सस्ती शराब या महंगा समाज?
उत्तराखंड सरकार ने शराब पर वैट दर 12 प्रतिशत से घटाकर 6 प्रतिशत करने का फैसला लिया है। सरकार का तर्क है कि इससे शराब की कीमतों में कमी आएगी, पड़ोसी राज्यों के मुकाबले दरों में संतुलन बनेगा और सीमावर्ती क्षेत्रों में होने वाली तस्करी पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। आर्थिक दृष्टि से यह निर्णय राजस्व प्रतिस्पर्धा का हिस्सा दिखाई देता है, लेकिन सामाजिक दृष्टि से यह कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में शराब केवल एक उत्पाद नहीं है; यह लंबे समय से सामाजिक संघर्ष, महिला आंदोलनों और ग्रामीण विघटन का मुद्दा रहा है। पहाड़ की महिलाओं ने दशकों तक शराब के खिलाफ आंदोलन किए हैं, क्योंकि उन्होंने सबसे पहले उसके दुष्परिणाम झेले—घरेलू हिंसा, परिवार की आय का क्षरण, युवाओं में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति और सामाजिक असुरक्षा। ऐसे राज्य में शराब को सस्ता करना केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि सामाजिक संकेत भी है।
सरकार का यह तर्क कि सस्ती शराब से तस्करी रुकेगी, आंशिक रूप से सही हो सकता है। सीमावर्ती राज्यों में कर अंतर अक्सर अवैध कारोबार को बढ़ावा देता है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या तस्करी रोकने का सबसे प्रभावी तरीका शराब को सस्ता करना ही है? यदि यही तर्क हर राज्य अपनाने लगे, तो अंततः यह “राजस्व प्रतिस्पर्धा” राज्यों को शराब बिक्री बढ़ाने की दौड़ में बदल सकती है।
विडंबना यह है कि एक ओर सरकारें नशामुक्ति अभियान चलाती हैं, स्कूलों और गांवों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करती हैं, वहीं दूसरी ओर शराब को अधिक सुलभ और सस्ता बनाने की नीतियाँ लागू करती हैं। यह दोहरी नीति समाज में भ्रम पैदा करती है। राज्य को यह तय करना होगा कि शराब उसके लिए केवल राजस्व का स्रोत है या सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिरता का प्रश्न भी।
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था पहले से ही सीमित संसाधनों और पर्यटन आधारित आय पर निर्भर है। ऐसे में आबकारी राजस्व सरकारों के लिए आकर्षक विकल्प बन जाता है। लेकिन अल्पकालिक राजस्व और दीर्घकालिक सामाजिक लागत के बीच संतुलन बनाना किसी भी जिम्मेदार शासन की कसौटी होती है। शराब से मिलने वाली आय का बड़ा हिस्सा अंततः स्वास्थ्य सेवाओं, कानून-व्यवस्था और सामाजिक पुनर्वास पर खर्च हो सकता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार ने इस निर्णय से पहले सामाजिक प्रभाव का कोई सार्वजनिक अध्ययन साझा किया? क्या महिलाओं के समूहों, ग्राम सभाओं या स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय ली गई? लोकतांत्रिक नीति-निर्माण केवल आर्थिक गणना नहीं, बल्कि सामाजिक सहमति भी मांगता है।
शराब की बोतल सस्ती हो सकती है, लेकिन उसके सामाजिक परिणाम अक्सर बहुत महंगे साबित होते हैं।
