संसद में सवाल, बाजार में कारोबार
कोल्ड ड्रिंक्स पर दोहरा मापदंड या नियमन की विफलता?
नई दिल्ली। संसद परिसर में समय-समय पर कुछ शीतल पेयों (कोल्ड ड्रिंक्स) पर रोक या सीमित उपयोग को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—यदि इन पेयों में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तत्व पाए जाते हैं, तो फिर इन्हें पूरे देश में खुले बाजार में बेचने की अनुमति क्यों है?
दरअसल, यह विवाद “इंडोसल्फेक्स” नहीं बल्कि “एंडोसल्फान” और अन्य कीटनाशकों के अवशेषों से जुड़ा रहा है। वर्ष 2003 में Centre for Science and Environment (CSE) की रिपोर्ट में कई लोकप्रिय कोल्ड ड्रिंक्स में कीटनाशकों के अंश पाए जाने का दावा किया गया था। इसके बाद संसद की संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने भी जांच कर खाद्य सुरक्षा मानकों को लेकर गंभीर चिंता जताई थी।
उस समय संसद की कैंटीनों में कुछ ब्रांडों की बिक्री पर रोक और सख्त निगरानी लागू की गई थी। हालांकि, देशव्यापी प्रतिबंध नहीं लगाया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी खाद्य पदार्थ में रसायनों के “अंश” मिलने और उसे “पूर्ण प्रतिबंधित” घोषित करने के बीच वैज्ञानिक परीक्षण, कानूनी प्रक्रिया और नियामकीय मानकों की लंबी प्रक्रिया होती है।
भारत में खाद्य सुरक्षा की जिम्मेदारी Food Safety and Standards Authority of India (FSSAI) के पास है। FSSAI तय करता है कि किसी पेय या खाद्य उत्पाद में मौजूद रसायनों की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक है या नहीं। यदि कोई कंपनी मानकों का उल्लंघन करती है, तो उसके खिलाफ जुर्माना, लाइसेंस निलंबन या उत्पाद वापसी जैसी कार्रवाई हो सकती है।
लेकिन आलोचकों का कहना है कि भारत में खाद्य सुरक्षा का नियमन अक्सर “जनस्वास्थ्य” से अधिक “बाजार संतुलन” के आधार पर चलता है। देश का विशाल कोल्ड ड्रिंक उद्योग करोड़ों रुपये के कारोबार, विज्ञापन और रोजगार से जुड़ा है। ऐसे में सरकारें पूर्ण प्रतिबंध की बजाय चेतावनी, टैक्स और सीमित नियंत्रण का रास्ता अपनाती हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि अधिक चीनी और रासायनिक मिश्रण वाले पेय मोटापा, मधुमेह और बच्चों में स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ा रहे हैं। कई राज्यों में स्कूल परिसरों के आसपास जंक फूड और सॉफ्ट ड्रिंक्स की बिक्री सीमित करने की मांग भी उठती रही है।
इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा प्रश्न वही है जो आम नागरिक पूछ रहा है—
“यदि संसद परिसर में स्वास्थ्य सुरक्षा के नाम पर सख्ती जरूरी है, तो क्या वही मानक देश की आम जनता पर लागू नहीं होने चाहिए?”
