भ्रष्टाचार की रैंकिंग नहीं, व्यवस्था का आईना है यह
जब अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में सोमालिया, दक्षिण सूडान और सीरिया जैसे देशों को दुनिया का सबसे भ्रष्ट बताया जाता है, तो यह केवल रिश्वतखोरी की कहानी नहीं होती। यह उन देशों की टूटी हुई संस्थाओं, कमजोर न्याय व्यवस्था और युद्धग्रस्त शासन की तस्वीर होती है। लेकिन जब 2017 में Forbes ने Transparency International के सर्वे के आधार पर भारत को एशिया में सबसे अधिक रिश्वत दर वाला देश बताया, तब यह सवाल केवल वैश्विक रैंकिंग का नहीं था—यह भारतीय लोकतंत्र की रोजमर्रा की प्रशासनिक सच्चाई पर टिप्पणी थी।
69 प्रतिशत रिश्वत दर का अर्थ यह नहीं था कि भारत “दुनिया का सबसे भ्रष्ट देश” बन गया। इसका वास्तविक अर्थ यह था कि देश के करोड़ों नागरिकों के लिए सरकारी सेवा प्राप्त करना अब भी “अधिकार” नहीं, बल्कि “लेन-देन” का विषय बना हुआ है। स्कूल, अस्पताल, पुलिस, पहचान पत्र और स्थानीय प्रशासन—यानी वही संस्थाएँ जिन पर लोकतंत्र का सबसे प्रत्यक्ष भरोसा टिका होता है—वहीं सबसे अधिक रिश्वत अनुभव दर्ज हुए।
भारत की समस्या केवल भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का सामान्यीकरण है।
देश में भ्रष्टाचार अब किसी बड़े घोटाले की हेडलाइन भर नहीं रह गया। यह फाइल आगे बढ़ाने से लेकर ठेके दिलाने, भर्ती कराने, जमीन उपयोग बदलवाने और यहां तक कि बुनियादी नागरिक सेवाओं तक पहुँच का हिस्सा बन चुका है। विडंबना यह है कि डिजिटल इंडिया, ई-गवर्नेंस और कैशलेस व्यवस्था के दावों के बावजूद नागरिक अनुभव में “सिस्टम को जानना” अक्सर “कानून को जानने” से अधिक प्रभावी माना जाता है।
यही कारण है कि Transparency International की बाद की रिपोर्टों में भी भारत में “personal connections” यानी पहचान और नेटवर्क के जरिए काम करवाने की प्रवृत्ति को गंभीर समस्या बताया गया।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि भ्रष्टाचार अब केवल अवैध लेन-देन नहीं, बल्कि राजनीतिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन चुका है। चुनावी चंदा, कॉरपोरेट लॉबिंग, ठेका व्यवस्था, भूमि नीति और नियामक संस्थाओं पर प्रभाव—ये सब उस “सिस्टमेटिक करप्शन” की ओर संकेत करते हैं जो अक्सर कानून की भाषा में वैध दिखता है, लेकिन लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करता है। (Reddit)
भारत में भ्रष्टाचार विरोधी राजनीति हमेशा लोकप्रिय रही है। हर सरकार भ्रष्टाचार मिटाने का दावा करती है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या भ्रष्टाचार केवल नोटों में होता है? यदि संस्थाएँ राजनीतिक दबाव में हों, यदि जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता पर सवाल उठें, यदि पारदर्शिता कानून कमजोर किए जाएँ और यदि व्हिसलब्लोअर असुरक्षित महसूस करें, तो भ्रष्टाचार केवल रिश्वत तक सीमित नहीं रहता—वह शासन शैली बन जाता है।
सोशल मीडिया पर पुरानी रिपोर्टों को नए संदर्भ में वायरल करना भी एक नई समस्या है। 2017 की Forbes रिपोर्ट को आज भी “ताजा वैश्विक रिपोर्ट” बताकर साझा किया जाता है, जबकि भ्रष्टाचार सूचकांक समय के साथ बदलते रहते हैं। लेकिन इससे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि भारत आज किस रैंक पर है; बड़ा प्रश्न यह है कि क्या आम नागरिक बिना सिफारिश, बिना एजेंट और बिना अतिरिक्त भुगतान के व्यवस्था पर भरोसा कर सकता है?
किसी भी राष्ट्र की वास्तविक स्वच्छता उसकी रैंकिंग से नहीं, बल्कि उस नागरिक के अनुभव से तय होती है जिसे अपने अधिकार के लिए किसी के सामने झुकना न पड़े। भारत की लड़ाई केवल भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं, बल्कि उस मानसिकता के खिलाफ है जिसने भ्रष्टाचार को “सिस्टम का हिस्सा” मान लिया है।
