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स्थान-समरकंद, उज्बेकिस्तान
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6 अप्रैल 2025 को स्वराज विमर्श यात्रा जलपुरुष राजेन्द्र सिंह जी के नेतृत्व में समरकंद, क्लाइमेट फोरम इंटरनेशनल कांफ्रेंस में रही। यहां कांफेंस के अंतिम दिन जलपुरुष राजेन्द्र सिंह जी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि, हिमालय से उज्बेकिस्तान के रिश्ते की बात करें तो हिमालय की फुटहिल से जुड़ा हुआ पर्वत श्रृंखला का नाम है करकोल काराकुलम है । छोटी-छोटी पर्वतमाला है, जिनको हम हिमालय के बच्चे कह सकते हैं तो इन ‌ ‌‌‌‌ पर्वतमालाओं में से जो छोटी-छोटी नदियां निकलती हैं। एक जमाने में बहुत अच्छी बारिश से यहां की नदियों का जल प्रभाव बहुत ज्यादा थातो यह बड़ी नदियां और बहुत अच्छा पानी दिखता था लेकिन जैसा सदैव होता है कि जब पावर और पैसा होता है तो फिर प्रकृति को देखने का प्रकृति को समझने का नजरिया टूट जाता है ।

संयुक्त रूस के काल में आमू व सुरकान दोनों नदियों का जिस तरह से शोषण हुआ और उनकी जमीन पर अतिक्रमण करके नदी के प्रवाह को मोड़ दिया गया और फिर उसे सारे पानी का शोषण उद्योगों में शेहरो के लिए पेयजलऔर कपास खेती के लिए किया गया तो आज केवल यह उज्बेकिस्तान की कहानी नहीं है । यह पूरे सेंट्रल एशिया की और दुनिया की कहानी है । नदियों की कहानी है ।

भारत जिन नदियों को नारायण मानता था।जब तक उसने नदियों के साथ नारायण जैसा और मां जैसा व्यवहार किया तो भारत की नदियां शुद्ध सदा निरा अविरल निर्मल बनकर बहती रही। अंग्रेजों के काल में भारत की नदियों का भी यही हाल हुआ जैसे यहां की सूर कान दरिया और आमू दरिया का और आरएलसी का हुआ हैइस वक्त जो विकास के नाम पर हमारा लालच हमें विनाश की तरफ लेकर जा रहा है इसने हमें लोभी लालची और केवल लाभ देखने वाला बना दिया ।

आज सब का शुभ का नजरिया मिट गया है।उज्बेकिस्तान में तो शुभ का नजरिया था ही नहीं तो जहां-जहां शुभ का नजरिया था वह भी अभी ईकसवी शताब्दी में रहा नहीं और जहां यह नजरिया नहीं था वहां तो नदियों के बारे में वह सोचही नहीं रही। बिना सोचे ही नदियों को केवल मनुष्य ने अपने भोग की वस्तु मानकर कहीं उसको मेला ढोने वाली मालगाड़ी बना दिया है। और कहीं अपने भोग की वस्तु मानकर उसको मोड़ के जहां उसके जल का भोग कर सकते थे वह वहां ले गए जैसे उजबैकिस्तान मे रुस की सरकार ने आमू दरिया को हजारों किलोमीटर दूर तक पानी ले जा कर किया है। यह जो नदियों के बारे में नजरिया है इस नजरिया को अब सेंट्रल एशिया में कोई भी सम्मान सहित पालन नहीं कर रहा है इसलिए एशिया के जितने भी ट्रीटी हुई है उन ट्रीटी में ज्यादातर फेलियर है कोई भी देश उनको मान नहीं रहा है । वर्तमान सरकारी कह देती है कि पिछली सरकार ने इस निर्णय को बिना समझ लिया था इसलिए हम उसको नहीं मानते तो इस वक्त नदियों के साथ बड़ा अन्याय हो रहा है इन्हें अन्याय को यदि रोकना है ।

नदियों के साथ होते हुए अन्याय​ को यदि रोकना है तो अब नदियों को ईन्सानी अधिकार दे। नदी ​को अपना जमीन का अधिकार है ।

