Spread the love

लोकतंत्र की सबसे बुनियादी धारणा यह है कि सत्ता जनता से उत्पन्न होती है और उसी के प्रति जवाबदेह रहती है। की प्रस्तावना “We the People” इस सिद्धांत को स्पष्ट रूप से स्थापित करती है। लेकिन व्यवहार में एक अलग ही संरचना विकसित हो चुकी है—जहाँ सरकार की प्राथमिक जवाबदेही जनता के बजाय राजनीतिक विपक्ष के प्रति अधिक दिखाई देती है।

संसदीय प्रणाली में सत्ता सरकार को जवाबदेही का मुख्य मंच माना गया है। प्रश्नकाल, बहस, और अविश्वास प्रस्ताव—ये सभी औपचारिक उपकरण सरकार को जवाब देने के लिए बाध्य करते हैं। परंतु इस पूरी प्रक्रिया में “जनता” एक प्रत्यक्ष सहभागी के रूप में अनुपस्थित रहती है। उसकी भूमिका प्रतिनिधियों के माध्यम तक सीमित कर दी जाती है, और यही सीमित प्रतिनिधित्व धीरे-धीरे जवाबदेही के वास्तविक दायरे को संकुचित कर देता है।

समस्या केवल प्रक्रियात्मक नहीं, बल्कि संरचनात्मक भी है। राजनीतिक विमर्श का फ्रेम लगातार “पक्ष बनाम विपक्ष” में ढल चुका है। नीतिगत प्रश्नों को भी इस द्वंद्व में प्रस्तुत किया जाता है, जिससे सार्वजनिक हित के जटिल मुद्दे चुनावी नैरेटिव में सरल लेकिन भ्रामक रूप में बदल जाते हैं। इस प्रक्रिया में नागरिक—जो नीतियों के वास्तविक प्रभावित पक्ष हैं—बहस के केंद्र से बाहर हो जाते हैं।

मीडिया की भूमिका भी इस प्रवृत्ति को मजबूत करती है। टकराव-आधारित प्रस्तुति, बहसों का ध्रुवीकरण, और व्यक्तित्व-आधारित राजनीति—ये सभी तत्व सार्वजनिक जवाबदेही को संस्थागत संवाद से हटाकर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तक सीमित कर देते हैं। परिणामस्वरूप, सरकार का ध्यान उस मंच पर अधिक केंद्रित हो जाता है जहाँ तत्काल राजनीतिक चुनौती मौजूद होती है—न कि उस समाज पर, जिसके लिए नीतियाँ बनाई जा रही हैं।

यह स्थिति लोकतंत्र की विफलता नहीं, बल्कि उसकी अधूरी संरचना का संकेत है। प्रतिनिधिक लोकतंत्र स्वाभाविक रूप से मध्यस्थों—राजनीतिक दलों और निर्वाचित प्रतिनिधियों—पर निर्भर करता है। लेकिन जब यही मध्यस्थ संवाद के एकमात्र माध्यम बन जाते हैं, तो प्रत्यक्ष नागरिक जवाबदेही कमजोर पड़ जाती है।

समाधान केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति में नहीं, बल्कि संस्थागत पुनर्संतुलन में निहित है। नीतियों के निर्माण से पहले अनिवार्य जन-परामर्श, नियमित सार्वजनिक ब्रीफिंग, और निर्णयों के स्पष्ट व सरल स्पष्टीकरण—ये सभी उपाय जवाबदेही को प्रत्यक्ष रूप से जनता की ओर मोड़ सकते हैं। साथ ही, और जैसी संस्थाओं को अधिक स्वायत्त और प्रभावी बनाना आवश्यक है, ताकि जवाबदेही केवल राजनीतिक बहस तक सीमित न रहे, बल्कि संस्थागत रूप से सुनिश्चित हो।

अंततः, लोकतंत्र केवल एक चुनावी व्यवस्था नहीं है; यह एक सतत संवाद की प्रक्रिया है। यदि सरकारें विपक्ष को जवाब देकर अपने दायित्व की पूर्ति मान लें और जनता उस संवाद से बाहर रह जाए, तो यह लोकतंत्र के मूल उद्देश्य का आंशिक परित्याग है।

जवाबदेही का वास्तविक अर्थ तब ही पूरा होगा, जब सत्ता न केवल संसद में, बल्कि सीधे समाज के सामने भी उतनी ही पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के साथ खड़ी हो।


Spread the love

By udaen

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *