लोकतंत्र का आईना और प्रेस की गिरती आज़ादी
दुनिया के सबसे समृद्ध लोकतंत्रों में गिने जाने वाले Norway का लगातार विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में पहले स्थान पर बने रहना केवल एक सांख्यिक उपलब्धि नहीं है। यह उस राजनीतिक संस्कृति का संकेत है जहाँ सत्ता आलोचना को लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा मानती है। दूसरी ओर India का 157वें स्थान पर पहुँचना एक ऐसे दौर की तस्वीर पेश करता है जहाँ लोकतंत्र और मीडिया के संबंध लगातार तनावपूर्ण होते जा रहे हैं।
Reporters Without Borders की रिपोर्ट पर सवाल उठाए जा सकते हैं। उसकी पद्धति, पश्चिमी दृष्टिकोण या आकलन के मानकों पर बहस भी हो सकती है। लेकिन केवल रैंकिंग को खारिज कर देने से वे वास्तविक चिंताएँ समाप्त नहीं हो जातीं जो देश के भीतर पत्रकारिता को लेकर महसूस की जा रही हैं।
आज भारत में मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अभूतपूर्व तकनीकी विस्तार और आर्थिक शक्ति के बावजूद भरोसे के संकट से जूझ रहा है। टीवी स्टूडियो बहसों का स्तर गिरा है, कॉर्पोरेट स्वामित्व का प्रभाव बढ़ा है, और सत्ता के प्रति आलोचनात्मक पत्रकारिता का दायरा सिकुड़ता दिखाई देता है। कई मामलों में पत्रकारों पर मुकदमे, छापे, गिरफ्तारी या ऑनलाइन उत्पीड़न जैसी घटनाएँ यह संकेत देती हैं कि सवाल पूछना अब पहले जितना सुरक्षित नहीं रह गया।
यह भी सच है कि भारत जैसा विशाल और विविधतापूर्ण देश नॉर्वे जैसे छोटे यूरोपीय राष्ट्र से सीधे तुलना में नहीं रखा जा सकता। भारत में हजारों अखबार, सैकड़ों समाचार चैनल और करोड़ों डिजिटल उपभोक्ता हैं। यहाँ क्षेत्रीय भाषाओं की पत्रकारिता अब भी जमीनी मुद्दों को जीवित रखे हुए है। लेकिन यही वह बिंदु है जहाँ चिंता और गहरी हो जाती है — इतनी विशाल लोकतांत्रिक संरचना के बावजूद यदि पत्रकारिता भय, ध्रुवीकरण और आर्थिक निर्भरता से जकड़ती दिखाई दे, तो यह केवल मीडिया का संकट नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की सेहत का प्रश्न बन जाता है।
उत्तराखंड जैसे छोटे राज्यों में भी यह बदलाव साफ दिखता है। स्थानीय पत्रकारिता, जो कभी जनसरोकारों और ग्रामीण मुद्दों की आवाज हुआ करती थी, अब संसाधनों की कमी, राजनीतिक दबाव और विज्ञापन-निर्भरता के बीच संघर्ष कर रही है। कई छोटे समाचार पत्र और पोर्टल केवल जीवित रहने की लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसे माहौल में स्वतंत्र पत्रकारिता करना आर्थिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर जोखिम भरा होता जा रहा है।
लोकतंत्र में मीडिया का काम सरकार का प्रचारक बनना नहीं, बल्कि जनता और सत्ता के बीच जवाबदेही का पुल बने रहना है। जब पत्रकार सवाल पूछने से डरने लगें, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे केवल चुनावी व्यवस्था बनकर रह जाता है।
नॉर्वे और भारत की रैंकिंग के बीच का अंतर केवल दो देशों का अंतर नहीं है। यह उस अंतर का प्रतीक है जहाँ एक व्यवस्था आलोचना को लोकतंत्र की ताकत मानती है और दूसरी व्यवस्था अक्सर आलोचना को असुविधा की तरह देखने लगती है।
प्रेस की स्वतंत्रता कोई विदेशी अवधारणा नहीं, बल्कि नागरिकों के जानने के अधिकार की बुनियाद है। लोकतंत्र की असली मजबूती वहीं है जहाँ पत्रकार बिना भय के सच लिख सकें — चाहे वह सत्ता के पक्ष में हो या उसके खिलाफ।
