हिमालय की चेतावनी और एटनबरो की विरासत
David Attenborough आज अपने जीवन के सौ वर्ष पूरे कर रहे हैं। यह केवल एक प्रसिद्ध वृत्तचित्र निर्माता का जन्मदिन नहीं, बल्कि उस चेतना का शताब्दी क्षण है जिसने पूरी दुनिया को पहली बार यह समझाया कि पृथ्वी मनुष्य की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि साझा जीवित विरासत है।
एटनबरो ने जंगलों, महासागरों, हिमखंडों और वन्यजीवों को केवल दृश्य सौंदर्य के रूप में नहीं दिखाया; उन्होंने यह बताया कि प्रकृति का संतुलन ही मानव सभ्यता की वास्तविक सुरक्षा है। विडंबना यह है कि जिस समय दुनिया उनके सौ वर्षों का उत्सव मना रही है, उसी समय उत्तराखंड का हिमालय लगातार संकट के संकेत दे रहा है।
उत्तराखंड आज विकास और पारिस्थितिकी के बीच संघर्ष का जीवंत उदाहरण बन चुका है। एक ओर चारधाम सड़क परियोजनाएँ, सुरंगें, बांध और तेजी से फैलता व्यावसायिक पर्यटन है; दूसरी ओर धंसते शहर, टूटते पहाड़, सिकुड़ते ग्लेशियर और अस्थिर होती नदियाँ हैं। जोशीमठ धंसाव से लेकर बार-बार आने वाली आपदाएँ यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि हिमालय मैदानों की तरह व्यवहार नहीं करता। उसकी अपनी भौगोलिक सीमाएँ और संवेदनशीलताएँ हैं।
हिमालय की चेतावनी और एटनबरो की विरासत आज विकास और पारिस्थितिकी के बीच संघर्ष का जीवंत उदाहरण बन चुका है। एक ओर चारधाम सड़क परियोजनाएँ, सुरंगें, बांध और तेजी से फैलता व्यावसायिक पर्यटन है; दूसरी ओर धंसते शहर, टूटते पहाड़, सिकुड़ते ग्लेशियर और अस्थिर होती नदियाँ हैं। जोशीमठ धंसाव से लेकर बार-बार आने वाली आपदाएँ यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि हिमालय मैदानों की तरह व्यवहार नहीं करता। उसकी अपनी भौगोलिक सीमाएँ और संवेदनशीलताएँ हैं।
समस्या केवल परियोजनाओं की नहीं, उस सोच की है जिसमें प्रकृति को “संसाधन” मान लिया गया है। जंगल लकड़ी बन गए, नदियाँ बिजली उत्पादन का माध्यम और पहाड़ केवल रियल एस्टेट की संभावना। विकास की इस दौड़ में हिमालय की सहनशीलता को लगभग अनदेखा कर दिया गया।
एटनबरो लगातार कहते रहे कि मानव सभ्यता प्रकृति से अलग होकर सुरक्षित नहीं रह सकती। उत्तराखंड में यह चेतावनी और अधिक प्रासंगिक हो जाती है, क्योंकि यहाँ पर्यावरणीय संकट सीधे लोगों के जीवन, पलायन, जल स्रोतों, खेती और सांस्कृतिक अस्तित्व से जुड़ा है। पहाड़ केवल भूगोल नहीं होते; वे समाज, स्मृति और सभ्यता के आधार होते हैं।
विडंबना यह भी है कि जिसे “देवभूमि” कहा जाता है, वहीं नदियाँ मलबे और प्रदूषण का भार झेल रही हैं, जंगल आग से जूझ रहे हैं और पहाड़ लगातार काटे जा रहे हैं। आध्यात्मिकता और प्रकृति के बीच जो संबंध भारतीय परंपरा में कभी स्वाभाविक था, आधुनिक विकास मॉडल ने उसे कमजोर कर दिया है।
एटनबरो का शताब्दी वर्ष उत्तराखंड के लिए एक प्रतीकात्मक दर्पण की तरह देखा जाना चाहिए। यह समय केवल श्रद्धांजलि देने का नहीं, बल्कि यह तय करने का है कि विकास का अर्थ क्या होगा — तात्कालिक आर्थिक लाभ या आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित हिमालय।
क्योंकि अंततः प्रश्न यही है: यदि हिमालय असुरक्षित हो गया, तो उत्तराखंड की पहचान, संस्कृति और भविष्य कितना सुरक्षित रह पाएगा?
