“जल, जंगल, जमीन”—यह केवल संसाधन नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पहाड़ों की आत्मा हैं।
उत्तराखंड का जागरूक समाज हमेशा से जल, जंगल और जमीन पर अपने हक के लिए संघर्ष करता आया है। चाहे वह “चिपको आंदोलन” हो या हाल के वनाधिकार संघर्ष, पहाड़ के लोग जानते हैं कि ये संसाधन सिर्फ प्राकृतिक संपदा नहीं, बल्कि उनके जीवन, आजीविका और संस्कृति की नींव हैं।
क्यों जरूरी है जल, जंगल, जमीन का अधिकार?
✅ जल – जल स्रोतों का संरक्षण और उनका स्थानीय समुदायों द्वारा स्वायत्त प्रबंधन।
✅ जंगल – वन अधिकार अधिनियम के तहत ग्रामीणों को वनों पर हक और वनों की रक्षा में उनकी भूमिका।
✅ जमीन – बड़े प्रोजेक्ट्स और भूमि अधिग्रहण में स्थानीय लोगों की सहमति और उचित पुनर्वास।
आज जब उत्तराखंड में बड़ी परियोजनाओं, अवैध खनन और जल संकट जैसी चुनौतियाँ सामने हैं, तो एक जागरूक समाज की भूमिका और भी अहम हो जाती है। हमें पारंपरिक ज्ञान, सहकारी मॉडल और सामुदायिक भागीदारी को अपनाकर इन संसाधनों पर अपना हक बनाए रखना होगा।
