संपादकीय | जंगल से समृद्धि की राह: उत्तराखंड के गांवों की अर्थव्यवस्था बदलने का समय
जंगल बचेंगे, गांव कमाएंगे और पहाड़ में रोजगार बढ़ेगा, तभी पलायन की चुनौती का स्थायी समाधान निकलेगा।
उत्तराखंड की पहचान उसके जंगल, नदियां, पहाड़ और जैव विविधता हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जिस प्राकृतिक संपदा को देखने के लिए दुनिया भर से पर्यटक पहाड़ों का रुख करते हैं, उसी संपदा के बीच रहने वाले अनेक ग्रामीण परिवार आजीविका के सीमित विकल्पों से जूझ रहे हैं। सवाल है कि क्या उत्तराखंड के जंगल केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित रहेंगे, या वे गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का आधार भी बनेंगे?
इस सवाल का जवाब पहाड़ के विकास की दिशा बदल सकता है।
जंगल केवल प्राकृतिक संपदा नहीं, आर्थिक संभावना भी हैं
उत्तराखंड के जंगलों में बुरांश, काफल, हिसालू, औषधीय पौधे, प्राकृतिक रेशे, बांस और रिंगाल जैसे अनेक संसाधन हैं। चीड़ की पत्तियों से भी उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इन संसाधनों का वैज्ञानिक और टिकाऊ उपयोग ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई संभावनाएं पैदा कर सकता है।
लेकिन इसके लिए सोच बदलनी होगी। जंगल से मिलने वाले उत्पादों को केवल कच्चे माल के रूप में बेचने के बजाय स्थानीय स्तर पर उनका प्रसंस्करण, पैकेजिंग और विपणन विकसित करना होगा।
कल्पना कीजिए कि किसी पहाड़ी गांव में बुरांश से पेय पदार्थ तैयार करने की इकाई हो, स्थानीय युवाओं को चीड़ की पत्तियों से उपयोगी उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण मिले, महिला समूह स्थानीय फलों से खाद्य उत्पाद तैयार करें और वन पंचायतें नियमानुसार वन आधारित आजीविका के कार्यों से जुड़ें।
ऐसी व्यवस्था गांव में रोजगार पैदा करने के साथ स्थानीय संसाधनों का आर्थिक मूल्य भी बढ़ा सकती है।
सवाल जंगल से कमाई करने का नहीं, बल्कि जंगल से पैदा होने वाली आर्थिक संभावनाओं का उचित लाभ स्थानीय समुदायों तक पहुंचाने का है।
पलायन का जवाब गांवों में आर्थिक अवसर
उत्तराखंड में पलायन की चर्चा अक्सर खाली होते गांवों, बंद पड़े घरों और खेती से दूर होते युवाओं के संदर्भ में होती है। लेकिन पलायन को केवल भावनात्मक अपील या गांव लौटने के आह्वान से नहीं रोका जा सकता।
युवाओं को गांव में रहने के लिए रोजगार चाहिए, नियमित आय चाहिए और अपने उद्यम को आगे बढ़ाने के अवसर चाहिए।
यदि जंगल आधारित उत्पादों के लिए स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित हों, उत्पादकों को उचित मूल्य मिले और बाजार तक पहुंच सुनिश्चित हो, तो ग्रामीण परिवारों के लिए आय के नए स्रोत विकसित हो सकते हैं।
यहां सरकार की भूमिका केवल योजनाएं घोषित करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसे स्थानीय उत्पादों की पहचान, तकनीकी प्रशिक्षण, सस्ती वित्तीय सहायता, गुणवत्ता नियंत्रण, विपणन और उद्यमियों को बाजार से जोड़ने की व्यवस्था करनी होगी।
वन विभाग, ग्राम पंचायत, वन पंचायत, सहकारी संस्थाएं और ग्रामीण आजीविका मिशन मिलकर काम करें, तो जंगल आधारित अर्थव्यवस्था को व्यवस्थित रूप दिया जा सकता है।
गांवों को कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता नहीं, उद्यम का केंद्र बनाना होगा
पहाड़ की अर्थव्यवस्था की एक बड़ी चुनौती यह है कि स्थानीय संसाधनों से होने वाला मूल्य संवर्धन अक्सर उत्पादन क्षेत्र से बाहर होता है। गांवों से कच्चा माल निकलता है, लेकिन प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बिक्री से होने वाले अतिरिक्त लाभ का बड़ा हिस्सा स्थानीय अर्थव्यवस्था तक नहीं पहुंच पाता।
इस स्थिति को बदलने की जरूरत है।
बुरांश, काफल और अन्य स्थानीय उत्पादों पर आधारित खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां, औषधीय पौधों की नियमानुसार खेती, रिंगाल के आधुनिक उत्पाद और चीड़ की पत्तियों से उपयोगी सामग्री तैयार करने वाले उद्यम इस दिशा में काम आ सकते हैं।
