Spread the love


“देहरादून के कॉलेज: शिक्षा का केंद्र या डिग्री का बाजार?”

देहरादून को कभी “शिक्षा की राजधानी” कहा जाता था—जहाँ स्कूलों की गुणवत्ता देशभर में उदाहरण मानी जाती थी। लेकिन आज जब बात उच्च शिक्षा, यानी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की आती है, तो यह छवि गंभीर सवालों के घेरे में है। सवाल यह नहीं कि संस्थानों की संख्या कितनी है, बल्कि यह है कि वे वास्तव में क्या दे रहे हैं—शिक्षा या सिर्फ प्रमाणपत्र?

पिछले एक दशक में देहरादून में निजी विश्वविद्यालयों की बाढ़ आई है। , , , जैसे संस्थान आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, आकर्षक कैंपस और प्लेसमेंट के वादों के साथ छात्रों को आकर्षित करते हैं। पहली नजर में ये संस्थान “ग्लोबल स्टैंडर्ड” का दावा करते हैं, लेकिन गहराई से देखने पर एक अलग ही तस्वीर सामने आती है।

इन संस्थानों का बड़ा हिस्सा शिक्षा के व्यावसायीकरण (commercialization) का उदाहरण बन चुका है। फीस संरचना लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन उसके अनुपात में शिक्षण गुणवत्ता, शोध, और रोजगार के अवसरों में समान वृद्धि नहीं दिखती। “प्लेसमेंट” एक मार्केटिंग टूल बन गया है, जहाँ कुछ चुनिंदा सफल उदाहरणों को पूरे संस्थान की उपलब्धि के रूप में पेश किया जाता है।

दूसरी ओर, सरकारी और पारंपरिक कॉलेज—जैसे और —संरचनात्मक चुनौतियों से जूझ रहे हैं। यहाँ फीस कम है और पहुँच अधिक, लेकिन संसाधनों की कमी, भीड़, और सीमित फैकल्टी के कारण गुणवत्ता प्रभावित होती है। नतीजा यह कि छात्र या तो भीड़ में गुम हो जाता है या फिर निजी संस्थानों की ओर धकेल दिया जाता है, जहाँ आर्थिक बोझ उसका इंतजार करता है।

इस पूरी व्यवस्था में नियामक संस्थाओं की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। और अन्य नियामक निकाय मानकों की बात तो करते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर निरीक्षण और जवाबदेही अक्सर कमजोर दिखती है। नए-नए विश्वविद्यालयों को मान्यता देना आसान है, लेकिन उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित करना उतना ही कठिन—और यही कमी इस “डिग्री बाजार” को बढ़ावा देती है।

सबसे गंभीर असर छात्रों पर पड़ता है। वे लाखों रुपये खर्च कर डिग्री तो हासिल कर लेते हैं, लेकिन जब रोजगार बाजार में उतरते हैं, तो उन्हें एहसास होता है कि उनके पास वह कौशल नहीं है जिसकी मांग है। तब वही छात्र “अनुभव” के लिए संघर्ष करता है—इंटर्नशिप, छोटे काम, और जमीनी सीख के जरिए—जो उसे कॉलेज में मिलना चाहिए था।

यह केवल शिक्षा का संकट नहीं, बल्कि नीतिगत और नैतिक विफलता है।
जब शिक्षा “निवेश” बन जाती है और छात्र “ग्राहक”, तो ज्ञान की जगह “रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट” ले लेता है।

देहरादून के कॉलेज आज एक चौराहे पर खड़े हैं:

  • क्या वे वास्तव में ज्ञान और कौशल के केंद्र बनेंगे?
  • या फिर वे “डिग्री की फैक्ट्री” बनकर ही रह जाएंगे?

समाधान स्पष्ट है, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति और संस्थागत ईमानदारी की मांग करता है:

  • निजी विश्वविद्यालयों की फीस और गुणवत्ता पर सख्त नियमन
  • सरकारी कॉलेजों में निवेश और फैकल्टी सुदृढ़ीकरण
  • उद्योग से जुड़ा पाठ्यक्रम और अनिवार्य व्यावहारिक प्रशिक्षण
  • और सबसे महत्वपूर्ण—जवाबदेही, जो आज सबसे कमजोर कड़ी है

जब तक यह बदलाव नहीं होगा, तब तक देहरादून का छात्र भी वही कहेगा जो आज हजारों कह रहे हैं—
“कॉलेज डिग्री के लिए था, सीखना तो बाहर ही हुआ।”


Spread the love

By udaen

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *