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वनाग्नि पर कड़ा प्रहार—तैयारी, तकनीक और जनभागीदारी का नया खाका

उत्तराखंड में हर वर्ष गर्मियों के साथ वनाग्नि की चुनौती विकराल रूप ले लेती है। ऐसे में मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन की अध्यक्षता में सचिवालय में हुई बैठक केवल एक औपचारिक समीक्षा नहीं, बल्कि आने वाले फायर सीजन से पहले एक ठोस रणनीतिक हस्तक्षेप के रूप में देखी जानी चाहिए।

बैठक में दिए गए निर्देश स्पष्ट संकेत देते हैं कि सरकार अब प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि पूर्व-तैयारी आधारित (proactive) दृष्टिकोण अपनाने की ओर बढ़ रही है। जनवरी तक सभी समितियों और स्टेकहोल्डर्स के साथ बैठकें सुनिश्चित करने का निर्देश इस बात का प्रमाण है कि समय रहते समन्वय स्थापित करने पर जोर दिया जा रहा है। अक्सर देखा गया है कि योजनाएं कागजों तक सीमित रह जाती हैं, लेकिन यदि इन बैठकों के जरिए ज़मीनी स्तर तक कार्ययोजना पहुंचती है, तो परिणाम निश्चित रूप से बेहतर होंगे।

फायर हाइड्रेंट्स के लिए डेडिकेटेड प्रेशर पाइपलाइन की व्यवस्था एक तकनीकी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण कदम है। यह न केवल आग बुझाने की गति को बढ़ाएगा, बल्कि दुर्गम क्षेत्रों में भी त्वरित प्रतिक्रिया को संभव बनाएगा। पेयजल विभाग को प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश इस दिशा में गंभीरता को दर्शाते हैं।

वन विभाग को ड्राइव चलाकर व्यवस्थाओं का निरीक्षण करने और उपकरणों व वाहनों के रखरखाव के निर्देश यह स्पष्ट करते हैं कि संसाधनों की उपलब्धता के साथ उनकी कार्यक्षमता पर भी ध्यान दिया जा रहा है। लीसा डिपो में सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू करने का निर्देश भी अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि कई बार यही स्थान आग के बड़े केंद्र बन जाते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है फॉरेस्ट फायर के लिए प्रिडिक्शन मॉडल विकसित करने का निर्देश। यदि Forest Survey of India और मौसम विभाग मिलकर सटीक पूर्वानुमान तैयार कर पाते हैं, तो यह वनाग्नि प्रबंधन में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। आपदा प्रबंधन की तर्ज पर काम करने से समय रहते अलर्ट जारी करना संभव होगा।

इसके साथ ही, पिरूल (चीड़ की सूखी पत्तियां) के निस्तारण और पिरुल ब्रिकेट के उत्पादन को बढ़ावा देना एक बहुआयामी समाधान के रूप में उभरता है। यह पहल न केवल वनाग्नि के प्रमुख कारण को कम करेगी, बल्कि स्वयं सहायता समूहों की आय बढ़ाने, वैकल्पिक ईंधन उपलब्ध कराने और कार्बन क्रेडिट जैसे आधुनिक आर्थिक साधनों से जुड़ने का अवसर भी प्रदान करेगी।

बैठक में सचिव दिलीप जावलकर, पंकज कुमार पाण्डेय, सुशांत कुमार पटनायक सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों और जिलाधिकारियों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि यह प्रयास केवल एक विभाग तक सीमित नहीं, बल्कि एक संपूर्ण प्रशासनिक तंत्र का सामूहिक अभियान बनने की दिशा में है।

यह बैठक उत्तराखंड में वनाग्नि प्रबंधन के लिए एक व्यापक और दूरदर्शी दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। अब असली परीक्षा इन निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन की है। यदि सरकार, प्रशासन और स्थानीय समुदाय मिलकर इस दिशा में काम करें, तो न केवल जंगल सुरक्षित रहेंगे, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई ऊर्जा मिलेगी।


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By udaen

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