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देहरादून। भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा गठित High-Level Committee on Demographic Changes ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से जमीनी स्तर की जानकारी जुटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। समिति ने 1 जुलाई 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर विभिन्न राज्यों के दौरे और राज्यों को भेजी जाने वाली विस्तृत प्रश्नावली की जानकारी दी थी। गृह मंत्री ने समिति के कामकाज और दौरों में आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।

समिति का गठन 26 मई 2026 को किया गया था। इसकी अध्यक्षता सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति प्रकाश प्रभाकर नवलकर कर रहे हैं। समिति में जनगणना आयुक्त, सेवानिवृत्त आईएएस दुर्गा शंकर मिश्रा, सेवानिवृत्त आईपीएस बालाजी श्रीवास्तव और डॉ. शमिका रवि सदस्य हैं। गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव (Foreigners-I) सदस्य सचिव हैं। समिति को एक वर्ष में अपनी रिपोर्ट देनी है, जिसे आवश्यकता पड़ने पर छह महीने तक बढ़ाया जा सकता है।

अवैध प्रवासन से लेकर सामाजिक संरचना तक अध्ययन

गृह मंत्रालय के अनुसार समिति विभिन्न क्षेत्रों में अवैध आप्रवासन और अन्य असामान्य कारणों से हुए जनसांख्यिकीय बदलावों का वैज्ञानिक अध्ययन करेगी। इसमें इनके कारण, सामाजिक संरचना, कानून-व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा तथा जनजातीय समाजों पर प्रभाव जैसे विषय शामिल हैं। समिति नीतिगत, विधायी और प्रशासनिक उपायों की सिफारिश भी करेगी।

हालांकि, किसी राज्य या समुदाय के संबंध में समिति का अंतिम निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है। इसलिए किसी क्षेत्र में आबादी के बदलाव को अभी समिति की जांच का अंतिम निष्कर्ष मानना उचित नहीं होगा।

उत्तराखंड में मामला केवल जनसंख्या वृद्धि का नहीं

उत्तराखंड के लिए इस समिति का अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि राज्य में जनसांख्यिकी का प्रश्न केवल आबादी बढ़ने या घटने तक सीमित नहीं है। इसमें पलायन, गांवों की आबादी में कमी, मैदानी जिलों का शहरीकरण, रोजगार आधारित आंतरिक प्रवासन, सीमावर्ती क्षेत्रों की आबादी और पहाड़ों में खाली होते ग्रामीण क्षेत्रों को अलग-अलग देखना होगा।

2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड की कुल आबादी 1,00,86,292 थी। इनमें हरिद्वार 18.90 लाख, देहरादून 16.97 लाख और ऊधमसिंह नगर 16.49 लाख आबादी वाले सबसे बड़े जिलों में थे। दूसरी ओर रुद्रप्रयाग की आबादी 2.42 लाख, बागेश्वर 2.60 लाख और चंपावत 2.60 लाख थी।

2011 के आंकड़ों में ऊधमसिंह नगर की दशकीय आबादी वृद्धि 33.44% थी, जबकि राज्य का औसत 18.81% था। जिले की 35.58% से अधिक आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती थी।

धर्म-आधारित आंकड़े भी उपलब्ध हैं, लेकिन उनका अर्थ सावधानी से समझना होगा

उत्तराखंड सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के अनुसार 2011 में राज्य में मुस्लिम आबादी 14,06,825 (13.95%), सिख आबादी 2.34%, ईसाई 0.37%, बौद्ध 0.15% और जैन 0.09% थी। विभाग के आंकड़ों में हरिद्वार में अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों की आबादी 35.63% और ऊधमसिंह नगर में 32.89% दर्ज है।

लेकिन इन आंकड़ों को अपने आप में अवैध प्रवासन का प्रमाण नहीं माना जा सकता। जनसंख्या में बदलाव के पीछे जन्म-दर, मृत्यु-दर, आंतरिक प्रवासन, रोजगार, शहरीकरण, शिक्षा और ऐतिहासिक आबादी संरचना जैसे अनेक कारण हो सकते हैं।

जनगणना-2027 से मिल सकता है नया आधार

इस पूरे विषय में उत्तराखंड के लिए एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। केंद्र सरकार जनगणना-2027 कर रही है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे बर्फीले/गैर-सिंक्रोनस क्षेत्रों के लिए जनसंख्या गणना का दूसरा चरण सितंबर 2026 में निर्धारित किया गया है। इसमें जनसांख्यिकीय, सामाजिक-आर्थिक, शिक्षा, प्रवासन और प्रजनन संबंधी जानकारी एकत्र की जानी है।

उत्तराखंड में जनगणना के पहले चरण के लिए लगभग 32,000 House Listing Blocks बनाए गए थे और 20,859 गणनाकर्मियों तथा 3,670 पर्यवेक्षकों को प्रशिक्षित किया गया था।

उत्तराखंड के सामने असली सवाल

इसलिए राज्य के संदर्भ में समिति के अध्ययन को केवल “किस समुदाय की आबादी कितनी बढ़ी” के सवाल तक सीमित करना पर्याप्त नहीं होगा। व्यापक तस्वीर के लिए कम से कम ये प्रश्न महत्वपूर्ण होंगे—

  • पहाड़ी जिलों से कितने लोग स्थायी रूप से बाहर गए?
  • कितने गांवों में आबादी में लगातार कमी हुई?
  • सीमावर्ती क्षेत्रों में पिछले दशकों में आबादी का क्या रुझान रहा?
  • देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और हल्द्वानी जैसे शहरी/औद्योगिक क्षेत्रों में आबादी वृद्धि के कारण क्या रहे?
  • रोजगार और शिक्षा के कारण होने वाले आंतरिक प्रवासन का कितना योगदान है?
  • सीमावर्ती गांवों में आबादी बनाए रखने के लिए सरकार की क्या नीति है?
  • नई जनगणना के आंकड़े 2011 के बाद हुए बदलाव को किस रूप में सामने लाते हैं?

यही अंतर “जनसांख्यिकीय बदलाव” और केवल “जनसंख्या वृद्धि” के बीच है। समिति की अंतिम रिपोर्ट आने तक उत्तराखंड में किसी भी निष्कर्ष को आधिकारिक आंकड़ों और प्रवासन के प्रमाणों के साथ ही देखा जाना चाहिए।

स्रोत: गृह मंत्रालय/पीआईबी, भारत की जनगणना, उत्तराखंड सरकार एवं उत्तराखंड अल्पसंख्यक कल्याण विभाग।


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By udaen

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