लेकिन हर गांव में एक जैसी इकाई स्थापित करना समाधान नहीं होगा। प्रत्येक क्षेत्र के संसाधनों, उत्पादन क्षमता, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और बाजार की मांग के आधार पर उद्यमों का चयन करना होगा।
उत्पादन से पहले बाजार की पहचान और मांग का आकलन भी जरूरी है, ताकि सरकारी सहायता से स्थापित इकाइयां कुछ समय बाद बंद न हो जाएं।
जंगल पर पहला अधिकार नहीं, संरक्षण और लाभ में स्थानीय भागीदारी जरूरी
जंगल आधारित अर्थव्यवस्था की चर्चा करते समय यह भी समझना होगा कि जंगल केवल व्यावसायिक संसाधन नहीं हैं। वे जल स्रोतों, मिट्टी, वन्यजीवों और स्थानीय जलवायु के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसलिए जंगलों से रोजगार पैदा करने का अर्थ अनियंत्रित दोहन नहीं हो सकता। वन उत्पादों का संग्रहण वैज्ञानिक मानकों और लागू कानूनों के अनुसार होना चाहिए। संवेदनशील प्रजातियों और प्राकृतिक पुनरुत्पादन पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन भी जरूरी है।
साथ ही, स्थानीय समुदायों की भागीदारी केवल श्रम उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्हें उद्यम के स्वामित्व, निर्णय प्रक्रिया और आर्थिक लाभ में भी उचित अवसर मिलने चाहिए।
यदि जंगलों के संरक्षण की जिम्मेदारी गांवों पर हो, लेकिन उनसे मिलने वाले आर्थिक लाभ में गांवों की भागीदारी नगण्य रहे, तो टिकाऊ विकास का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
उत्तराखंड को चाहिए गांव केंद्रित वन अर्थव्यवस्था
उत्तराखंड में विकास का मूल्यांकन केवल सड़कों, भवनों और पर्यटन स्थलों की संख्या से नहीं होना चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि गांवों में कितने स्थायी रोजगार पैदा हुए, स्थानीय लोगों की आय कितनी बढ़ी और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में समुदायों की भूमिका कितनी मजबूत हुई।
इसके लिए प्रत्येक विकासखंड में उपलब्ध वन संसाधनों का आकलन कर वन आधारित आजीविका की कार्ययोजना तैयार की जा सकती है। इसमें वन पंचायतों, महिला स्वयं सहायता समूहों, किसान उत्पादक संगठनों और स्थानीय उद्यमियों को शामिल किया जाए।
छोटी प्रसंस्करण इकाइयों, सामुदायिक संग्रहण केंद्रों, प्रशिक्षण सुविधाओं और विपणन नेटवर्क को विकसित करने के लिए वित्तीय एवं तकनीकी सहयोग दिया जाए। स्थानीय उत्पादों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करते हुए उन्हें क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाया जाए।
इस मॉडल की सफलता का आकलन केवल उत्पादित वस्तुओं या खर्च की गई सरकारी राशि से नहीं, बल्कि स्थानीय रोजगार, ग्रामीण आय, महिला उद्यमिता और वन संरक्षण के परिणामों से होना चाहिए।
निष्कर्ष: जंगल बचेंगे तो पहाड़ की अर्थव्यवस्था भी बचेगी
उत्तराखंड के सामने चुनौती केवल अपने जंगलों को बचाने की नहीं, बल्कि जंगलों के आसपास बसे समुदायों की आजीविका को मजबूत करने की भी है। पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय इनके बीच संतुलित संबंध स्थापित करना होगा।
जब गांव का युवा अपने क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर उद्यम खड़ा कर सकेगा, जब महिलाओं के समूह स्थानीय उत्पादों से नियमित आय अर्जित करेंगे और जब वन संरक्षण से जुड़े समुदायों को अपनी भागीदारी का आर्थिक लाभ मिलेगा, तभी जंगल ग्रामीण समृद्धि का आधार बन सकेंगे।
उत्तराखंड को ऐसी अर्थव्यवस्था की जरूरत है, जिसमें गांव केवल शहरों के लिए श्रमिक पैदा न करें, बल्कि अपने संसाधनों, कौशल और उद्यमिता के बल पर स्वयं आर्थिक केंद्र बनें।
जंगल को बचाना पर्यावरण की जरूरत है, लेकिन जंगल से जुड़ी आजीविका को मजबूत करना पहाड़ के भविष्य की जरूरत है।
और शायद यही वह रास्ता है, जहां से उत्तराखंड के गांवों की अर्थव्यवस्था बदलने और पलायन की मजबूरी कम करने की नई शुरुआत हो सकती है।
