव भी करना है, सोशल मीडिया भी संभालना है और हर समय उपलब्ध भी रहना है। न्यूज़रूम में इंसान नहीं, “कंटेंट मशीन” की तरह काम लेने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
इसका सबसे खतरनाक असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा है। दुनिया भर में कई शोध बताते हैं कि लगातार हिंसा, त्रासदी और संघर्ष को कवर करने वाले पत्रकारों में अवसाद, चिंता और पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) के मामले सामान्य लोगों की तुलना में अधिक होते हैं। लेकिन भारतीय मीडिया संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य अब भी लगभग वर्जित विषय है। यहाँ थकान को “कमज़ोरी” और भावनात्मक टूटन को “अप्रोफेशनल” माना जाता है।
स्थिति सिर्फ आर्थिक या मानसिक नहीं, राजनीतिक भी है। पत्रकारों पर मुकदमे, ऑनलाइन ट्रोलिंग, धमकियाँ और राजनीतिक ध्रुवीकरण लगातार बढ़ा है। सत्ता के करीब रहने वाली पत्रकारिता को पुरस्कार मिलता है, जबकि सवाल पूछने वाली पत्रकारिता को अक्सर अकेला छोड़ दिया जाता है। ऐसे माहौल में स्वतंत्र पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं, जोखिम बन चुकी है।
सबसे दुखद यह है कि पत्रकार की त्रासदी भी कई बार खबर नहीं बनती। किसी रिपोर्टर की आत्महत्या, आर्थिक तंगी या इलाज के अभाव में मौत कुछ दिन सोशल मीडिया पर चर्चा बनती है और फिर अगली “ब्रेकिंग न्यूज़” उसे ढक देती है।
यह समझना होगा कि पत्रकार भी मशीन नहीं, मनुष्य है। उसे भी सुरक्षा चाहिए, सम्मान चाहिए, स्थिर आय चाहिए और सबसे अधिक — भावनात्मक सहारा चाहिए। मीडिया संस्थानों को मानसिक स्वास्थ्य सहायता, बीमा, कार्य-घंटों की मर्यादा और मानवीय कार्य संस्कृति पर गंभीरता से काम करना होगा। साथ ही समाज को भी यह समझना होगा कि “न्यूज़” के पीछे भी एक इंसान खड़ा होता है।
लोकतंत्र सिर्फ स्वतंत्र मीडिया से नहीं चलता, बल्कि सुरक्षित और जीवित पत्रकारों से चलता है।
क्योंकि अगर सच लिखने वाला आदमी भीतर से मरने लगे, तो अंततः समाज भी सच सुनने की क्षमता खो देता है।
