यह हादसा नहीं, सिस्टम की सज़ा है
दिल्ली की सड़क पर खुले गड्ढे में गिरकर पौड़ी (उत्तराखंड) के निवासी कमल ध्यानी की मौत एक “दुर्घटना” नहीं है। यह उस व्यवस्था का परिणाम है जो नागरिकों की सुरक्षा को वैकल्पिक मानती है और मौत के बाद औपचारिक संवेदनाएँ बाँटकर अपना पल्ला झाड़ लेती है।
देश की राजधानी में यदि सड़कें जानलेवा जाल बनी हुई हैं, तो यह विकास नहीं—प्रशासनिक दिवालियापन है। निर्माण एजेंसियाँ सड़कें खोदकर गायब हो जाती हैं, विभाग निरीक्षण के नाम पर काग़ज़ी खानापूर्ति करते हैं, और जब कोई नागरिक गड्ढे में गिरकर मर जाता है, तो वही सिस्टम इसे “दुर्भाग्य” बताकर हाथ खड़े कर देता है।
सवाल यह नहीं कि गड्ढा क्यों खुला था। सवाल यह है कि किसके आदेश पर, किसकी निगरानी में, और किसकी मिलीभगत से वह खुला छोड़ा गया। चेतावनी बोर्ड कहाँ थे? बैरिकेडिंग क्यों नहीं थी? जिम्मेदार अधिकारी ने आख़िरी बार निरीक्षण कब किया? इन सवालों के जवाब हर मौत के साथ दफ़न कर दिए जाते हैं।
कमल ध्यानी की मौत इस कड़वी सच्चाई को फिर उजागर करती है कि भारत में आम नागरिक की जान की कीमत एक प्रेस नोट और मुआवज़े की राशि तक सीमित कर दी गई है। हादसे के बाद सक्रिय होने वाला तंत्र, हादसे से पहले क्यों निष्क्रिय रहता है—इसका कोई जवाब नहीं।
सबसे आपत्तिजनक तथ्य यह है कि जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया शुरू होते ही ठेकेदार और विभाग एक-दूसरे पर दोष मढ़ने लगते हैं। अंततः “प्राकृतिक परिस्थितियाँ”, “अचानक बारिश” या “मानवीय भूल” जैसे शब्द सामने आ जाते हैं—मानो खुले गड्ढे अपने आप पैदा हो जाते हों।
यह केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं है; यह शासन की नैतिक और प्रशासनिक विफलता का सार्वजनिक प्रमाण है। यदि दोषियों के नाम सामने नहीं आए, यदि सख़्त दंड नहीं हुआ, तो यह तय मान लिया जाए कि अगली मौत भी सिस्टम की सहमति से होगी।
अब समय है शोक-संदेशों की राजनीति बंद करने का। नाम तय हों, ज़िम्मेदारी तय हो, और सज़ा दिखे। वरना हर खुला गड्ढा यह ऐलान करता रहेगा—यहाँ नागरिक नहीं, सिर्फ़ लापरवाही चलती है।
