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आधी आबादी का अधिकार, आधा नहीं—पूरा प्रतिनिधित्व

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता और समावेशिता में निहित है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस देश में महिलाएं आबादी का लगभग आधा हिस्सा हैं, वहां सत्ता के सर्वोच्च मंचों—लोकसभा और विधानसभाओं—में उनकी भागीदारी अब भी सीमित है। दशकों से उठती रही महिलाओं के राजनीतिक आरक्षण की मांग अब जाकर एक निर्णायक मोड़ पर पहुंची है, जब सरकार ने एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रस्ताव रखा है।

यह प्रस्ताव केवल एक कानून नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक हस्तक्षेप है। पंचायतों और स्थानीय निकायों में आरक्षण के अनुभव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि महिलाएं नेतृत्व की क्षमता में किसी से कम नहीं हैं। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देकर प्रशासन की दिशा ही बदल दी है।

फिर भी, राष्ट्रीय और राज्य स्तर की राजनीति में उनकी उपस्थिति नगण्य बनी रही। इसके पीछे केवल अवसरों की कमी नहीं, बल्कि एक गहरे जड़ जमा चुके पितृसत्तात्मक ढांचे की बाधाएं भी हैं, जो महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया से दूर रखती हैं। ऐसे में आरक्षण एक आवश्यक सुधारात्मक कदम बन जाता है।

हालांकि, इस प्रस्ताव के साथ कुछ शर्तें और चुनौतियां भी जुड़ी हैं। इसे परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ने का अर्थ है कि इसका वास्तविक क्रियान्वयन अभी दूर की बात हो सकती है। क्या यह देरी इस ऐतिहासिक पहल को महज एक राजनीतिक घोषणा बनाकर नहीं छोड़ देगी? यह सवाल उठना स्वाभाविक है।

इसके अलावा, यह बहस भी महत्वपूर्ण है कि क्या महिलाओं के भीतर भी सामाजिक रूप से वंचित वर्गों—जैसे दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग—को अलग से प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। यदि आरक्षण का लाभ केवल एक सीमित वर्ग तक सिमट जाता है, तो इसका उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।

आलोचकों द्वारा ‘योग्यता’ का मुद्दा उठाया जाता है, लेकिन यह तर्क उस ऐतिहासिक असमानता को अनदेखा करता है, जिसने महिलाओं को बराबरी का अवसर ही नहीं दिया। आरक्षण, दरअसल, बराबरी की दौड़ में एक समान शुरुआत सुनिश्चित करने का माध्यम है।

इस प्रस्ताव का स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन केवल उत्साह पर्याप्त नहीं है। जरूरत है स्पष्ट समयसीमा, पारदर्शी प्रक्रिया और वास्तविक राजनीतिक इच्छाशक्ति की।

क्योंकि सवाल केवल सीटों का नहीं, बल्कि उस सोच का है जो तय करती है कि देश की दिशा कौन तय करेगा—आधी आबादी या पूरा समाज।


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By udaen

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