
इस बैग की खासियत ये है कि बेकार होने के बाद इसे मिट्टी में दबाने पर यह खाद के रूप में तब्दील हो जाती है। जिसका इस्तेमाल पौधों और अन्य प्रकार की फसलों में किया जा सकता है। बैग में फल-सब्जी, घर का अन्य सामान लाने के साथ गरम खाना भी पैक किया जाता है। टेस्टिंग के मानकों पर खरा उतरने के बाद केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने भी मान्यता दी है।
केंद्र और प्रदेश सरकार ने पर्यावरण संरक्षण के लिए प्लास्टिक बैग पर प्रतिबंध लगाया है। इधर काशीपुर की एक स्टार्ट अप कंपनी ईको ग्रीन इंडस्ट्री ने इसका विकल्प तैयार किया है। जर्मनी तकनीक से मक्का, साबू दाना के स्टार्च से कंपोस्टेबल बायोडिग्रेडेबल (प्राकृतिक रूप से समाप्त होने वाला) बैग बनाए जा रहे हैं।
बैग को इस्तेमाल करने के बाद बेकार होने पर इसे डंपिंग ग्राउंड या मिट्टी में दबाने पर तीन से छह माह के भीतर खाद तैयार हो जाती है। पर्यावरण प्रदूषण बोर्ड ने इस बैग को अनुमति दी है। वर्तमान में प्लांट की क्षमता प्रतिदिन 50 टन बैग बनाने की है। इसे बढ़ा कर 100 टन करने के लिए कंपनी ने जर्मनी से मशीनरी निर्यात की है।