नदी का अपना प्रवाह का अधिकार है पर्यावरणीय प्रवाह होना ही चाहिए नदियों में गंदे नाले ना मिले शुद्ध जल के प्रवाह को बनाए रखना यह जो नदियों के अपने मूल मौलिक अधिकार हैं उसको इंसान के लालच ने खत्म किया है । हमें ऐसी रीजनल कॉन्फ्रेंस में नदियों के मौलिक अधिकार को नदियों को इंसानी दर्जा देकर व्यवस्था बनानी पड़ेगी इंसानी दर्जा देना है इसलिए जरूरी है। वह केवल न्यूजीलैंड की नदी ही नहीं जिसको अभी तक न्यूजीलैंड की बागानों नदी को हीइंसानी दर्जा मिला। यह दुनिया की सब नदियों को इंसानी दर्जा मिलना चाहिए क्योंकि नदिया दुनिया की सारी सभ्यताओं की जन्मदाता रही है । जो सभ्यताओं की जन्मदाता नदियां हैं ।

उनको यदि आप इंसानी दर्जा देकर नहीं देखेंगे तो यह उनकी हालत बिगड़ती ही जाएगी इसलिए जिस तरह से मानव अधिकार है वैसे ही नदी अधिकार है तो हम नदी अधिकार को सुनिश्चित करें तब नदियों के लिए ट्रीटी बने और उसी स्थिति में नदी का अधिकार सबसे पहले दिया जाए फिर मानव के उपयोग का की व्यवस्था दी जाए तो जो समझोते हो गे उन में संवेदन आ जाएगी ।

सभी सरकार सब सरकारी राष्ट्रीय सीमाओं को प्राथमिकता नहीं देगी बल्कि वह नदी के प्रवाह को पर्यावरणीय प्रवाह को प्राप्त कर ने और नदियों के पर्यावरण में प्रभाव में अपने लिए शुभ और अपना हित ढूंढेंगे ।

आज यह जो समरकंद क्लाइमेट फोरम हुआ इस फॉर्म में आए सभी मंत्रियों की जो पानी की दृष्टि है वह पानी को व्यापार की वस्तु मानकर अधिक से अधिक पानी पाने की दृष्टि है।नदी के अधिकार की दृष्टि नहीं है तो यदि यह दृष्टि रहेगी तो बहुत सारे विवादों को समझने वाले ट्रिब्यूनल बनेंगे और टर्मिनल में जब तक निर्णय होगा तब तक वहां की स्थिति बदल जाएगी और ट्रिब्यूनल का लिया हुआ निर्णय वह कारगर नहीं होगा इसलिए हमें अब समरकंद जैसी रीजनल मंचों पर नदियों के प्रवाह को और नदियों के जीवन के अधिकार को प्राथमिकता देनी होगी नदी के अधिकार को प्राथमिकता देंगे तो नदियां शुद्ध सदा नीरा बनाकर बहेगी और फिर हमारी सभ्यताएं और संस्कृति पुनर्जीवित होती रहे।नहीं तो यह जो आज पानी के व्यापार का चलन बढ़ गया है इसी चलन में नदियों के अतिक्रमण प्रदूषण और शोषण का ही स्वभाव बन रहा है नदियों यह स्वभाव नदियों का हत्यारा है हम यदि नदियों को पुनर्जीवित करना चाहते हैं तो समरकंद जलवायु परिवर्तन मंच में हम सबको मिलकर नदियों के मिट्टी के हवा के अधिकार को सुनिश्चित हो।समरकन्द जैसे जलवायु मंच क्षेत्रीय स्तर पर पुरी दुनिया में बने। जैसे यह सेंट्रल एशिया का मंच है ।

सारे दुनिया में ऐसे ही बने। नदियों की पर्यावरणीय प्रवहा को सुनिश्चित करके नदियों को जीवन देंगे तो हमारी सभ्यता और हमारी संस्कृति में शांति समृद्धि और समाधान के साथ आनंद से जीने का संस्कार आएगा बस शांति में आनंद के संस्कार के लिए हम सब एक होकर समरकंद जलवायु मंच में मिलकर निर्णय करें। यह काम अनुकूलन ओर उनमूलन है। मिलकर करेंगे तो अच्छा परिवर्तन और परिणाम मिलेगा।
यात्रा 7 अप्रैल को ताशकंद से जयपुर पहुंची।

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By udaen

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