संपादकीय | खाद्य संकट की चेतावनी: भारत को अनाज के साथ अपनी कृषि-व्यवस्था भी बचानी होगी
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 29 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में Asia Society के कार्यक्रम में आने वाले महीनों में “बड़े खाद्य संकट” की आशंका जताई। उनके अनुसार युद्धों से अनाज की आपूर्ति प्रभावित हो रही है, उर्वरकों की उपलब्धता पर दबाव है और संभावित मजबूत El Niño स्थिति को और कठिन बना सकता है।
यह चेतावनी केवल भू-राजनीति का विषय नहीं है। FAO और WFP ने भी जून 2026 में 13 देशों/क्षेत्रों में जून-नवंबर के दौरान गंभीर खाद्य असुरक्षा बढ़ने का अनुमान व्यक्त किया था। FAO ने दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया समेत कई क्षेत्रों में El Niño से कृषि पर सूखे के जोखिम को रेखांकित किया।
और अब भारत के सामने चुनौती और स्पष्ट हो गई है। Reuters की 30 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, 2026 का जून-सितंबर मानसून औसत से 12.6% कम रहा और यह एक दशक से अधिक अवधि में सबसे कम वर्षा वाला मानसून रहा।
ऐसे समय में खाद्य सुरक्षा का अर्थ केवल सरकारी गोदामों में गेहूं-चावल का भंडार नहीं है। बीज, पानी, मिट्टी, उर्वरक, किसान की आय, स्थानीय उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला—सभी खाद्य सुरक्षा के हिस्से हैं।
भारत को तत्काल तीन स्तरों पर तैयारी करनी चाहिए—
पहला—राष्ट्रीय स्तर पर: गेहूं, चावल, दाल, खाद्य तेल और जरूरी कृषि इनपुट के रणनीतिक भंडार तथा आपूर्ति की नियमित सार्वजनिक समीक्षा हो।
दूसरा—किसान स्तर पर: उर्वरक की उपलब्धता, कीमत और वितरण की निगरानी हो। वर्षा-आधारित खेती वाले क्षेत्रों के लिए वैकल्पिक फसल, सिंचाई और बीमा योजना पहले से तैयार हो।
तीसरा—स्थानीय स्तर पर: पहाड़ी राज्यों में पारंपरिक अनाज, दालें, फल, सब्जियां, जलस्रोत और स्थानीय बीज-संरक्षण को केवल ग्रामीण विकास कार्यक्रम न मानकर भविष्य की खाद्य सुरक्षा की रणनीति बनाया जाए।
उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य के लिए यह चेतावनी विशेष महत्व रखती है। यहां गांवों की कृषि भूमि खाली होती रही, पारंपरिक खेती कमजोर हुई और खाद्य निर्भरता बढ़ी तो वैश्विक संकट का असर स्थानीय बाजार तक पहुंच सकता है। इसलिए पलायन रोकना, पहाड़ में कृषि-आधारित रोजगार बढ़ाना और स्थानीय खाद्य उत्पादन को मजबूत करना भी खाद्य सुरक्षा की नीति है।
जयशंकर की चेतावनी को भय पैदा करने वाली भविष्यवाणी की तरह नहीं, बल्कि पूर्व तैयारी का संकेत मानना चाहिए। संकट आएगा या उसकी तीव्रता कितनी होगी, यह अभी निश्चित नहीं है। लेकिन युद्ध, उर्वरक आपूर्ति, ऊर्जा कीमतों, मौसम और कमजोर मानसून जैसे जोखिम एक साथ मौजूद हैं।
अब सवाल यह नहीं कि खाद्य संकट आएगा या नहीं। सवाल यह है कि यदि वैश्विक खाद्य आपूर्ति पर दबाव बढ़ता है, तो भारत के गांव, किसान और उपभोक्ता कितने तैयार हैं?
सार्वजनिक मांग: केंद्र और राज्य सरकारें 2027 की कृषि और खाद्य-सुरक्षा रणनीति पर राज्यवार जोखिम आकलन, जिला-स्तरीय खाद्य भंडार, जल-संरक्षण, स्थानीय बीज बैंक और किसान-केंद्रित आपात योजना सार्वजनिक करें।
