दिखाई से परे: आंकड़ों के बिना अधूरा है दिव्यांग समावेशन
भारत में दिव्यांगजन अधिकारों पर चर्चा अक्सर सहानुभूति और कल्याणकारी योजनाओं तक सीमित रह जाती है, जबकि वास्तविक चुनौती समावेशन की है—ऐसा समावेशन जो नीति, बजट और क्रियान्वयन के हर स्तर पर दिखे। इसी संदर्भ में National Centre for Promotion of Employment for Disabled People द्वारा तैयार “Beyond the Visible: A Handbook on Disability Inclusion for Parliamentarians” का विमोचन एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया है। इस अवसर पर Ramdas Athawale का यह कहना कि “सटीक आंकड़े ही प्रभावी नीतियों की नींव हैं”, वर्तमान नीति-परिदृश्य की एक गहरी सच्चाई को उजागर करता है।
भारत में दिव्यांगजनों की वास्तविक संख्या, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति, शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य तक पहुंच जैसे मुद्दों पर विश्वसनीय और अद्यतन आंकड़ों का अभाव लंबे समय से महसूस किया जाता रहा है। जनगणना और सर्वेक्षणों में असंगतियां न केवल नीति निर्माण को कमजोर करती हैं, बल्कि योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में भी बाधा बनती हैं। परिणामस्वरूप, कई कल्याणकारी योजनाएं अपने लक्षित लाभार्थियों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पातीं।
Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 ने दिव्यांगजनों को अधिकार-आधारित दृष्टिकोण के तहत समान अवसर, गरिमा और भागीदारी सुनिश्चित करने का मार्ग प्रशस्त किया है। लेकिन कानून की भावना तब तक पूर्ण रूप से साकार नहीं हो सकती, जब तक नीति-निर्माण ठोस और विश्वसनीय आंकड़ों पर आधारित न हो।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि दिव्यांगता केवल एक सामाजिक या स्वास्थ्य संबंधी मुद्दा नहीं, बल्कि विकास, अर्थव्यवस्था और मानवाधिकार का भी प्रश्न है। यदि सरकार और संसद के पास सटीक डेटा होगा, तो वे शिक्षा, रोजगार, सार्वजनिक ढांचे और डिजिटल पहुंच जैसे क्षेत्रों में अधिक लक्षित हस्तक्षेप कर सकेंगे। इससे न केवल दिव्यांगजनों का जीवन स्तर सुधरेगा, बल्कि देश की समग्र उत्पादकता और समावेशी विकास को भी बल मिलेगा।
हालांकि, केवल डेटा एकत्र करना ही पर्याप्त नहीं है। उसे सही तरीके से विश्लेषित करना, समय-समय पर अद्यतन करना और नीतियों में प्रभावी ढंग से उपयोग करना भी उतना ही आवश्यक है। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय, तकनीकी क्षमता और जवाबदेही तंत्र को मजबूत करना होगा।
अंततः, “दिखाई से परे” देखने की जरूरत केवल एक हैंडबुक का शीर्षक नहीं, बल्कि नीति-निर्माण की दिशा में एक मूलभूत बदलाव का आह्वान है। यदि भारत को वास्तव में समावेशी और न्यायसंगत समाज बनाना है, तो दिव्यांगजनों के लिए नीतियां भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर बनानी होंगी। यही सच्चे अर्थों में समावेशन की ओर बढ़ने का रास्ता है।
